कार्बन आफसेटिंग के रास्ते नेट जीरो का सफर कितना सही?

 


अक्षय ऊर्जा स्रोतों को अपनाने व उत्सर्जन घटाने पर जोर देना होगा।
आफसेटिंग के तरीकों को कई पर्यावरणविद् छल मानते हैं। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया कार्बन उत्सर्जन करने वालों को उत्सर्जन करते रहने का बहाना देती है। कहीं पेड़ लगाकर आफसेटिंग करना तो किसी हद तक सही विकल्प माना जा सकता है लेकिन दूसरा तरीका पूरी तरह छल है।

नई दिल्‍ली, प्रेट्र। जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन कम करना सबसे अहम है। इस जरूरत को समझते हुए 130 से ज्यादा देश 2050 तक नेट जीरो की प्रतिबद्धता भी जता चुके हैं। नेट जीरो यानी किसी देश में जितनी कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जित होती है, वहां उतनी ही कार्बन डाई आक्साइड अवशोषित करने की भी व्यवस्था हो।

जहां एक ओर विभिन्न देश नेट जीरो का लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ग्लासगो में सीओपी26 के दौरान बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिला। यह विरोध है नेट जीरो के लिए अपनाए जाने वाले कार्बन आफसेटिंग के तरीके को लेकर। आस्टेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के क्रिस्टियन बैरी और गैरेट क्युलिटी ने इससे जुड़े कई तथ्य स्पष्ट किए हैं।

दो तरीकों से होती है आफसेटिंग

  • कहीं पेड़ लगाकर कार्बन अवशोषण करना इस प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके लिए कंपनियां किसी जमीन के मालिक से करार करती हैं और वहां पेड़ लगाने व अन्य जरूरतों के लिए फंडिंग करती हैं
  • एक तरीका यह है कि कंपनी या देश किसी अन्य कंपनी या देश को मदद करते हैं, ताकि कार्बन उत्सर्जन कम हो सके। इसके तहत उन्हें नई तकनीक दी जाती है, फंडिंग भी की जाती है

क्या है कार्बन आफसेटिंग?: यह वह प्रक्रिया है, जिसमें कोई कंपनी या देश अपना कार्बन उत्सर्जन कम नहीं करते, बल्कि अपने कार्बन उत्सर्जन के बराबर कहीं अन्य कार्बन उत्सर्जन कम करने या कार्बन अवशोषण की व्यवस्था करते हैं।

उत्सर्जन कम करना ही विकल्प: पेड़ लगाकर आफसेटिंग की भी सीमा है। यदि उत्सर्जन कम न किया जाए, तो एक समय बाद पेड़ लगाने की जगह ही नहीं रहेगी। यदि जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटना है तो अक्षय ऊर्जा स्रोतों को अपनाने व उत्सर्जन घटाने पर जोर देना होगा।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के इन कदमों को छल मानते हैं कई जानकार: आफसेटिंग के तरीकों को कई पर्यावरणविद् छल मानते हैं। उनका कहना है कि इसमें असल में कोई उत्सर्जन कम नहीं होता है। बस कंपनियां या देश किसी अन्य का उत्सर्जन कम करने का दावा करते हैं। यह ऐसे ही है कि कोई कंपनी अपने यहां से औद्योगिक कचरे के रूप में पानी में पारा बहाती रहे और किसी अन्य कंपनी को फंड देकर उसे ऐसा न करने को कहे।

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