आखिर अंधेरे में क्‍यों डूबा चीन, यूरोप में क्‍यों हुई ऊर्जा की किल्‍लत, जानें- दुनिया में ऊर्जा संकट के सियासी फैक्‍टर

आखिर अंधेरे में क्‍यों डूबा चीन, यूरोप में क्‍यों हुई ऊर्जा की किल्‍लत।
सवाल यह है कि चीन व अन्‍य यूरोपीय देशों में ऊर्जा संकट क्‍यों गहराया। क्‍या चीन की खदानों में कोयला खत्‍म हो गया है या चीन में कोयले की किल्‍लत उत्‍पन्‍न हो गई है। इसके पीछे बड़ी वजह क्‍या है। जानते हैं कि ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा की राय।

नई दिल्‍ली। करीब-करीब पूरी दुनिया ऊर्जा संकट का सामना कर रही है। कोयले की कमी से ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना एक बड़ी चुनौती बन गई है। सवाल यह है कि चीन व अन्‍य यूरोपीय देशों में ऊर्जा संकट क्‍यों गहराया। इसके पीछे बड़ी वजह क्‍या है ? क्‍या चीन की खदानों में कोयला खत्‍म हो गया है या चीन में कोयले की किल्‍लत उत्‍पन्‍न हो गई है ? क्‍या दुनिया में तेजी से बदल रहे सियासी समीकरण में इसकी कोई बड़ी भूमिका है। आइए जानते हैं कि ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा की राय।

आखिर अंधेरे में क्‍यों डूबा चीन ?

देखिए, चीन में ऊर्जा संकट के लिए वह खुद से ही जिम्‍मेदार है। ऐसा नहीं कि चीन में कोयला का उत्‍पादन बंद हो गया है या चीन की खदानों में कोयला खत्‍म हो गया है। दरअसल, चीन अपनी ऊर्जा संयंत्रों के लिए आस्‍ट्रेलिया से बड़ी तादाद में कोयला लेता था, लेकिन आकस के गठन के बाद दोनों देशों के बीच दूरी बढ़ी। आस्‍ट्रेलिया और अमेरिका की नजदीकी चीन को नागवार गुजरी। चीन की कम्‍युनिस्‍ट सरकार ने आस्‍ट्रेलिया से कोयले की आपूर्ति बंद कर दी। चीन सरकार ने यह फैसला अचानक से लिया और आस्‍ट्रेलिया से कोयले की आपूर्ति तत्‍काल बंद कर दी गई। इसका असर चीन में कोयले से चलने वाले संयंत्रों पर पड़ा। कोयला पर निर्भर चीनी संयंत्र बंद होने लगे। इसका सीधा असर ऊर्जा उत्‍पादन पर पड़ा। आकस, दरअसल आस्‍ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका का एक सुरक्षा गठबंधन है, ज‍िसे चीन अपने खिलाफ मानता है। आकस के गठन के बाद चीन ने आस्‍ट्रेलिया से अपने संबंधों को तोड़ने के क्रम में यह कदम उठाया। चीन ने आस्‍ट्रेलिया से कोयला लेना बंद कर दिया। 

यूरोपीय देशों में ऊर्जा की कमी के क्‍या सियासी कारण है ?

जी, बिल्‍कुल। दरअसल, यूरोपीय देश अपनी प्राकृतिक गैसों की आपूर्ति के लिए रूस पर निर्भर रहते हैं। इन यूरोपीय देशों की 43 फीसद प्राकृतिक गैस की आपूर्ति रूस से होती है। हालांकि, दुनिया में ऊर्जा संकट के कारण रूस से होने वाली इस आपूर्ति में कमी आई है। रूस से पाइप लाइन के जरिए यूरोपीय देशों को प्राकृतिक गैस पहुंचाई जाती है। यह पाइपलाइन यूक्रेन और पोलैंड से होकर जाती है। इन दोनों देशों से रूस के संबंधों में तनाव रहता है। रूस ने गैस आपूर्ति को बेहतर करने के लिए नार्ड स्‍ट्रीम पाइप लाइन योजना तैयार की है। लेकिन सियासी समीकरणों के चलते कई यूरोपीय देशों ने अभी तक इस पाइप लाइन योजना को मंजूरी नहीं दी है। अमेरिका भी इस पाइप लाइन का विरोधी रहा है। हालांकि, अमेरिका का तर्क है कि अगर सीधी पाइप लाइन योजना को मंजूरी दे दी गई तो यूक्रेन और पोलैंड को इसका आर्थिक खमियाजा भुगतना होगा।इन दोनों देशों को आर्थिक नुकसान होगा। 

इस ऊर्जा संकट के लिए कोराना महामारी कितनी ज‍िम्‍मेदार ?

