अवनि ने शैलपुत्री बन अवसाद को अवसर में बदला

 

भारत की पहली पैरालंपिक डबल मेडलिस्ट अवनि लेखरा।
नवरात्र के अवसर पर  से खास बातचीत में अवनि ने बताया कि 2012 में कार दुर्घटना के बाद लकवे के कारण छह-सात माह तक पूरी तरह से बिस्तर पर ही रही दो साल घर में रहना पड़ा। दस की थी दुस्वप्न था यह सब।

नई दिल्ली। नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री का पूजन होता है। मां शैलपुत्री यानी एक ऐसी पुत्री जो अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और लक्ष्य के प्रति समर्पण से माता-पिता को गौरवान्वित करती है। विपरीत परिस्थितियों से न घबराने वाली बेटी जो असंभव को भी अभीष्ट बनाकर प्राप्त कर लेती है। मां के इसी स्वरूप का दर्शन कराती हैं भारत की पहली पैरालंपिक डबल मेडलिस्ट अवनि लेखरा।

जयपुर की अवनि को टोक्यो पैरालंपिक में मिले 10 मीटर एयर रायफल स्टैंडिंग के स्वर्ण और 50 मीटर एयर रायफल स्टैंडिंग स्पर्धा के कांस्य पदक केवल किसी खेल स्पर्धा में जीते गए पदक मात्र नहीं हैं, ये परिचायक हैं अवसाद पर जीत के, कठिनाइयों से पार पाने के और अंसभव से संभव तक एक पुत्री की विजय यात्रा के।

उठना-बैठना तक सीखना पड़ा

नवरात्र के अवसर पर दैनिक जागरण से खास बातचीत में अवनि ने बताया कि 2012 में कार दुर्घटना के बाद लकवे के कारण छह-सात माह तक पूरी तरह से बिस्तर पर ही रही, दो साल घर में रहना पड़ा। दस की थी, दुस्वप्न था यह सब। उठना-बैठना भी फिर से सीखना पड़ा था। चलना तो संभव ही नहीं था। संतुलन बनाना सीखना पड़ा। मनोबल टूट चुका था। मगर हार नहीं मानी। इसके पीछे है माता-पिता और परिवार का समर्थन व विश्वास। पैरालंपिक के दो पदकों के साथ ही वह विश्व शूटिंग पैरा स्पोट्र्स रैंकिंग में दूसरे स्थान पर भी हैं।

आंखों में बसा लिया पिता का स्वप्न

अवनि ने 2014 में स्कूल फिर से जाना शुरू किया और यहीं से शुरू हुआ नया सफर। पिता राजस्थान प्रशासनिक सेवा में अधिकारी हैं और उस समय खेल विभाग से जुड़े थे। वहां उन्होंने पैरा एथलीटों को जिंदगी के मोर्चे पर डटे देखा तो अवनि की भी उसी रूप में कल्पना कर डाली। बेटी ने भी पिता के स्वप्न को अपनी आंखों में बसा लिया और निकल पड़ी एक दुर्गम राह पर। अवनि की आवाज भर्रा जाती है जब वह बताती हैं कि घर के पास शूटिंग रेंज में जाना शुरू किया। शुरुआत में बहुत मुश्किलें आईं। शरीर भी ठीक अवस्था में नहीं था, पांच किलो की रायफल मेरे लिए उठा पाना बहुत कठिन था। तब पैरा कोच नहीं थे, सामान्य खिलाडिय़ों के कोच (एबल बाडी कोच) से सीखा। अपने शरीर के हिसाब से रायफल सेट करवाई, लेकिन हिम्मत नहीं हारी।

केवल पांच माह में जीता पहला सोना

अप्रैल 2015 में शूटिंग रेंज में कदम रखने के पांच माह के अंदर ही अवनि ने क्षेत्रीय स्तर की प्रतियोगिता में सामान्य खिलाडिय़ों के साथ मुकाबला करते हुए स्वर्ण पदक जीतकर जता दिया था कि इस बेटी की बात ही कुछ और है। यहां से बड़े मुकाबलों की राह खुली और पहला अंतरराष्ट्रीय पदक मिला 2017 में संयुक्त अरब अमीरात में जब रजत हासिल किया। वहां मुकाबला रियो पैरालंपिक की स्वर्ण विजेता से था। इससे बहुत मनोबल बढ़ा।

कोरोना के संकट से भी निपटीं

असली परीक्षा अभी बाकी थी और मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही थीं। पैरालंपिक की तैयारी की योजना बन ही रही थी कि कोरोना महामारी ने देश को घेर लिया। सब कुछ बंद हो गया। ऐसे में एक पैरा एथलीट के लिए अभ्यास किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन अवनि तो अवनि हैं, देवी स्वरूप। हार नहीं मानी, रार नई ठानी। सरकार और पिता की मदद से घर पर ही 10 मीटर स्पर्धा के लिए शूटिंग रेंज बनाई और जुट गईं अभ्यास में।

सोच से पैदा किया फर्क

खेल और जीवन में सोच का बड़ा महत्व है। सकारात्मक सोच से इतिहास लिखने की राह खुलती है। अवनि ने भी जज्बे और सोच से अवसाद पर जीत हासिल की। बचपन में दुर्घटना के बाद की मनस्थिति के बारे में अवनि कहती हैं कि शुरू में लगता था कि नहीं कर पाऊंगी। फिर भी लगी रही। मां-पापा हिम्मत बढ़ाते थे। जब सात सामान्य खिलाड़ियों (एबल बाडी प्लेयर) को हराकर क्षेत्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण जीता तो मनोबल कुलांचे मारने लगा। लगा सही राह पर हूं। फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंची। अपने देश का प्रतिनिधित्व करना अलग ही अनुभव है।

टोक्यो का पदक है सबसे खास

अवनि के लिए अब तक के सफर में टोक्यो पैरालंपिक की जीत सबसे खास है। कहती हैं, हर पदक अहम होता है, लेकिन सपना पूरा होना अलग ही है। दस साल की बच्ची अवनि और अब की सेलेब्रिटी अवनि में आत्मविश्वास का फर्क है। शूटिंग से आत्मविश्वास मिला जिसने जीवन बदल दिया। माता-पिता का सपना पूरा करने और पैरालंपिक के स्वर्ण में किसे अधिक बड़ा अवसर मानती हैं, इस पर अवनि बिना झिझके कहती हैं, दोनों ही मेरे जीवन के अनमोल पल हैं। इनकी क्या तुलना।

स्टार नहीं, ये तो देश का प्यार है

स्टारडम मिलने पर देश की इस बेटी ने बालसुलभ मुस्कान के साथ कहा कि स्टार तो नहीं हूं, लेकिन पूरे भारत से भरपूर प्यार मिल रहा है। इसके लिए बहुत खुश हूं। देशवासियों, परिवार, कोच और सरकार की आभारी हूं।

कुछ रचने की कोई सीमा नहीं, डटी रहें, जुटी रहें

नवरात्र में देवी मां की आराधना में आनंद का अनुभव करने वाली इस खिलाड़ी ने देश की देवीस्वरूपा बेटियों को संदेश भी दिया है। अवनि ने कहा कि जीवन में उपलब्धि हासिल करने की कोई सीमा नहीं है। जो करना है पूरे मनोयोग से करें। अपना 100 फीसद दें, ध्यान प्रासेस पर रखें। अवनि आगे की तैयारी भी कर रही हैं। अब निशाने पर पेरिस पैरालंपिक है। बाकी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाएं भी हैं।