तो कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए ये हथकंडा अपना रहे अमीर देश, गरीब देश भुगत रहे खामियाजा

 

अमीर देशों के बदले गरीब देशों में बढ़ाया जा रहा उत्सर्जन
अमीर देशों ने पिछले 200 साल में किस तरह से उत्सर्जन फैलाकर दुनिया को संकट में डाला है यह तथ्य छिपा नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि इनमें से कई देश अब उत्सर्जन नियंत्रित करने के झूठे आंकड़े दिखा रहे हैं।

नई दिल्ली, प्रेट्र। जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में 26वें सम्मेलन (सीओपी 26) का आयोजन 31 अक्टूबर से स्काटलैंड में होने जा रहा है। कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए इन वैश्विक प्रयासों के बीच डिजास्टर ट्रेड शीर्षक से आई एक रिपोर्ट में अमीर देशों का नया हथकंडा सामने आया है। इसे उत्सर्जन उपनिवेशवाद की संज्ञा दी गई है, जिसके तहत कई अमीर देश गरीब देशों में कारखाने लगा रहे हैं और वहां से अपनी जरूरत की वस्तुएं आयात कर रहे हैं। नतीजा यह है कि अमीर देशों में तो उत्सर्जन कम हो रहा है, लेकिन उसका खामियाजा गरीब देश और उनके साथ-साथ पूरी दुनिया भुगत रही है। इस रिपोर्ट का हिस्सा रहे रायल होलोवे यूनिवर्सिटी आफ लंदन के लौरी परसस ने इस संबंध में कुछ बातों को रेखांकित किया है।

उत्सर्जन उपनिवेशवाद का झूठे आंकड़ों का खेल

अमीर देशों ने पिछले 200 साल में किस तरह से उत्सर्जन फैलाकर दुनिया को संकट में डाला है, यह तथ्य छिपा नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि इनमें से कई देश अब उत्सर्जन नियंत्रित करने के झूठे आंकड़े दिखा रहे हैं। इन देशों ने किसी बेहतर तकनीक के जरिये उत्सर्जन कम नहीं किया है, बल्कि ज्यादा उत्सर्जन वाले कारखाने विकासशील देशों में स्थापित कर दिए हैं। उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में कपड़ों या बिल्डिंग मैटेरियल पर होने वाला उत्सर्जन जस का तस है। इनका उत्पादन किसी दूसरे देश में हो रहा है। इसी को उत्सर्जन उपनिवेशवाद नाम दिया गया है।

अमीर देशों के बदले गरीब देशों में बढ़ाया जा रहा उत्सर्जन

रिपोर्ट बताती है कि ब्रिटेन अपने यहां प्रयोग होने वाले चार फीसद वस्त्रों का आयात कंबोडिया से करता है। कंबोडिया में इससे जुड़े कारखाने बड़े पैमाने पर वन काट रहे हैं, जल स्रोतों का कुप्रबंधन कर रहे हैं और सूखे का खतरा बढ़ा रहे हैं। इसी तरह, ब्रिटेन के लिए ईंट उत्पादित करने वाले दक्षिण एशियाई देशों में भी यही स्थिति है, जो उत्सजर्न का शिकार हो रहे हैं। श्रीलंका भी मौसम में कई अप्रत्याशित बदलावों का सामना कर रहा है।

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खतरे में पूरी दुनिया

यह खतरा केवल उत्पादक देशों तक सीमित नहीं है। उत्सर्जन किसी देश की सीमा में रुका नहीं रहता है। इसका दुष्प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि जिम्मेदार संस्थाएं मात्र किसी देश के कार्बन उत्सर्जन के लिए नहीं, बल्कि वहां प्रयोग होने वाले उत्पादों से जुड़े पूरे उत्सर्जन को लेकर सुदृढ़ नीति बनाएं।

1990 से 2016 के बीच ब्रिटेन ने अपनी उत्पादन गतिविधियों में 41 फीसद उत्सर्जन कम करने का दावा किया है। ब्रिटेन के लोगों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले उत्पादों के उत्सर्जन में वास्तविक कमी मात्र 15 फीसद ही है।1990 में ब्रिटेन में प्रयुक्त उत्पादों से होने वाला 14 फीसद उत्सर्जन अन्य देशों में होता था। 2016 तक करीब 50 फीसद उत्सर्जन बाहरी देशों में होने लगा।