वसुधैव कुटुंबकम के मंत्र में मौजूद हैं पर्यावरण से जु़ड़ी सभी समस्याओं के समाधान

 

सबसे बड़ी चुनौती इस विषय पर पर्याप्त ज्ञान का अभाव है
सबसे बड़ी चुनौती इस विषय पर पर्याप्त ज्ञान का अभाव है। जो कुछ उपलब्ध है विभिन्न कारणों से उसका पूर्णतया आदान-प्रदान नहीं किया जाता। इसके अलावा जो भी जानकारियां उपलब्ध हैं हर देश उन उपलब्ध सूचनाओं और आंकड़ों को इस तरह से प्रदर्शित करना चाहता है जिससे उसे लाभ मिले।

 हम जमीन पर लकीरें खींच सकते हैं लेकिन प्रकृति और पर्यावरण की सीमाएं नहीं बना सकते। यदि पृथ्वी के पर्यावरण में असंतुलन पैदा होगा तो नतीजा सभी को भुगतना होगा। सभी राष्ट्र पर्यावरण हितैषी नीति और नियमों पर सैद्धांतिक रूप से सहमत हो सकते हैं लेकिन अपनी वर्तमान और भावी जनसंख्या को मूलभूत सुविधाएं मुहैया करवाना भी हर देश के लिए महत्वपूर्ण है। यदि संरक्षण के नीति, नियम मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनाई जा रही प्रक्रिया में बाधक प्रतीत होंगे तो इनके क्रियान्वयन पर सर्व सहमति कायम नहीं हो सकेगी। वर्तमान में हमें प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन ऐसे करना होगा कि उनका संरक्षण भी हो और भविष्य की जनसंख्या को मूलभूत सुविधाओं की आपूर्ति भी हो सके।

सबसे बड़ी चुनौती इस विषय पर पर्याप्त ज्ञान का अभाव है। जो कुछ उपलब्ध है, विभिन्न कारणों से उसका पूर्णतया आदान-प्रदान नहीं किया जाता। इसके अलावा जो भी जानकारियां उपलब्ध हैं, हर देश उन उपलब्ध सूचनाओं और आंकड़ों को इस तरह से प्रदर्शित करना चाहता है, जिससे उसे लाभ मिले। यही कारण है कि जहां सर्व सहमति बननी चाहिए थी, वहां तर्क-वितर्क पैदा हो जाते हैं। दूसरी चुनौती यह है कि हर देश विकास के अलग-अलग चरण में है। सभी को भौतिक प्रगति चाहिए। ऐसा विकास चाहिए, जो नजर आए, जो प्रसिद्धि लेकर आए। सभी विकासशील और गरीब देशों ने विकास का रोल माडल वही माना है, जो विकसित देशों ने बनाया है। जब विकास की अवधारणा और पर्यावरण का संरक्षण दोनों अलग-अलग विषय बन जाएं तो किसी भी नीति के क्रियान्वयन में समस्या आना निश्चित है। मेरा मत है कि क्षेत्र विशेष की पारिस्थितिकी को देखते हुए ऊर्जा उपभोग की अधिकतम इकाई को न्यायसंगत ढ़ंग से तय किया जाना चाहिए।

असल में यदि हमें अपनी पृथ्वी और उसके पर्यावरण को सहेजना है और सभी प्राकृतिक संपदाएं अगली पीढ़ी को सौंपना है तो हमें विकास का वह माडल अपनाना पड़ेगा जिसके केंद्र में पारिस्थितिकी तंत्र हो ना कि अर्थतंत्र। पारिस्थितिकी तंत्र को सहेजते हुए भी हमें आजीविका उपार्जन के साधन मिल सकते हैं। जिस तरह हम जीडीपी को विकास का पैमाना मानते हैं, नागरिकों की प्रसन्नता, उनके स्वास्थ्य को भी तो विकास का पैमाना बनाया जा सकता है। हैप्पीनेस इंडेक्स के बारे में विमर्श होता है, हम ऐसे नए पैमाने भी गढ़ सकते हैं। हिंदू धर्म में सभी देवी-देवताओं के निवास किसी वृक्ष, तालाब, नदी अथवा पहाड़ पर बताए गए हैं। उनके वाहन के रूप में किसी जानवर को दर्शाया गया है। सांकेतिक रूप से हमें समझाया गया है कि हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आवश्यक है इन सबकी मौजूदगी, सबकी कुशलता। गांधीजी ने कहा था कि इंसान की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है, लालसाओं को नहीं। हम आजकल सामूहिक रूप से लालसाओं के पीछे भाग रहे हैं और इन्हें पूरा करने के लिए कई महत्वपूर्ण पहलुओं को अनदेखा कर रहे हैं।

इन तमाम समस्याओं का समाधान भारतीय दर्शन में हैं जो इंसान को संतोषी रहने और अपने इर्द-गिर्द हर जीव-जंतु और वनस्पति में ईश्वर का रूप देखने का संदेश देता है। भारत सरकार की अर्थ गंगा संकल्पना, नमामी गंगे मिशन, स्वच्छ भारत अभियान, वोकल फार लोकल जैसे कार्यक्रमों की बुनियाद इन्हीं सिद्धांतों पर रखी गई है। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत इन नीतिगत सिद्धांतों से नेतृत्व की पहल कर रहा है। कोप 21 क्रांफ्रेंस में भारत ने फ्रांस के सहयोग से इंटरनेशल सोलर एलायंस के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई। भारत अपशिष्ट से ईंधन जैसे एथनाल का निर्माण और हाइड्रोजन का इस्तेमाल ईंधन के रूप में करने जैसे नवीन प्रयोग को वृहद स्तर पर अपनाने के लिए प्रयासरत है। इस समय भारत तकनीकी और नीतिगत रूप से समूचे विश्व को मार्गदर्शन देने और इन चुनौतियों का समाधान देने में सक्षम है।

भारतीय दर्शन में वसुधैव कुटुंबकम अवधारणा के तहत पर्यावरण से जु़ड़ी सभी समस्याओं के समाधान मौजूद हैं। अगर हर देश खुद को दुनिया रूपी परिवार का एक सदस्य समझे तो निश्चितरूप से अपने हितों की पूर्ति के लिए वह ऐसा कोई काम नहीं करेगा जिससे दूसरे देश को कष्ट पहुंचे।