रंगमंच ने इस तरह जगाई थी स्वतंत्रता की अलख, ऐसे देशप्रेम से आक्रोशित हुए थे अंग्रेज

 


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हर राष्ट्र के पास अपनी राजनीतिक धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के अनुरूप मनोरंजन के साधन होते हैं। हमारे देश में रंगमंच विशेष महत्व रखता है। रंगमंच ने स्वतंत्रता की अलख जगाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

मुंबई, राष्ट्र के पास अपनी राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के अनुरूप मनोरंजन के साधन होते हैं। हमारे देश में रंगमंच विशेष महत्व रखता है। रंगमंच ने स्वतंत्रता की अलख जगाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। यही कारण है कि आज भी उनका मंचन लगातार जारी है...

अंग्रेजों ने उनके शासन के विरुद्ध रंगमंच के उपयोग की जांच करने के लिए अंतत: 29 फरवरी, 1876 को नाटकीय प्रदर्शन नियंत्रण अध्यादेश पारित किया। इसके तहत किसी नाटक में भारत माता और आजादी जैसे शब्दों पर रोक लगा दी गई। इस विधेयक की वजह से सेंसरशिप की तलवार अब उन नाटककारों के सिर पर लटक रही थी जो अपने नाटकों के माध्यम से क्रांति लाना चाहते थे। उन्होंने दूसरे माध्यमों को खोजना शुरू किया। उन्होंने पाया कि उनके उद्देश्य की पूर्ति के लिए शास्त्रीय संस्कृत नाटक और लोक व पारंपरिक रंगमंच की पुनव्र्याख्या करना सुरक्षित होगा। समकालीन नाटककारों ने छद्म रूप में संदेश भेजने के लिए प्राचीन शास्त्रीय संस्कृत के नाटकों को चुना और उनकी पुनव्र्याख्या की। इस पर अंग्रेज कोई आपत्ति नहीं उठा सकते थे, क्योंकि ये हिंदुस्तान की सांस्कृतिक विरासत थे। ‘महाभारत’, ‘रामायण’, जैसे महाकाव्य और ‘अभिज्ञान शकुंतलम’, ‘मुद्रा राक्षस’ और ‘मृच्छकटिकम’ की उस समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति के मुताबिक व्याख्या की गई।

गीतों से होते थे संदेश प्रेषित

एक और नाटककार, जिनके काम की समकालीन माहौल के अनुसार पुनव्र्याख्या की गई, वह थे विशाखदत्त। उन्होंने अपने नाटक ‘मुद्रा राक्षस’ के जरिए अंग्रेजों के खिलाफ एकता, संप्रभुता और विद्रोह का संदेश दिया। ‘मुद्रा राक्षस’ उस भारतीय राजा की कहानी थी जिसने एक विदेशी विजेता को हराकर भगा दिया था। संस्कृत के सबसे महान नाटकों में से एक ‘मृच्छकटिकम’ भी है। राजनीति और चतुराई से भरा यह नाटक एक गरीब चरवाहे द्वारा राज्य जीतने के बारे में है जो भारतीयों के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत था। संदेशों को रेखांकित करने के लिए इन नाटकों में गानों और कविताओं का प्रयोग होता था।

क जागृति का युग

बहरहाल, हिंदी में नाटकों का युग भारतेंदु हरिश्चंद्र के जमाने से माना जाता है। उन्होंने समकालीन भारतीय सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन को आधार बनाकर उसकी रचना की। इनमें ‘अंधेर नगरी’, ‘भारत दुर्दशा’ का उल्लेख आवश्यक है। इसके कथानक के पहले अंक में प्राचीन गौरव, पारस्परिक फूट और कलह के फलस्वरूप यवनों के भारत आगमन और भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना और आर्थिक शोषण का वर्णन था तो दूसरे अंक में दीनहीन भारत अपनी दुख गाथा सुनाते हुए मूर्छित हो जाता है। इसी प्रकार आगे बढ़ते हुए छठवें अंक में भारत भाग्य अचेत पड़े हुए भारत को जगाने की कोशिश करता है। कुल मिलाकर जनता को प्रोत्साहित करने के लिहाज से यह नाटक अपने आपमें पर्याप्त था।