ऊर्जा संकट के लिए कोरोना महामारी एक बड़ा कारक है। इसको इस तरह से समझिए, भारत समेत दुनिया में कोरोना महामारी के दौरान लाकडाउन और सरकारी प्रतिबंधों के चलते कई उद्योग-धंधे बंद हो गए। इन उद्योग धंधों के बंद होने से यहां खपत होने वाली ऊर्जा ठप हो गई। इससे ऊर्जा की मांग में भारी कमी आई। क्‍योंकि बिजली का संग्रह नहीं किया जा सकता, इसलिए ऊर्जा संयंंत्रों ने कम उत्‍पादन का फैसला लिया। इसके चलते कोयले की मांग में भारी गिरावट आई। इस गिरावट के कारण कोयला खदानों में भी मांग की कमी देखी गई। लेकिन कोरोना महामारी के एक बार फ‍िर उद्योग धंधे पटरी पर लौटे। इसके साथ ऊर्जा की खपत में तेजी से इजाफा हुआ। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऊर्जा की मांग में तीन गुना का इजाफा हुआ है। लेकिन किसी ने इतनी ज्‍यादा मांग की उम्मीद नहीं की थी इससे मांग और आपूर्ति का समीकरण बदल गया। रूस में भी ऊर्जा की खपत बढ़ गई है और कोरोना महामारी के दौरान यहां भी उत्पादन पर असर पड़ा है। 

इस ऊर्जा संकट के अन्‍य कारण क्‍या है ?

दरअसल, दुनिया में 90 फीसद बिजली उत्‍पादन कोयला संयंत्रों से होती है, लेकिन क्‍लीन इनर्जी के नाम पर पश्चिमी देशों और अमेरिका में कोयला के उत्‍पादन में गिरावट हुई है। इन मुल्‍कों में कोयले के उत्‍पादन को प्रो‍त्‍साह‍ित नहीं किया जा रहा है। इसके चलते इस पर होने वाले तकनीकी विकास और निवेश का कार्य भी धीमा पड़ गया है। नवकरणीय ऊर्जा के प्रोत्‍साहन के चलते कोयला में निवेश बंद हो गया है। इसका व्‍यापक असर दुनिया भर के कोल इंड्रस्‍टी पर पड़ा है। इसके असर दुनिया भर में कोयला उत्‍पादन पर पड़ा है। मेरा मानना है कि अमेरिका और प‍श्चिमी देशों के इस रुख के चलते भी कोयले की मांग और आपूर्ति में बड़ा गैप पैदा हुआ है।

क्‍या भारत पर भी इसका असर पड़ेगा ?

निश्‍चित रूप से, हरित ऊर्जा की तरफ बढ़ते कदमों और निवेशकों की कोयला उत्पादन में घटती रुच‍ि ने यहां कोयले का उत्पादन को सीमित कर दिया है। जाहिर है कि इसका असर भारत पर भी पड़ेगा। दरअसल, अन्य मुल्‍कों की तरह एशियाई देशों में भी ऊर्जा की खपत और मांग इजाफा हुआ है। चीन और भारत दो ऐसे बड़े मुल्‍क हैं, जो दुनिया की पूरी आबादी का 40 फीसद हिस्सा रखते हैं। दोनों ही मुल्‍क अपनी ऊर्जा जरूरतों लिए काफी हद तक कोयले पर निर्भर हैं। कोयले के आयात के मामले में चीन दुनिया में नंबर एक पर है और भारत नंबर तीन पर। वहीं, कोयले के उत्पादन के मामले में भी चीन और भारत क्रमश: नंबर एक और दो पर आते हैं।