बंगाल की राजनीति की धुरी रहने वाली वामपंथियों का हश्र दंभियों के लिए सबक

 

बंगाल से विलुप्त होता वामपंथ। इंटरनेट मीडिया
 पिछले विधानसभा चुनाव में वामदलों ने कांग्रेस और अब्बास सिद्दीकी की पार्टी के साथ गठबंधन किया था लेकिन वाममोर्चा पूरी तरह से धूल-धूसरित हो गया। अब उनके पास विधानसभा में एक भी विधायक नहीं है। उपचुनाव में भी वामपंथी अप्रासंगिक हो चुके हैं।

कोलकाता,  वामपंथियों ने बंगाल पर लगातार 34 वर्षो तक एकछत्र राज किया। 1952 से 2016 तक राज्य की राजनीति की धुरी रहने वाले वही वामपंथी आज बंगाल में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। प्रदेश की 294 विधानसभा और 42 लोकसभा सीटों में से वामपंथियों के खाते में शून्य है। यही नहीं, चुनावी अखाड़े में उतरने पर वामो प्रत्याशियों की जमानत तक नहीं बच पा रही है। सत्ता से बेदखल होने के बाद वामदलों की ऐसी हालत होगी, शायद ही किसी ने सोचा था। कामरेडों ने भी ऐसे हश्र की कल्पना नहीं की थी। वामपंथियों का यह हश्र जीत और सत्ता के मद में चूर दंभी नेताओं के लिए एक बड़ा सबक है, क्योंकि यह एक शाश्वत सच है कि सत्ता कभी स्थायी नहीं होती।

उम्मीद और काम दिखने पर जनता नेताओं और उनकी पार्टियों को सिर-आंखों पर बिठाती है और जब गड़बड़ी होती है तो जमीन पर पटकने में भी देर नहीं लगाती है। ऐसा ही कुछ वामदलों के साथ बंगाल की जनता ने किया है। 2006 में सातवीं बार भारी जीत के साथ वामपंथी दल सत्ता में लौटे थे तो दंभ भरते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा था-‘हम 235 हैं और वे 30।’ 2006 के विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा ने 235 सीटों पर जीत दर्ज की थी और तृणमूल को महज 30 सीटें मिली थीं, लेकिन पांच साल बाद 2011 में क्या हुआ, यह सर्वविदित है। बुद्धदेव भट्टाचार्य अपने ही वामपंथी शासन की ताबूत में आखिरी कील ठोकने वाले मुख्यमंत्री साबित हुए। 50 फीसद तक वोट प्राप्त कर लगातार सात विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज करने वाले वामपंथियों को 2021 के चुनाव में पांच फीसद से भी कम वोट मिले। यहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से लेकर अन्य दलों को भी समझने की जरूरत है कि अहंकारियों का विनाश होना तय है।

एक वक्त था, जब वामपंथियों पर वोटों की बारिश हुआ करती थी और आज एक-एक वोट का अकाल है। विधानसभा चुनाव हो या फिर उपचुनाव, सबमें हालात एक जैसे हैं। गत 30 सितंबर को भवानीपुर सीट पर उपचुनाव और मुर्शिदाबाद जिले की जंगीपुर तथा शमशेरगंज सीटों पर चुनाव और तीन अक्टूबर को मतगणना हुई थी। कोलकाता की भवानीपुर सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा प्रत्याशी प्रियंका टिबड़ेवाल के विरोध में माकपा ने वाममोर्चा समर्थित प्रत्याशी के रूप में पेशे से वकील श्रीजीब विश्वास को उम्मीदवार बनाया था।

जब वोटों की गिनती शुरू हुई तो पहले राउंड की समाप्ति पर माकपा प्रत्याशी के खाते में महज 85 वोट आए। तृणमूल प्रत्याशी ममता बनर्जी तो दूर, भाजपा प्रत्याशी प्रियंका टिबड़ेवाल के आसपास भी श्रीजीब विश्वास नहीं थे। सुबह जैसी शुरुआत हुई थी, परिणाम भी उसी अनुरूप रहा। शाम को जब मतगणना खत्म हुई तो देखा गया कि ममता को 84,389, प्रियंका टिबड़ेवाल को 26,320 और श्रीजीब विश्वास को मात्र 4,201 वोट मिले यानी विश्वास की जमानत जब्त हो गई। यही नहीं, एक समय कांग्रेस और वामपंथियों का गढ़ रहे जंगीपुर-शमशेरगंज में भी कुछ ऐसा ही हाल रहा। जंगीपुर में तृणमूल उम्मीदवार जाकिर हुसैन को 1,36,444 और भाजपा के सुजीत दास को 43,946 वोट मिले, जबकि वाममोर्चा प्रत्याशी आलम मियां को सिर्फ 9,067 वोट मिले।

तृणमूल के जाकिर हुसैन ने 92,480 वोटों से जीत दर्ज की। शमशेरगंज में भी वाममोर्चा का यही हाल रहा। इस सीट पर तृणमूल उम्मीदवार अमीरुल इस्लाम ने जीत हासिल की। उन्होंने 26,379 वोटों से जीत हासिल की। शमशेरगंज विधानसभा सीट से तृणमूल उम्मीदवार अमीरुल इस्लाम, भाजपा उम्मीदवार मिलन घोष, कांग्रेस उम्मीदवार जइदुर रहमान और माकपा उम्मीदवार मोदस्सर हुसैन ने चुनाव लड़ा था। तृणमूल को 96,417, कांग्रेस को 70,038, भाजपा को 10,800 और माकपा को मात्र 6,158 वोट मिले। मतों की यह संख्या वामपंथियों की दयनीय हालत की दास्तां बयां रही है।

उपचुनाव में दयनीय प्रदर्शन को लेकर जब वाममोर्चा अध्यक्ष एवं माकपा के वरिष्ठ नेता बिमान बोस ने पूछा गया तो उनका सीधा-सपाट जवाब था-‘परिणाम वही रहा है, जिसकी उम्मीद पहले से ही थी। मैंने नहीं सोचा था कि इस चुनाव में असाधारण परिणाम होंगे। हालांकि इस बार कुछ लोग, जो नियमित रूप से वोट डालते थे, उन्होंने वोट नहीं दिया। खासकर भवानीपुर क्षेत्र में।’ उन्होंने आगे कहा-‘मुङो नहीं पता कि लोगों ने वोट क्यों नहीं दिया। शमशेरगंज और जंगीपुर में जो होना था, वही हुआ। मैंने नहीं सोचा था कि वाममोर्चा का वोट प्रतिशत बढ़ेगा।’ सवाल है कि वामपंथ का क्या होगा? आगामी उपचुनावों में वामपंथी क्या करेंगे? इसपर वाममोर्चा अध्यक्ष ने जवाब दिया कि आगामी कुछ दिनों में बैठक कर निर्णय लिया जाएगा कि चुनाव कैसे लड़े जाएंगे।