प्रतिबंधों के बीच फैलाई जागरूकता

1890 के बाद ऐतिहासिक नाटकों को अलंकारिक रूप में प्रस्तुत किया गया। पौराणिक चीजें राजनीतिक विरोध व्यक्त करने के लिए प्रचलित हो गईं ताकि राजनीतिक संदेश सेंसरशिप से बच सकें। बंगाल में गिरीश चंद्र घोष (अभिनेता, लेखक और ग्रेट नेशनल थिएटर आफ कलकत्ता के प्रबंधक और बंगाली रंगमंच की महान हस्तियों में शुमार) ने ‘सिराजुद्दौला’ (1906) और ‘मीर कासिम’ (1907) का लेखन और निर्माण किया। यह चित्रण न तो ऐतिहासिक था न ही समकालीन फिर भी दर्शकों को संदेश मिला।

खोखली मान्यताओं पर प्रहार

एक अन्य नाटककार जिन्होंने भारत के इतिहास में समकालीन बंगाल के दबावों और तनावों को खोजा, वह हैं डी. एल. राय। ‘राणा प्रताप’ (1905), ‘मेवाड़ पाटन’ (मेवाड़ का पतन, 1908) और ‘शाहजहां’ (1908) में उन्होंने स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए राजपूतों का संघर्ष प्रदर्शित किया। उन्होंने संदेश दिया कि भारतीय राजनीतिक रूप से तभी स्वतंत्र हो सकते हैं, जब वे सामंती मूल्यों और मरणासन्न सामाजिक प्राथमिकताओं को त्यागें। उन्होंने समाज के भीतर जाति व्यवस्था को भी शोषण की वजह कहा। बंगाल का लोकप्रिय लोक रंगमंच जात्रा भी राजनीतिक विरोध में पीछे नहीं रहा। इसके सबसे प्रसिद्ध कलाकार मुकुंद दास ने ऐतिहासिक नाटकों के माध्यम से राष्ट्रवाद का प्रचार करने के लिए जात्रा रूप का प्रयोग किया। महाराष्ट्र में भी देश में उबलता सियासी माहौल मंच पर प्रतिबिंबित किया गया था, विशेष रूप से लोकमान्य तिलक के शिष्य कृष्णाजी प्रभाकर खाडिलकर द्वारा लिखित नाटक ‘कीचक वध’ (1907) में समकालीन राजनीति के आलोक में महाभारत के एक अध्याय की व्याख्या की और निरंकुश शासक (ब्रिटिश भारत के वायसराय) लार्ड कर्जन को निशाना बनाया। यह नाटक कई वर्ष के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था।

20वीं शताब्दी की शुरुआत में जब स्वतंत्रता संग्राम ने गति पकड़ी तो पूरा देश क्रांति की भावना से भर गया। स्वतंत्रता संघर्ष में शिक्षित मध्यम वर्ग सक्रिय रूप से शामिल हुआ और अपना संदेश पहुंचाने के लिए उन्हें रंगमंच की महत्ता का एहसास हुआ। तब तक नाटक को विशुद्ध रूप से आत्म अभिव्यक्ति के शक्तिशाली माध्यम के रूप में देखा जाता था। इस बदलाव में प्रख्यात नाटककार ख्वाजा अहमद अब्बास की अहम भूमिका रही। वहीं बंगाल में मन्मथ राय, शंभु मित्र ने सामाजिक सक्रियता के रंगमंच की शुरुआत की। 1930 के दौर में राजनीतिक स्थिति का विरोध करने वाले कुछ लोगों में से एक मन्मथ राय थे जिन्होंने राजनीतिक समस्याओं को उजागर करने वाले हिंदू किंवदंतियों पर मंचन किया। उनका ‘कारागार’ नाटक भगवान कृष्ण के जेल में जन्म पर आधारित था। हालांकि बाद में यह भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। कई क्षेत्रीय शौकिया थिएटर आंध्रनट मंडल, बांबे में गुजरात साहित्य संघ, इंडियन थिएट्रिकल ग्रुप और मद्रास में सेवा संघ जैसे कई क्षेत्रीय शौकिया रंगमंच समूहों ने इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और रंगमंच सभागारों से सड़कों पर आ गया।

बना विरोध का वाहन

हालांकि अंग्रेजों के निर्मम दमन ने भारत में रंगमंच को भयभीत कर दिया। बुद्धिजीवियों के समूहों द्वारा नव जागृत राष्ट्रवाद का संदेश देते हुए नए नाटक लिखने और प्रदर्शन करने के एक या दो प्रयास हुए, लेकिन उन्हें भी दबा दिया गया। पिछली सदी के तीसरे दशक में एक ठहराव के बाद, भारतीय परिदृश्य पर एक नई शक्ति के रूप में माक्र्सवाद उभरने के साथ ही विरोध के एक वाहक के रूप में रंगमंच 1940 में फिर से जीवंत हो गया। आज भी रंगमंच अपनी पूरी जिजीविषा के साथ अपना योगदान देने में सतत् है।