कभी US का अजीज था आतंकी संगठन हक्‍कानी नेटवर्क, अब है छत्‍तीस का आंकड़ा, भारत की बढ़ी चिंता

 

कभी US का अजीज था आतंकी संगठन हक्‍कानी नेटवर्क। फाइल फोटो।

तालिबान ने सत्‍ता ग्रहण की प्रक्रिया के साथ तालिबान गुटों के बीच मतभेद सामने आए हैं। इसके चलते अमेरिकी सेना की वापसी के पांच दिन गुजर जाने के बाद तालिबान सरकार का गठन नहीं हो सका है। सरकार निर्माण की प्रक्रिया में हक्‍कानी नेटवर्क भी बड़ी बाधा बने हुए हैं।

काबुल, एजेंसी। अफगानिस्‍तान में काबुल पर कब्‍जे के बाद तालिबान ने सत्‍ता ग्रहण की प्रक्रिया तेज कर दी है। हालांकि, सरकार के गठन के साथ तालिबान गुटों के बीच मतभेद सामने आए हैं। इसके चलते अमेरिकी सेना की वापसी के पांच दिन गुजर जाने के बाद तालिबान सरकार का गठन नहीं हो सका है। सरकार निर्माण की प्रक्रिया में हक्‍कानी नेटवर्क भी बड़ी बाधा बने हुए हैं। अफगानिस्‍तान में सक्रिय हक्‍कानी नेटवर्क पाकिस्‍तान के काफी निकट है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (आइएसआइ) की इशारे पर 7 जुलाई, 2008 को अफगानिस्‍तान में भारतीय दूतावास के बाहर हुए बम धमाके में हक्‍कानी नेटवर्क का हाथ था। आखिर हक्‍कानी नेटवर्क से जुड़े आतंकी कौन है। इनका पाकिस्‍तान से क्‍या रिश्‍ता है। यह भारत के लिए कैसे खतरनाक हैं।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद हक्‍कानी नेटवर्क बाहर आया

अफगानिस्‍तान में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद खूंखार आतंकवादी संगठन हक्‍कानी नेटवर्क पर्दे के पीछे से निकलकर कैमरे के सामने आ गया है। हक्कानी नेटवर्क का नंबर दो आतंकी अनस हक्कानी ने काबुल में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और अब्दुल्ला-अब्दुल्ला से मुलाकात की थी। बता दें कि अनस को अफगानिस्‍तान की लोकतांत्रिक सरकार ने निर्दोष लोगों की हत्‍या के जुर्म में फांसी की सजा सुना चुकी है। हालांकि, तालिबान के साथ हुए समझौते के चलते उसे 2019 में दो अन्‍य कट्टर आतंकवादियों के साथ रिहा कर दिया गया था। इसलिए यह आशंका जताई जा रही है कि अफगानिस्‍तान में बनने वाली तालिबान सरकार के सत्‍ता की असली चाबी हक्‍कानी नेटवर्क के सरगना सिराजुद्दीन हक्‍कानी के पास ही रहेगी।

क्‍या हक्‍कानी के सरगना सिराजुद्दीन के पास होगी सत्‍ता की चाबी

अफगानिस्‍तान में सरकार बनने की प्रक्रिया में हक्‍कानी नेटवर्क अपनी प्रबल दावेदारी पेश कर रहा है। इसलिए यह आशंका जताई जा रही है कि अफगानिस्‍तान में बनने वाली तालिबान सरकार के सत्‍ता की असली चाबी हक्‍कानी नेटवर्क के सरगना सिराजुद्दीन हक्‍कानी के पास ही रहेगी। वहीं, पाकिस्तान के इशारों पर चलने वाले इस आतंकी संगठन की क्रूरता भारत और अफगानिस्तान के रिश्तों में बाधा भी बन सकती है।

हक्कानी नेटवर्क का पाकिस्‍तान कनेक्‍शन और भारत की चिंता

हक्कानी नेटवर्क की स्‍थापना अमेरिका के खास रहे जलालुद्दीन हक्कानी ने स्थापित किया था। 1980 के दशक में पूर्व सोवियत संघ की सेना के खिलाफ उत्तरी वजीरिस्तान के इलाके में इस संगठन ने काफी सफलता पाई थी। यह दावा किया जाता है कि जलालुद्दीन को आगे बढ़ाने में अमेरिका का बड़ा हाथ है। अमेरिका की सीआईए उसको फंडिंग करती थी। संगठन को हथियार और ट्रेनिंग भी सीआईए के एजेंट ही दिया करते थे। जलालुद्दीन उसी समय से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के भी खास थे। दरअसल, सीआईए को आईएसआई ही बताती थी कि किस मुजाहिद्दीन को कितना पैसा और हथियार देना है। इसके चलते आज भी हक्कानी नेटवर्क पर पाकिस्तान का बहुत ज्यादा प्रभाव है और इसी कारण भारत की चिंताएं भी बढ़ी हुई हैं।

हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान का सबसे मजबूत आतंकी संगठन

अफगानिस्‍तान से सोवियत सेना की जाने के बाद भी हक्कानी नेटवर्क ने वजीरिस्तान और उसके आसपास के क्षेत्र में अपना प्रभाव जमाया। अफगानिस्तान के पक्तिया प्रांत में जन्मे जलालुद्दीन ने पाक और अफगानिस्तान में अपने संगठन का बहुत विस्तार किया। 1990 तक सीआइए और आइएसआइ की मदद से हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान का सबसे मजबूत आतंकी संगठन बन गया। उस समय अफगानिस्तान में तालिबान का उदय हो रहा था। जलालुद्दीन भी जाना माना पश्तून मुजाहिद्दीन था। यही कारण है कि तालिबान ने हक्कानी के साथ दोस्ती कर ली और दोनों ने पूरे देश पर राज करना शुरू कर दिया। तालिबान और हक्कानी के नजदीक आते ही अमेरिका ने दूरी बना ली।