सब कुछ अनुकूल, सिद्धि योग दें भगवान सूर्य को अर्घ्‍य, हरेक मनोकामाना होगी पूर्ण, इस समय का रखें ध्‍यान

 

छठ महापर्व की तैयारी शुरू। इस समय दें भगवान सूर्य को अर्घ्‍य।
 चार दिवसीय छठ महापर्व शुरू हो गया है। अंतिम दो दिन भगवान सूर्य को अर्घ्‍य दिया जाता है। इसकी तैयारी की गई है। इस बार अर्घ्‍य देन के समय सब कुछ अनुकूल है। समय का रखें ध्‍यान। निर्धारित समय पर अर्घ्‍य दें सभी मनोरथ पूर्ण होगा।

संवाद सूत्र, करजाईन बाजार (सुपौल)। :दीपावली के छह दिन बाद मनाया जाने वाला छठ पर्व का भारतीय संस्कृति में व्यापक महत्व है। यहां छठ पर्व मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। सूर्योपासना का महापर्व बिहार में घर-घर मनाया जाता है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल और पूर्वोत्तर राज्य में भी इस महापर्व को लेकर खास उत्साह रहता है। हमारे वैदिक संस्कृति में मान्यता है कि सूर्य की शक्तियों का मुख्य स्रोत उनकी पत्नियां उषा और प्रत्युषा है।

छठ में सूर्य के साथ-साथ उनकी दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। संध्याकाल अघ्र्य में सूर्य की अंतिम किरण 'प्रत्युषा' एवं प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण 'उषा' को अघ्र्य देकर दोनों को नमन किया जाता है। इस बार छठ में सिद्धि योग में सायंकालीन अध्र्यदान होने से व्रतियों के लिए समस्त प्रकार के मनोरथों की सिद्धि होगी। छठ महापर्व का महात्म्य बताते हर आचार्य पंडित धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि पुराणों के कथानुसार भगवान राम के लंकाधिपति रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या आने पर राज्याभिषेक के पश्चात रामराज्य की परिकल्पना को ध्यान में रखकर राम और सीता ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को ही उपवास रखकर प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की आराधना की और सप्तमी को पूर्ण किया।

पवित्र सरयू तट पर भगवान राम सीता के इस कठोर अनुष्ठान से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था। तब से छठ पर्व इस अंचल में विशेष रूप से लोकप्रिय हो गया। आचार्य ने कहा कि पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी के सूर्यास्त एवं सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। भगवान सूर्य की आराधना करते हुए विश्वामित्र के मुख से अनायास ही वेदमाता गायत्री प्रकट हुई थी। यह पवित्र मंत्र भगवान सूर्य के पूजन का परिणाम था। तभी से कार्तिक शुक्ल षष्ठी को समस्त अंचल विशेष में यह महापर्व मनाया जाने लगा। एक अन्य मान्यता है कि जुए में जब पांडव अपना राज-पाठ, धन-दौलत सभी को हारकर जंगल जगह घूम रहे थे, उस समय पांडवों की दुर्दशा और संकट से मुक्ति पाने के लिए द्रोपदी ने भगवान सूर्यनारायण की कठोर तप आराधना करते हुए छठ व्रत किया। फलस्वरूप पांडवों को अपना खोया हुआ राजपाठ, सम्मान, प्रतिष्ठा सभी कुछ प्राप्त हो गया।

नहाय खाय से शुरू होता है छठ का शुभारंभ

छठ पर्व का शुभारंभ कद्दू भात या नहाय खाय से होता है। कद्दू भात यानी लौकी की सब्जी और अरवा चावल का भोजन और नहाय खाय यानी गंगा या पवित्र नदी व सरोवर में स्नान करके भोजन प्रसाद पकाना व खाना। इस प्रकार छठ पूजा केवल एक पर्व ही नहीं बल्कि इसे महापर्व का दर्जा प्राप्त है। विधि विधान से यह महापर्व को करने से संपूर्ण आपदा से मुक्ति तथा सभी मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

बुधवार को होगा संध्याकालीन अघ्र्य

कार्तिक शुक्ल पक्ष में 9 नवंबर मंगलवार को छठ व्रतियों के लिए एक भुक्त खरना होगा। 10 नवंबर यानि बुधवार को छठ व्रतियों के लिए सायंकालीन अघ्र्यदान, डाला छठ एवं स्कंद षष्ठी व्रत तथा 11 नवंबर यानि गुरुवार को छठ व्रतियों के लिए प्रात: कालीन अघ्र्यदान के पश्चात व्रतियों के लिए पारण।