साधारण लोग असाधारण शिक्षक' पुस्तक में सामान्य शिक्षकों की असामान्य कहानियां

 

'साधारण लोग असाधारण शिक्षक' पुस्तक में सामान्य शिक्षकों की असामान्य कहानियां
हमारे देश में शिक्षा के समक्ष खड़ी चुनौतियां हर जिले में अलग-अलग तरह की हैं। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में बच्चों का पलायन सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों की तरफ हुआ है। यह पलायन कुछ इस तरह हुआ है।

 हमारे देश में शिक्षा के समक्ष खड़ी चुनौतियां हर जिले में अलग-अलग तरह की हैं। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में बच्चों का पलायन सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों की तरफ हुआ है। यह पलायन कुछ इस तरह हुआ है कि ज्यादातर केवल वंचित पृष्ठभूमि वाले बच्चे ही अब इन स्कूलों में रह गए हैं। पिछले एक दशक में निजी स्कूलों की संख्या में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है, जबकि इस दौरान सरकारी स्कूलों की संख्या में केवल 15 प्रतिशत तक की ही बढ़ोतरी हो सकी है।

वर्ष 2006 में हमारे केवल 25 प्रतिशत बच्चे ही निजी स्कूलों में जाते थे, जबकि वर्ष 2016 में यह आंकड़ा बढ़कर 38 प्रतिशत तक हो गया। अनेक कारणों से हमारी स्कूली शिक्षा में सबसे वंचित पृष्ठभूमि वाले बच्चे ही सरकारी स्कूलों में बचे हैं। इसका असर हमारे देश के सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ रहा है। लेकिन इस किताब में सरकारी स्कूलों के बेहतरीन शिक्षकों की उत्साहवर्धक और वास्तविक कहानियों में यह दर्शाया गया है कि शिक्षक अपने प्रयासों से स्कूलों और गांवों में इस पलायन पर न केवल अंकुश लगा रहे हैं, बल्कि बच्चों को निजी स्कूलों से वापस अपने सरकारी स्कूलों में ला रहे हैं।

पुस्तक के लेखक एस गिरिधर अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सीओओ हैैं और वह पिछले करीब दो दशकों से अजीम प्रेमजी फाउंडेशन से जुड़े हुए हैं। इस दौरान उन्होंने देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा संबंधी तमाम समस्याओं को नजदीक से समझने का प्रयास किया। उनकी ऐसे शिक्षकों से भी मुलाकात हुई, जिन्होंने अल्प संसाधनों के साथ केवल अपने जज्बे के बल पर बच्चों के लिए शिक्षा का बेहतर परिवेश तैयार कियलेखक ने ऐसे तमाम कारण बताए हैं, जो हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि सरकारी स्कूलों का समर्थन क्यों करना चाहिए। हालांकि आज की एक दुखद सच्चाई यह भी है कि हमारे देश में बड़ी अकादमिक उपलब्धियां हासिल करने वाले लोग स्कूल शिक्षक के प्रोफेशन को कम ही चुनते हैं।

अमूमन औसत अकादमिक योग्यता वाले लोग ही स्कूल शिक्षक बनते हैं और उनमें से अधिकांश की वह पहली पसंद भी नहीं होती है। लेखक ने ग्रामीण इलाकों में शिक्षकों व शिक्षा से जुड़ी तमाम समस्याओं का जिक्र भी किया है, लेकिन साथ ही उन वास्तविक कहानियों को भी दर्शाया है, जिनमें अनेक शिक्षकों ने अपनी लगन और साहस के बूते व्यवस्था की चुनौतियों के बीच अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया है। ऐसे शिक्षकों को उन्होंने असाधारण बताया है। असाधारण इसलिए, क्योंकि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में कई बार ऐसा हो सकता है कि किसी सरकारी स्कूल के शिक्षक के जीवनभर के कामकाज पर किसी का ध्यान ही न जाए और न ही अपने काम के लिए उसे कोई सम्मान मिले। लेकिन इस माहौल में भी ऐसे अनेक शिक्षक हैं, जो अपनी आंतरिक प्रेरणा से अपने स्कूल में आए वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिए यथासंभव बेहतर काम करते हैं।

जैसे सौ से अधिक बच्चों के स्कूल को पिछले कई वर्षों से अकेले संभाल रहे एक शिक्षक। एक ऐसे शिक्षक जो यह कहते हैं, 'जिन बच्चों के लिए हम अपने कामकाज का सारा समय लगाते हैं, क्या उनके लिए हमें कुछ बड़ा नहीं करना चाहिए? एक ऐसे शिक्षक जो मानते हैं, 'यह महज कोई सरकारी नौकरी नहीं है। हम इसे पूरे जिले का सबसे बेहतरीन स्कूल बनाने आए हैं। एक शिक्षक कहते हैं, 'अगर मुझे यह सुनिश्चित करना है कि मेरे बच्चे सीखें तो मुझे खुद भी सीखना होगा। ऐसे तमाम शिक्षक ही देश के असल नायक हैं।

मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई इस पुस्तक का हिंदी में सरल व सुबोध अनुवाद लोकेश मालती प्रकाश ने किया है। यदि आप शिक्षकों के उन संघर्षों के बारे में जानना चाहते हैं, जिसमें उन्होंने अल्प संसाधनों के दम पर स्कूली बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगाई तो इसके लिए आप यह पुस्तक जरूर पढ़ें।