हर साल करीब 15 करोड़ लोग होते हैं यूरीनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का शिकार, जल्द इलाज मिलने की उम्मीद

 

आर्गेनिक फ्रेमवर्क आधारित नए टीके का किया विकास, लंबे समय तक रहेगा प्रभावी
चूहों पर किए गए इस अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि इस तरीके के इस्तेमाल से एंटीबाडी के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और उसके बने रहने की दर पारंपरिक मानक होल-सेल वैक्सीन की तुलना अधिक भी रही।

टेक्सास, एएनआइ। एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया के कारण मूत्र मार्ग संक्रमण (यूरीनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन- यूटीआइ) का इलाज कठिन हो जाता है। ऐसे में बेहतर इलाज के तरीके विकसित करना समय की जरूरत है। इस दिशा में यूनिवर्सिटी आफ टेक्सास के शोधकर्ताओं ने एक नए टीके के विकास की संभावना तलाशी है। उनके द्वारा किया गया शोध अमेरिकन केमिकल सोसायटी के ‘एसीएस नैनो जर्नल’ में प्रकाशित हुआ है।

बायोलाजिकल साइंसेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डाक्टर निकोल डी निस्को और केमेस्ट्री एंड बायोकेमेस्ट्री की एसोसिएट प्रोफेसर डाक्टर जेरेमियाह गैसेंस्मिथ ने हाल ही में दर्शाया है कि मेटल-आर्गेनिक फ्रेमवर्क्‍स (एमओएफ) का इस्तेमाल करते हुए बैक्टीरिया की पूरी कोशिकाओं को एक छोटे से आवरण में एकत्र कर उन्हें निष्क्रिय कर एक डिपो (भंडार) तैयार किया जा सकता है, जिससे शरीर को लंबे समय तक टीके का लाभ मिल सकेगा। दुनिया में हर साल लगभग 15 करोड़ लोग यूटीआइ से पीड़ित होते हैं।

चूहों पर किए गए इस अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि इस तरीके के इस्तेमाल से एंटीबाडी के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और उसके बने रहने की दर पारंपरिक मानक होल-सेल वैक्सीन की तुलना अधिक भी रही। होल-सेल वैक्सीन- निष्क्रिय जीवाणु से निर्मित होते हैं, जिसमें रोगाणु को या तो फिजिकल या केमिकल प्रक्रिया से मार दिया जाता है, जिससे कि वे रोगाणु रोग उत्पन्न नहीं कर सकते। डी निस्को ने बताया कि एंटीबायोटिक के प्रभावी नहीं रह जाने की स्थिति में बार-बार होने वाले यूटीआइ की रोकथाम टीकाकरण से की जा सकती है। उनके अनुसार, एंटीबायोटिक से बैक्टरिया के नहीं मरने या एंटीबायोटिक्स से होने वाली तेज एलर्जी के कारण रोगियों खासकर बुजुर्गो के ब्लाडर को काफी नुकसान होता है। एक बार यदि ब्लाडर से बैक्टीरिया का सफाया भी हो जाए तब भी ये कहीं और बचे रह जाते हैं और धीरे-धीरे एंटीबायोटिक प्रतिरोधी हो जाते हैं।

गैसेंस्मिथ ने बताया कि 2018 के बाद हमने इस डिपो या भंडार में एंटीजन को जमा कर उसे धीरे-धीरे स्नवित होने वाला बेहतर पूर्ण कोशिकीय (होल-सेल) टीका बनाने का विचार किया। आमतौर पर टीके में रोग पैदा करने वाले कमजोर या मृत जीवाणु या उनके छोटे से अवयव का इस्तेमाल किया जाता है। इससे पैदा होने वाली एंटीबाडी किसी एक रोग की रोकथाम करती है। लेकिन बैक्टीरिया रोधी टीका बनाना वायरस रोधी टीका विकसित करने की तुलना में ज्यादा जटिल होता है, क्योंकि बैक्टीरिया का आकार बड़ा होता है। इसलिए इसका कोई एक अवयव चुनना कठिन है। इसी वजह से पूरे बैक्टीरिया को चुनना श्रेयस्कर था। लेकिन होल-सेल बैक्टीरिया वाले टीके की एक समस्या यह है कि यह लंबे समय तक शरीर को पर्याप्त प्रतिरक्षा प्रदान नहीं कर पाता है। इसीलिए उन्होंने एमओएफ एंटीजन डिपो बनाया, जो मृत रोगाणुओं (पैथोजन) को उत्तकों में लंबे समय समय बनाए रखता है और जब संक्रमण होता तो पूरी इम्युनिटी (प्रतिरक्षा) उपलब्ध कराता है।

नए टीके से होगा इलाज। 

कैसा है मेटल-आर्गेनिक फ्रेमवर्क

शोध टीम ने एक खास प्रकार के बैक्टीरिया सेल को क्रिस्टलाइन पोलीमेरिक मैटिक्स वाले मेटल-आर्गेनिक फ्रेमवर्क में जमा किया। यह न सिर्फ बैक्टीरिया को मारता है, बल्कि उन मृत कोशिका को उच्च तापमान, नमी तथा आर्गेनिक साल्वेंट से बचा कर स्थिर भी बनाए रखता है।शोधकर्ताओं ने अपने प्रयोग के दौरान ई-कोली बैक्टीरिया के स्ट्रेन का इस्तेमाल किया। इस बैक्टीरिया के किसी भी रोगजनक स्ट्रेन के लिए अभी कोई टीका नहीं है और यही बैक्टीरिया 80 प्रतिशत रोगियों को प्रभावित करता है। जब नया विकसित टीका लगाने के बाद चूहों को इस बैक्टीरिया से इंजेक्शन के जरिये संक्रमित किया गया तो नया टीका पारंपरिक टीके ज्यादा कारगर रहा।