किसे कहा जाता था दिल्ली में पानी का मसीहा, दफनाया गया था हौज खास में

 

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 दिल्ली में पानी के लिए तमाम प्रयास हुए। इस बीच 1340 ईस्वी में मानसून बेहतर हुआ और फिरोजशाह के प्रयासों को बल मिल गया। पानी के लिए मसीहा की तरह काम करने वाले फिरोजशाह को हौज खास में दफनाया गया।

नई दिल्ली । यमुना नदी के किनारे बसी दिल्ली के साथ-साथ कई अन्य शहरों के बसने और बनने की असली वजह यहां पर जलस्त्रोतों का होना था। दिल्ली पर शासन करने वाले मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक ने बावलियों का निर्माण करवाया। इतिहासकार मानते हैं कि हिंदू राजा अनंगपाल तोमर के अतिरिक्त अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक और शाहजहां ने भी अपने शहर का विस्तार वहीं किया जहां जलस्त्रोत था। यही वजह है कि दिल्ली में तकरीबन हर जगहों पर बावलियों का जिक्र भी जरूर आता है। 

 सतपुला बांध के सात द्वारों से निकला था राहत का जल

तुगलक शासनकाल में दिल्ली का चौथा शहर तुगलकाबाद बना तो जल संकट और बढ़ने लगा। ऊंचाई पर स्थित तुगलकाबाद किले में विभिन्न कुओं, बावलियों और चैनलों द्वारा पानी की आपूर्ति होती थी लेकिन यह ज्यादा समय तक नहीं चल सका। इतिहासकार मनीष के गुप्ता का कहना है कि मुहम्मद बिन तुगलक ने सुरक्षा कारणों और जल संकट से निपटने के लिए सीरी और तुगलकाबाद को मिलाकर जहांपनाह बसाया और यहीं पर उसने सात द्वारों वाला सतपुला का निर्माण करवाया जो कि शहर के परकोटे से होकर गुजरने वाले झरने के पानी को नियंत्रित करता था। हालांकि उस दौर में पड़े भयंकर अकाल और सूखे से त्रहि-त्रहि मच गई थी। बाद में फिरोजशाह आया और उसे समझ में आया कि नए हौज या जल निकाय बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पुरानों को ही नवजीवन देना होगा। बाद में 1340 ईस्वी में मानसून बेहतर हुआ और फिरोजशाह के प्रयासों को बल मिल गया। पानी के लिए मसीहा की तरह काम करने वाले फिरोजशाह को हौज खास में दफनाया गया।

हौज-ए-शम्शी में जल संचयन

जल संकट से निपटने के लिए तेरहवीं शताब्दी में सुल्तान शम्शुद्दीन इल्तुतमिश ने एक टंकी बनवाई जिसका नाम रखा हौज-ए-शम्शी। जिसके बारे में प्रचलित है कि किसी संत ने सुल्तान को सपने में कहा था कि वे टंकी का निर्माण करवाएं तो जल संकट दूर हो जाएगा। हौज-ए-शम्शी में बरसात के मौसम में जल संचयन होता था। अरब देश के यात्री इब्न-बतूता ने इस हौज के बारे में लिखा था कि इससे दिल्लीवासियों की प्यास बुझती है, जब हौज के किनारों से पानी सूख जाता है तब यहां खीरा, गन्ना और तरबूज उगाए जाते हैं।

बावलियों का दौर

हौज और बावलियां उस लंबे समय तक जल संचयन के लिए काम में आती रहीं। बावली हौज की अपेक्षा छिछली होती थी और वह आमजन के लिए आसानी से उपलब्ध थीं। यह बावलियां वर्षा के जल से भर जाया करती थीं। इनकी बनावट बताती है कि यह केवल जलनिकाय न होकर मनोरंजन और मेलजोल का स्थल भी साबित होती थीं। दिल्ली के एक हजार से भी अधिक जल निकायों में से पुरातत्व विभाग के नियंत्रण में आ गई हैं। अनंगताल से लेकर राजो की बावली, उग्रसेन की बावली और गंधक की बावली तक का अपना रोचक इतिहास रहा है।