सरकारी स्कूलों में बढ़ती नामांकन दर के कई कारणों में से एक महामारी से प्रभावित लोगों की आमदनी

 

सरकारी स्कूलों में नामांकन प्रतिशत में वृद्धि के कई कारण है। फाइल
बीते एक वर्ष के दौरान सरकारी स्कूलों में नामांकन दर बढ़ी है। ऐसे में इसके प्रमुख कारणों को भी समझना चाहिए। क्या वाकई में सरकारी स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था में सुधार हुआ है या महामारी जनित कारणों से लोगों की आमदनी प्रभावित होने के कारण ऐसा हुआ है।

 कोविड महामारी ने बच्चों की जिंदगी के कई अहम पहलुओं को प्रभावित किया है। इसमें बच्चों की स्कूली शिक्षा खास तौर से प्रभावित हुई है। आनलाइन माध्यम कितना प्रभावशाली विकल्प बनकर उभरा है और इससे किस तबके के बच्चे अधिक लाभान्वित हुए हैं, ऐसे ठोस आंकड़ों को सामने लाने के लिए सर्वे किए जा रहे हैं। ऐसा ही एक हालिया सर्वे बताता है कि पिछले एक साल में सरकारी स्कूलों में दाखिले सात प्रतिशत बढ़े और निजी स्कूलों में नामांकन की दर में नौ प्रतिशत तक की गिरावट आई है।

हमारे देश में ‘डिजिटल डिवाइड’ को लेकर चिंता बनी हुई है। ट्यूशन लेने की प्रवृत्ति में बढ़ोतरी हुई है। सरकारी स्कूलों में नामांकन में वृद्वि से सरकारी शिक्षा तंत्र अपनी पीठ थपथपा सकता है, लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि नामांकन के मामले में निजी स्कूलों से सरकारी स्कूलों के आगे निकलने की एक अहम वजह वर्तमान महामारी में बहुत सारे लोगों की आमदनी कम होने के साथ ही गरीबी का बढ़ना और निम्न आय वाले रिहायशी इलाकों में अनेक निजी स्कूलों का बंद होना भी है। दरअसल आय के सिकुड़ते साधनों ने अभिभावकों को यह फैसला लेने को बाध्य किया होगा। अब केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे अभिभावकों के भरोसे पर खरा उतरने के लिए गुणात्मक शिक्षा मुहैया कराने की दिशा में मजबूती से कदम उठाएं।

गौरतलब है कि असर (एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट 2021) के लिए ‘प्रथम’ नामक संस्था ने यह सर्वे सितंबर-अक्टूबर में देश के तीन केंद्र शासित प्रदेश समेत 25 राज्यों के 581 जिलों के 17,184 गांवों के 7,299 स्कूलों के 75,234 बच्चों के बीच किया गया। इसमें 5-16 आयुवर्ग के बच्चों से फोन पर बातचीत की गई। यह सर्वेक्षण नामांकन, शिक्षण सामग्री तक पहुंच, डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता व उनके इस्तेमाल आदि पर केंद्रित था। सर्वेक्षण बताता है कि पिछले एक साल में सरकारी स्कूलों में नामांकन 65.8 प्रतिशत से बढ़कर 70.3 प्रतिशत हो गया है। सरकारी स्कूलों में नामांकन में वृद्धि का रुझान बीते दो वर्षो से जारी है।

उल्लेखनीय यह है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में वर्ष 2018 की तुलना में 2021 में 13.2 प्रतिशत अंक की वृद्धि के साथ इस मामले में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई। तेलंगाना को छोड़कर, दक्षिणी राज्यों के सभी सरकारी स्कूलों में आठ प्रतिशत से अधिक की वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2006 से 2018 तक यानी 12 वर्षो में निजी स्कूलों में नामांकन में वृद्धि का रुझान लगातार बना रहा और 2018 में यह दर 30 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। लेकिन बीते दो वर्षो से यह रुझान पलट रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता में अचानक कोई बड़ा बदलाव आ गया जिसने भारतीय ग्रामीण मानस को यह फैसला लेने को विवश कर दिया हो। ऐसा नहीं है। कोविड महामारी की मार यानी आर्थिक मंदी, तंगी व शहरों से गांव वापसी, कम फीस वाले निजी स्कूलों का बंद होना सरीखे कारण साफ नजर आते हैं। इसमें 62.4 प्रतिशत लोगों ने आर्थिक तंगी जबकि 15.5 प्रतिशत ने पलायन को कारण बताया।

