इंटरनेट मीडिया से जुड़े सवाल, इसके इस्तेमाल को लेकर अपनानी होगी कोई संतुलित राह

 

इंटरनेट मीडिया के इस्तेमाल को लेकर अपनानी होगी कोई संतुलित राह। प्रतीकात्मक
ध्रुवीकरण का शिकार होकर दिल्ली की जनता हिंसा की आग में जलती रही। पिछले साल के आरंभ में पूर्वी दिल्ली के एक बड़े इलाके में हुई हिंसा को बढ़ावा देने में फेसबुक की भूमिका भी संदेह के दायरे में रही है जिसकी समग्रता से जांच होनी चाहिए।

 पिछले साल दंगों के बाद दिल्ली विधानसभा द्वारा गठित समिति ने फेसबुक को दो नवंबर को हाजिर होने के लिए नोटिस भेजा था। हालांकि दो हफ्ते का समय मांगने के बाद इसे 18 नवंबर कर दिया गया है। विधानसभा की इस संबंधित समिति का सामना करने से बचने में लगी फेसबुक ने उच्चतम न्यायालय की ओर रुख किया था। तमाम वरिष्ठ विधिवेत्ताओं को सेवा में लगाया। इसके बावजूद उसकी याचिका को अपरिपक्व मानकर खारिज किया गया था। इसके बाद विधानसभा में लंबित शांति और सौहार्द समिति का अधूरा काम पूरा करने की संभावना बनी।

हालांकि विधायिका ने इस मामले में कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्य क्षेत्र में अतिक्रमण किया था। यह अपरिपक्व होने के प्रमाणपत्र जैसा ही है। नतीजन फेसबुक के लिए न्यायालय में आंशिक राहत की भी गुंजाइश बनी थी। दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच की तकरार बराबर न्यायमूर्तियों की परेशानी का सबब बनती रही है। इसका फायदा उठाने के मकसद से फेसबुक ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। परंतु सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निहित राजनीति को उजागर कर चुनी हुई सरकारों को देशहित के लिए ही प्रेरित किया है।

पिछले साल फरवरी के आखिरी हफ्ते में पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद विधानसभा ने शांति और सौहार्द समिति का गठन किया था। समिति के अध्ययन में इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल कर दंगों को अंजाम देने की बात सामने आई। फलत: गवाही के लिए फेसबुक इंडिया के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अजीत मोहन को 15 सितंबर को विधानसभा में तलब किया गया था। इस प्रक्रिया में शामिल होने से बचने के लिए फेसबुक द्वारा नोटिस वापस लेने का आग्रह भी किया गया। फिर समिति के अध्यक्ष द्वारा प्रेस कान्फ्रेंस कर फेसबुक के खिलाफ किसी अभियोजन एजेंसी की तरह अतिरिक्त आरोप पत्र दाखिल करने का दावा किया जाता है। इसके बाद फेसबुक की ओर से एक याचिका उच्चतम न्यायालय में दायर की गई थी।

अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद आठ जुलाई को ही फैसला सुनाया था। इसकी चर्चा दो अहम वजहों से जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की नसीहतों को ध्यान में रखने से उन कमियों को दूर किया जा सकता है, जिनकी वजह से शासन के सवाल पर दिल्ली और केंद्र की सरकारें आंखों में आंखें डाल कर एक दूसरे का सामना करने से बचती रही हैं। साथ ही आंख दिखाने वाली बाहरी शक्तियों का मजबूती से सामना करने का मार्ग प्रशस्त होता है। इन दोषों को दूर किए बगैर दोनों ही चुनी हुई सरकारों के लिए देश और दिल्ली की जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना संभव नहीं है।

अभिव्यक्ति की आजादी के आधुनिक युग में निश्चय ही फेसबुक और ट्विटर जैसी कंपनियों ने संवाद का नया साधन पेश किया है। इसकी वजह से जहां एक ओर नीति निर्माताओं और आम लोगों के बीच संवाद में वृद्धि हुई, वहीं दूसरी ओर इसकी विध्वंसक क्षमताओं का इस्तेमाल भी कई समूहों द्वारा किया जाने लगा है। हालांकि इसका दायरा दिल्ली दंगों तक ही सीमित नहीं रहा। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में धांधली के अफवाहों को प्रचारित करने हेतु फेसबुक ने माध्यम का काम किया। उच्चतम न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि इनके लिए केवल व्यापार मायने रखता है, नैतिकता और विधि सम्मत जिम्मेदारी नहीं। भारत में ही करीब 34 करोड़ लोगों की मौजूदगी फेसबुक को सर्वाधिक लोकप्रिय इंटरनेट मीडिया का खिताब देती है। वाकई इतनी बड़ी शक्ति जिम्मेदारी तय करती है। यही कारण है कि सरकार और न्यायालय इन माध्यमों का दुरुपयोग रोकने हेतु लगातार प्रयासरत हैं।

सूचनाओं और विचारों के आदान प्रदान के इन नवीन माध्यमों ने व्यापार का विशाल साम्राज्य अल्प अवधि में खड़ा किया है। फेसबुक का साम्राज्य किसी भी देश की राजनीतिक सीमाओं से विशाल है। ऐसी दशा में स्थानीय कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ मुश्किल नहीं रह गया। यहां सुप्रीम कोर्ट में फेसबुक द्वारा दाखिल किए गए शपथपत्र में वर्णित विरोधाभासी तथ्यों पर गौर करना जरूरी है। एक ओर बिचौलिया होने के कारण परोसी गई सूचनाओं पर फेसबुक का कोई नियंत्रण नहीं है, तो दूसरी ओर यह भी दावा किया कि 2020 की दूसरी तिमाही में सवा दो करोड़ नफरत भरे कंटेंट हटाए गए। अब जिस प्लेटफार्म पर तमाम फर्जीवाड़ा बराबर प्रदर्शित हो रहा है, उसका नियंता ही अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है। इस कारण भी सुप्रीम कोर्ट ने उसकी जिम्मेदारी को रेखांकित किया है।

भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी दोनों ही फेसबुक की साजिश का शिकार होती हैं। हालांकि इस केस की सुनवाई के दौरान फेसबुक के वकील ने तो यहां तक कहा कि वह भारत का हर कानून मानने के लिए तैयार है, परंतु राजनीतिक खेमेबाजी में उलझने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने केंद्रीय संचार मंत्री के उस बयान का उल्लेख किया था, जिसमें राइट-आफ-सेंटर की ओर सिमटते फेसबुक का जिक्र किया गया था। फिर दिल्ली सरकार के उस आरोप का भी उन्होंने उल्लेख किया, जिसमें फेसबुक का झुकाव दक्षिणपंथ की ओर बताया गया है।

यहां गौर करना होगा कि व्यापार वृद्धि और मुनाफाखोरी में लगी इस बहुराष्ट्रीय निगम ने तकनीक का इस्तेमाल कर देश की जनता को ही नहीं, बल्कि राजनेताओं को भी निरंतर भ्रमित किया है। ध्रुवीकरण का शिकार होकर दिल्ली की जनता हिंसा की आग में जलती रही। फिर दोनों सरकार के बीच एक अर्से से जारी तकरार का फायदा उठाकर सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गई। इस पर न्यायालय की टिप्पणियां विशेष महत्व रखती हैं। दिल्ली के लोगों ने दोनों ही सरकारों के चयन में अपनी प्रौढ़ता प्रदर्शित की है। ऐसे में अब केंद्र और दिल्ली सरकार की बारी है।