दुनिया की सबसे पुरानी व जानलेवा बीमारियों में से एक मलेरिया की पहली वैक्सीन को बनने में लगे 30 साल

 

आयुर्वेद में मलेरिया का उल्लेख ‘विषम ज्वर’ के रूप में मिलता है
आयुर्वेद के दम पर भारत पिछले कई हजार वर्षों से मलेरिया से लड़ रहा है। आयुर्वेद में मलेरिया का उल्लेख ‘विषम ज्वर’ के रूप में मिलता है। आजादी के समय भारत की 33 करोड़ आबादी में साढ़े सात करोड़ लोग मलेरिया से ग्रस्त थे।

कोरोना से त्रस्त दौर के दौरान बीते दिनों स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक सुखद खबर मिली। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने हाल में दुनिया की पहली मलेरिया वैक्सीन को मान्यता दी है। मलेरिया दुनिया की सबसे पुरानी व जानलेवा बीमारियों में से एक है। विज्ञानियों की 30 साल की मेहनत के बाद मासक्विरिक्स नाम की यह वैक्सीन बनी है। इसे मेडिकल की भाषा में आरटीएस, एस भी कहा जाता है। यह री-काम्बीनेंट प्रोटीन बेस्ड वैक्सीन है। इसे ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय कंपनी ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन ने बनाया है।

मलेरिया वैक्सीन आने से भारत समेत पूरी दुनिया में मलेरिया के खिलाफ मुहिम को एक नई ताकत मिली है। वर्ष 2020 में आई वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट के अनुसार, 2019 के दौरान विश्व भर में 22 करोड़ 90 लाख लोग मलेरिया की चपेट में आए, जिनमें 4 लाख 9 हजार रोगियों की मौत हो गई। मृतकों में दो लाख 74 हजार पांच साल से कम उम्र के बच्चों की थी। मलेरिया असल में एक परजीवी है, जो रक्त कोशिकाओं पर हमला करता है और उन्हें नष्ट करके अपनी संख्या बढ़ाता है। इसके बाद मलेरिया पीड़ितों को काटने वाले मच्छर दूसरों में भी मलेरिया फैलाते हैं। मच्छरों की 460 प्रजातियों में से करीब 100 ऐसी हैं, जो इंसानों में मलेरिया संक्रमण फैला सकती हैं। मच्छर के काटने के बाद शरीर में पैरासाइट प्लाजमोडियम फाल्सीपैरम संक्रमण फैलता है।

आयुर्वेद के दम पर भारत पिछले कई हजार वर्षों से मलेरिया से लड़ रहा है। चरक संहिता में मलेरिया पर पूरा अध्याय है। आयुर्वेद में मलेरिया का उल्लेख ‘विषम ज्वर’ के रूप में मिलता है। आजादी के समय भारत की 33 करोड़ आबादी में साढ़े सात करोड़ लोग मलेरिया से ग्रस्त थे। इसीलिए 1953 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया। फिर 1958 में राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम पेश किया गया। इसके बावजूद देश से मलेरिया का समूल नाश नहीं हो पाया।

हालांकि, हाल के वर्षों में स्थिति सुधरी है। अब मलेरिया की वैक्सीन से उम्मीद जगी है कि इस बीमारी को मात देने में मदद मिलेगी। मलेरिया का कारगर इलाज तलाशने की कोशिश पिछले 80 सालों से चल रही थी। करीब 60 साल से वैक्सीन डेवलपमेंट पर रिसर्च जारी है, लेकिन पिछली सदी के नौवें दशक के दशक में यह बात सामने आई कि मलेरिया के मच्छर के प्रोटीन से वैक्सीन बनाई जा सकती है। तब से अब तक लगातार कोशिशें जारी थीं, लेकिन 2019 में कई दौर के ट्रायल के बाद यह साफ हो पाया कि मलेरिया की वैक्सीन कारगर है, जिसे अब मान्यता मिल चुकी है। वैक्सीन लगने के बाद शरीर में मलेरिया संक्रमण का असर बहुत कम हो जाएगा। वैक्सीन लगने के बाद मलेरिया से लड़ने की क्षमता करीब 77 प्रतिशत हो जाएगी। उम्मीद है कि इस वैक्सीन के आने के बाद मलेरिया से होने वाली मौतों पर अंकुश लग सकेगा।