दिल्ली कांग्रेस में 'घुटन' बढ़ी, 2 साल में 50 नेताओं ने छोड़ा साथ; सोनिया-राहुल पर उठ रहे सवाल

दिल्ली कांग्रेस में 'घुटन' बढ़ी, 1 साल में 50 नेताओं ने छोड़ा साथ; सोनिया-राहुल पर उठे सवाल
दो साल से भी कम समय में सांसद पूर्व मंत्री विधायक पार्षद और जिला अध्यक्ष रहे 50 से अधिक नेता हाथ का साथ छोड़ चुके हैं। नगर निगम चुनाव तक पार्टी छोड़ने की तै

नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। एक-एक कर पुराने नेताओं के पार्टी को अलविदा कहने से देश की राजधानी में कांग्रेस का कुनबा तो सिमट ही रहा है, पार्टी के नेतृत्व पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेसियों में राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व दोनों के प्रति ही गहरी नाराजगी है। आलम यह है कि दो साल से भी कम समय में सांसद, पूर्व मंत्री, विधायक, पार्षद और जिला अध्यक्ष रहे 50 से अधिक नेता हाथ का साथ छोड़ चुके हैं। हैरत की बात यह है कि नगर निगम चुनाव तक पार्टी छोड़ने की तैयारी कर रहे नेताओं की फेहरिस्त अब भी खासी लंबी है।

वर्ष 1998 से 2013 तक लगातार 15 साल दिल्ली की सत्ता पर राज करने वाली कांग्रेस सत्ता से बाहर होते ही कमजोर होती चली गई। जयप्रकाश अग्रवाल के बाद अरविंदर सिंह लवली, अजय माकन, शीला दीक्षित और सुभाष चोपड़ा के अध्यक्षीय कार्यकाल में फिर भी प्रदेश कांग्रेस जैसे तैसे घिसटती रही, लेकिन वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी के नेतृत्व में नेताओं के पार्टी छोड़ने की रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही। एक सप्ताह के भीतर दो और बड़े विकेट गिर गए।

पिछले बुधवार को शीला दीक्षित सरकार में मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष रहे डा. योगानंद शास्त्री ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की सदस्यता ले ली तो मंगलवार को पूर्व सांसद कीर्ति आजाद पत्नी पूनम आजाद के साथ तृणमूल कांग्रेस में चले गए।दिल्ली में पार्टी का जनाधार तो खत्म हो ही रहा है, आलाकमान भी शायद प्रदेश इकाई को लेकर बहुत गंभीर नहीं हैं। शायद इसीलिए करीब पौने दो साल पहले वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद महाबल मिश्रा को पार्टी निलंबित करके ही भूल गई।

कमोबेश सभी पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री पार्टी से दूरी बनाकर चल रहे हैं। दो जिलाध्यक्ष मदन खोरवाल और एआर जोशी प्रभारी के समक्ष काम नहीं करने की इच्छा जता चुके हैं। जिन सात जिलाध्यक्षों को हाल ही में हटाया गया है, वे भी पार्टी नेतृत्व के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। ब्लाक स्तर पर तो कांग्रेस कहीं नजर ही नहीं आती।खुद को अपने घरों तक सीमित रखे हुए पार्टी के बड़े नेताओं का मानना है कि न तो कभी पार्टी छोड़ने वालों को रोकने का प्रयास किया जाता है और न ही सभी को जोड़े रखने की कोई कोशिश नजर आती है। ज्यादातर नेताओं की शिकायत पार्टी में मान-सम्मान नहीं मिलना है। हालांकि, बहुत से नेताओं ने प्रदेश प्रभारी शक्ति ¨सह गोहिल और आलाकमान तक भी पार्टी की मौजूदा स्थिति और इसमें सुधार के लिए अपनी बात पहुंचाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

कांग्रेस छोड़ने वाले प्रमुख नेता

पूर्व सांसद: कीर्ति आजाद

पूर्व मंत्री: डा. योगानंद शास्त्री

पूर्व विधायक: प्रहलाद सिंह साहनी, शोएब इकबाल, राम सिंह नेताजी, अंजलि राय

मौजूदा पार्षद: सुरेंद्र सेतिया, गुड्डी देवी, सुल्ताना आबाद, आले मोहम्मद इकबाल, अर्पिया चंदेला, गीतिका लूथरा, उषा शर्मा, तर्वन कुमार, नीतू चौधरी

पूर्व पार्षद: आनंद सिंह, कविता मल्होत्रा, सुभाष मल्होत्रा, अंजना पारचा, पंकज लूथरा, हेमचंद गोयल, अशोक भारद्वाज, इंदु वर्मा, राकेश जोशी, ममता जोशी, पृथ्वी सिंह राठौर, प्रवेश चौधरी, रेखा चौधरी, प्रदीप शर्मा, राजकुमारी ढिल्लो, हर्ष शर्मा, शशि बाला सिंह, ज्योति अग्रवाल, नैना प्रेमवानी, भूमि रछोया, खुर्रम इकबाल, मीनाक्षी चंदेला, सुनीता सुभाष यादव, विमला देवी, माया देवी, रवि कल्सी, मंजू सेतिया, बबली नागर, एन. राजा, विकास टांक

कीर्ति आजाद (पूर्व सांसद) का कहना है कि कांग्रेस में अब घुटन वाला माहौल हो गया है। संगठन लगातार कमजोर रहा है, लेकिन नेतृत्व को कोई चिंता नहीं है। दिल्ली कांग्रेस तो इतने गुटों में बंट चुकी है कि जब देखो लोग एक दूसरे की काट करने में जुटे रहते हैं। किसी के प्रति कोई सम्मान नहीं रह गया है।

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