गाय के गोबर से बने रंग-बिरंगे दीप से जगमग होंगे घर-आंगन, बेहद सस्ते हैं दीये

 

इस दिवाली गोबर से बने दीप सजाएंगे घर-आंगन

गाय के गोबर से बने रंग-बिरंगे दीप घर आंगन को जगमगाएंगे। गोबर से बने दीपों की माला न केवल घरों में रोशनी बिखेरेगी बल्कि पर्यावरण को भी संरक्षित करेगी। हर दिन स्थानीय निवासियों के अलावा दूर-दराज से आए लोग इसकी खरीदारी कर रहे हैं।

नई दिल्ली । इस बार दिवाली की खुशियों में चार चांद लगाने के लिए गाय के गोबर से बने रंग-बिरंगे दीप घर आंगन को जगमगाएंगे। गोबर से बने दीपों की माला न केवल घरों में रोशनी बिखेरेगी बल्कि पर्यावरण को भी संरक्षित करेगी। दिल्ली के मुखमेलपुर गांव में गोबर के दीपों की रचना को हरित भू संस्था के अध्यक्ष विकास भारतीय ने एक मुहिम के तौर पर चलाया है। जिससे देशी उत्पाद और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिल सके। हर दिन स्थानीय निवासियों के अलावा दूर-दराज से आए लोग इसकी खरीदारी कर रहे हैं।ऐसे में गाय के उत्पादों से बनी वस्तुओं में अब गाेबर के दीये भी शामिल हो गए हैं जो लोगों को वर्षों तक आकर्षित करते रहेंगे।

21 हजार गोबर के दीये बनाने का लक्ष्य

वर्ष 2009 से गोबर के दीपों को बढ़ावा दे रहे विकास ने इस दिवाली लगभग 21 हजार गोबर के दीपों को बनाने का लक्ष्य रखा है। और अबतक करीब पांच हजार दीये की बिक्री हो चुकी है। कारीगर हर दिन इसे बनाने में जुटे हैं। मशीन के साथ साथ हाथों से भी दीये बनाए जा रहे हैं। ऐसे में दिवाली के नजदीक आने पर इसकी मांग को देखते हुए उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। इसे बनाने के लिए केवल देसी गाय के गोबर का प्रयोग होता है। मिट्टी के एक दीये की कीमत डेढ़ से दो रुपये होती है जबकि गोबर से बना एक दीया एक रुपये का है।

धुआं किए बगैर ही दीप बनकर तैयार

खास बात यह है कि गोबर के दीये बनाने के लिए इसे आग में तपाना नहीं पड़ता। दो दिनों तक धूप में सुखाने के बाद ही यह बनकर तैयार हो जाता है। इसके बाद इसपर अलग-अलग रंगों से रंगे जाने पर यह और भी खूबसूरत हो जाता है। जबकि मिट्टी के दीये को 6-7 घंटे आग में पकाया जाता है। इसमें बड़ी मात्रा में लकड़ी और कोयला खर्च होता है। इससे निकलने वाला धुआं हवा को प्रदूषित करता है। गोबर के दीये में 70 फीसदी गोबर होता है और 30 फीसदी मिट्टी। दीये को जलाते समय इसमें आग न पकड़े इसलिए मिट्टी मिलाई जाती है।

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संस्थाओं के माध्यम से बढ़ावा

मुखमेलपुर में बनाए जाने वाले गोबर के दीयों को अलग अलग संस्थाएं व गोशाला खरीदकर लोगों में निश्शुल्क वितरण करती हैं। इसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक, विश्व हिंदू परिषद के अलावा घेवरा की आयुर्वेदिक गौशाला व कैंसर अस्पताल शामिल हैं। यह सभी गोबर के दीपों व अन्य उत्पादों के वितरण का इंतजाम करते हैं।

घेवरा स्थित आयुर्वेदिक कैंसर अस्पताल के प्रधान अतुल सिंघल ने बताया कि यह रंग-बिरंगे दीये पर्यावरण के अनुकूल और सुरक्षित हैं। उनके अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर गोबर के दीये के उत्पादन का उद्देश्य गोशालाओं को स्वावलंबी बनाना और लोकल से वोकल को जोड़ना है।

हरित भू संस्था के अध्यक्ष विकास भारतीय ने कहा कि देसी गाय के गोबर से बने दीप पर्यावरण के लिहाज से काफी बेहतर हैं। हर किसी को इनके इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहिए। इस बार जितनी संख्या में इसे बनाया गया है, उम्मीद है कि अगले वर्ष इससे कहीं ज्यादा की मांग होगी।

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