दुर्गानवमी पर घाटी के मंदिरों में कश्मीर पंडितों ने की विशेष पूजा, नहीं दिखा आतंकियों का खौफ

 

मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी उसी तरह साथ दिया जैसे कि वे पहले दिया करते थे।
मंदिर के प्रबंधक मक्खन लाल कौल ने बताया कि घाटी में जब से आतंकवादियों ने अल्पसंख्याकाें की हत्या की है उसी दौरान से तनाव जैसी स्थिति है। ये पूजा जो आज हो रही है दरअसल 12 अक्टूबर को की जानी थी।

श्रीनगर: कश्मीर में आतंकियों ने बेशक पिछले कुछ सप्ताह में चुन-चुनकर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगोें को निशाना बनाकर उनमें भय पैदा करने का प्रयास किया हो लेकिन उनकी यह साजिश सफल होती नहीं दिख रही। दुर्गानवमी पर जिस तरह से वादी के मंदिरों में की गई विशेष पूजा में कश्मीरी पंडितों के साथ अन्य समुदाय के लोग शामिल हुए उससे यह साफ है कि न तो उनमें आतंकियों का कोई खौफ है और न ही सांप्रदायिक सौहार्द पर कोई फर्क पड़ा है।

कश्मीरी पंडित समुदाय भले ही घाटी से विस्थापित होकर देश-विदेश में रह रहे हों परंतु वे आज भी आपनी परंपरा और रीति-रिवाजों को उसी तरह मनाते हैं, जैसा की वे घाटी में रहते हुए निभाते थे। यही वजह है कि हर साल की तरह इस बार भी कश्मीरी पंडितों ने सोनवार इलाके में स्थित दुर्गा मंदिर में महानवमी पर विशेष पूजा की। खुशी की बात यह है कि इस पूजा के आयोजन में वहां रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी उसी तरह साथ दिया जैसे कि वे पहले दिया करते थे।

यह नजारा व अवसर घाटी में समुदायों में दरार कायम करने का प्रयास करने वाले आतंकी संगठनों के मुंह पर तमाचे के समान है। कश्मीरी पंडित भाइयों की पारंपरिक पूजा के आयोजन में पूरा साथ देकर वहां रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि वादी में रह रहे हिन्दू उनके भाई हैं और कश्मीर का हिस्सा हैं। मंदिर के प्रबंधक मक्खन लाल कौल ने बताया कि घाटी में जब से आतंकवादियों ने अल्पसंख्याकाें की हत्या की है, उसी दौरान से तनाव जैसी स्थिति है। ये पूजा जो आज हो रही है, दरअसल 12 अक्टूबर को की जानी थी। पंडित समुदाय इसे निर्धारित समय पर ही करना चाहता था परंतु प्रशासन ने हालात का हवाला देते हुए इसे दो दिन तक टालने के लिए कहा।

दो दिन बाद ही सही परंतु समुदाय में इस बात को लेकर खुशी है कि उन्होंने अपनी परंपरा के अनुसार दुर्गा मंदिर में विशेष पूजा की। उन्होंने कहा कि हालात की वजह से श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्ष की तुलना कम रही परंतु मंदिरों में पूजा की परंपरा को कायम रख और इसमें शामिल होकर कश्मीरी पंडितों ने यह जाहिर कर दिया है कि कश्मीर उनका भी है। यहां रहने वाले मुस्लमान भाइयों ने भी इसमें पूरा सहयोग दिया।

वहीं उड़ीसा से आए रामपाल कपूर ने कहा कि वह और उनका परिवार पिछले नौ वर्षों से हर साल दुर्गानवमी की पूजा करने के लिए यहां आते हैं। हमने यहां कभी भी असुरक्षित महसूस नहीं किया। पूजा में शामिल होने के लिए विशेष तौर पर आए पंडित समुदाय के लोगों ने प्रशासन से अपील की कि अब घाटी में हत्याओं का सिलसिला रूकना चाहिए। वह अपने पूर्वजों की इस भूमि को बहुत याद करते हैं। यहां ऐसा माहौल बनाएं कि सभी समुदायों के लोग शांति और सद्भाव से रहें।