वर्ष 2005 से प्रकाशित हो रही ‘असर’ रिपोर्ट हर साल देश की शिक्षा के स्तर को सरकार व अन्य लोगों के सामने सार्वजनिक करती है। कोविड पूर्व काल में भी शिक्षा का स्तर चिंताजनक ही था और कोविड में करीब डेढ़ साल तक बच्चों की स्कूली कक्षाओं से दूरी ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। इस संदर्भ में असर की हालिया रिपोर्ट में कर्नाटक के 28 जिलों के आंकड़े आगाह करने वाले हैं। यहां वर्ष 2018 में सरकारी स्कूलों के तीसरी कक्षा के 41 फीसद बच्चे पहली कक्षा के स्तर की पाठ्य-पुस्तकें पढ़ सकते थे, अब उनकी संख्या 24 फीसद रह गई है। इसी तरह दहाई की संख्या पहचानने वालों की संख्या 78 फीसद से कम होकर 60 फीसद रह गई है। देश में लंबे समय तक 15 लाख स्कूलों के करीब 25 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा सके। आनलाइन पढ़ाई का बंदोबस्त किया गया, लेकिन इसके बावजूद अधिकांश राज्यों के बच्चों को पढ़ाई के स्तर पर भारी नुकसान हुआ है।

कोविड महामारी एक स्वास्थ्य संकट के तौर पर शुरू हुई, साथ ही बाद में लंबे समय तक स्कूलों के बंद रहने के चलते तेजी से ‘लर्निग’ संकट में बदल गई। इस संकट की परिकल्पना को हाल ही में यूनिसेफ ने 14-20 नवंबर बाल अधिकार सप्ताह के दौरान दिल्ली में प्रतीकात्मक ‘महामारी कक्षा’ के दृश्य की संरचना के जरिये बताने का प्रयास किया। यूनिसेफ इंडिया के भारत प्रतिनिधि ने इस संदर्भ में चिंता जताते हुए कहा, ‘दुर्भाग्यवश स्कूल बंद होने के कारण इसकी सबसे अधिक कीमत बच्चे चुका रहे हैं। एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि बहुत से बच्चे तो पढ़ना-लिखना ही भूल गए होंगे।’

जहां तक डिजिटल उपकरणों के जरिये आनलाइन लर्निग वाले अहम कारक के योगदान वाला बिंदु है तो उस संबंध में असर 2021 रिपोर्ट बताती है कि केवल 21 प्रतिशत छात्रों को ही पढ़ाई के लिए हमेशा स्मार्टफोन तक पहुंच थी और 47 प्रतिशत को कभी-कभार। देश में स्मार्टफोन की बिक्री के आंकड़े बाजार की दृष्टि से देखें तो पता चलता है कि 2018 में 38.9 प्रतिशत भारतीय परिवारों के पास स्मार्टफोन था और 2021 तक यह आंकड़ा 67.6 प्रतिशत तक पहुंच गया है। लगभग 28 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि उन्होंने बच्चों की पढ़ाई के लिए ही इसे खरीदा, परंतु 26.1 प्रतिशत बच्चे, विशेष तौर पर युवा इसका इस्तेमाल करने के लिए अभी भी संघर्षरत हैं। अब जबकि अधिकांश स्कूल खुल चुके हैं तो स्कूल प्रशासन व शिक्षण विभाग के आला अधिकारियों का ऐसे प्रयासों को अमल में लाने पर फोकस करना चाहिए, जिसके जरिये छात्र लर्निग में हुए नुकसान व अन्य अहम फासलों की भरपाई कर सकें।