...जब कब्जा करने आए हजारों चीनियों पर टूट पड़े थे 120 भारतीय वीर

 

शहीद सैनिकों में से 30 हरियाणा के रेवाड़ी से थे।
 सुबह सवा आठ बजे उन्होंने जब शहादत पाई तो कुछ जवानों ने उनका पार्थिव शरीर दुश्मन से बचाने के लिए बर्फ में छिपा दिया। चीन रेंजागला पर कब्जा नहीं कर पाया। दो दिन बाद 20 नवंबर को उसने सीज फायर कर दिया।

जम्मू : पूर्वी लद्दाख के चुशुल में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शून्य से 20 डिग्री नीचे के तापमान में चीनी सेना को मुंहतोड़ जवाब देने का जज्बा पिछले छह दशक से आज भी जस का तस है। नवंबर की ठंड में भी सेना के हिमवीर वैसी ही असाधारण वीरता दिखाने को तत्पर हैं जो नवंबर 1962 में रेंजाग ला की जंग में 120 भारतीय जांबाज जवानों ने दिखाई थी। 18 हजार फीट ऊंची रेजांग ला चोटी पर खून जमाने वाली ठंड में मुस्तैद हर सैनिक का हौसला बढ़ाने 18 नवंबर को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सहित सेना के कई बड़े अधिकारी भी चुशुल आ सकते हैं। बताया जाता है कि सेना ने उस समय पांच घंटे चीन के सात हमले नाकाम किए थे।

15 हजार फीट की ऊंचाई पर नए रेजांग ला वार मेमोरियल पर लहरा रहा 108 फीट उंचा तिरंगा पूर्वी लद्दाख में तैनात हर सैनिक को देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा दे रहा है। सेना 1962 के शहीदों की याद में 18 नवंबर को रेजांग ला डे मना रही है। रेजांग ला में 14 कोर की चुशुल ब्रिगेड बड़े पैमाने पर कार्यक्रम की तैयारी कर रही है।

गत माह थलसेना अध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे ने चुशुल में जवानों का हौसला बढ़ाने के साथ रेजां गला वार मेमोरियल में शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी। इस समय लद्दाख में डटे जवानों ने 1962 में भारतीय सैनिकों की वीरता की परंपरा को कायम रखने का प्रण किया है। पूर्वी लद्दाख के गलवन में भी जवान कुछ इसी तरह की वीरता दिखा चुके हैं।18 नवंबर 1962 को भारतीय सेना की 13 कुमाउं रेजीमेंट के 120 वीरों ने परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह की कमान में 1300 चीनी सैनिकों को मार गिराया था। इनमें 114 सैनिकों ने शहादत पाई। पांच सैनिक को चीनियों ने पकड़ लिए थे जो बाद में उनके चंगुल से भाग गए थे। शहीद सैनिकों में से 30 हरियाणा के रेवाड़ी से थे।

कैसे लड़ी गई थी लड़ाई : चुशुल पर कब्जा करने के लिए चीन ने 18 नवंबर सुबह साढ़े तीन बजे रेजांगला पोस्ट पर हमला बोल दिया था। 13 कुमायूं की प्लाटून नंबर 8 के जवान बिना संसाधन मुस्तैद थे। एलएमजी पर वीर चक्र विजेता हुकमचंद मोर्चा संभाले थे। 10 मिनट बाद प्लाटून नंबर 7 ने रेडियो पर सूचना दी थी कि 14 से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर 400 दुश्मन पहाड़ी चढ़ रहे हैं। रेजीमेंट की 9 प्लाटूनों में दो पर सुबह साढ़े सात बजे तक चीन सैनिक हावी हो चुके थे। मेजर शैतान सिंह ने 550 मीटर पर अपनी प्लाटून नंबर 9 तक पहुंच चीनी सैनिकों को रोकने की चढ़ाई की। सुबह वह पेट पर गोली लगने के बाद भी नहीं हटे। सुबह सवा आठ बजे उन्होंने जब शहादत पाई तो कुछ जवानों ने उनका पार्थिव शरीर दुश्मन से बचाने के लिए बर्फ में छिपा दिया। चीन रेंजागला पर कब्जा नहीं कर पाया। दो दिन बाद 20 नवंबर को उसने सीज फायर कर दिया।

सैन्य दृष्टि से अहम है रेजांग ला : रेजांग ला से भारतीय सेना चीन की मोल्डो डिवीजन की निगरानी कर सकती है। उसकी नजर दुश्मन के स्पानगूर गैप पर भी है। यह कुर्बानियों का ही नतीजा है कि आज ऊंचाई वाली इलाकों में चोटियों पर भारतीय सेना दुश्मन की सेना को सीधी चुनौती दे रहे हैं।

तीन माह बाद मिले थे बर्फ में जमे पार्थिव शरीर : अपने से कई गुणा मजबूत चीन की सेना को कड़ी टक्कर देते शहीद हुए भारतीय सैनिकों के पार्थिव शरीर तीन महीने बाद बर्फ से मिले थे। हर शहीद की छाती पर गोलियां लगी थी। उनके हाथों में बंदूक थी। कई ऐसे थे जिनके हाथ में दुश्मन पर दागने के लिए ग्रेनेड थे। उनमें से एक पार्थिव शरीर नर्सिंग असिस्टेंट धर्मपाल का था जब घायलों की मरहम पट्टी करते शहीद हुए थे। कई जवान बंदूक पर लगी अपनी खोखरी को ताने हुए शहीद हुए। मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र मिला तो आठ जवानों ने बहादुरी के लिए वीर चक्र हासिल किया।

जब जंग के समय मेजर ने वापस भेजा था एक सैनिक : जंग के दौरान मेजर शैतान सिंह ने रेजांगला की लड़ाई में भारतीय सैनिकों की वीरता बयां करने के लिए एक सैनिक को पीछे भेज दिया था। उन्हें अंदाजा हो गया था कि हजारों दुश्मन को रोकना आसान नहीं होगा। उन्होंने एक सैनिक को भेज दिया था जिसने जाकर सूचित किया था कि रेजांगला में जवानों ने असाधारण बहादुरी दिखाई। बाद में दिल्ली से पहुंचे वरिष्ठ अधिकारियों ने मौके पर देखा कि सभी जवानों की छाती पर गोलियां लगी थी व वे लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए।