नेट जीरो उत्सर्जन: भेदें चक्रव्यूह के सात द्वार, राज-काज और समाज सबको एक साथ जुटना होगा


क्या भारत हासिल कर पाएगा नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य ?(फोटो: प्रतीकात्मक)
नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हमारे सामने एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसके सातों द्वारों को भेदने के बाद ही हम सतत विकास के साथ इस उद्देश्य को पूरा कर सकेंगे। इस साहसिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए राज-काज और समाज सबको जुटना होगा।

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तय किया गया नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य बहुत साहसिक है। अब हमें अपनी ऊर्जा प्रणालियों के बारे में नए सिरे से विचार करना होगा। हमें अपने उद्योगों, अपने शहरों और अपने गांवों की नए सिरे से कल्पना करनी होगी। हमें अपनी श्रम शक्तिऔर उनकी ओर से विकसित हुनर के बारे में भी नए सिरे से सोचना होगा। हमें ऐसे प्रत्येक उत्पाद के बारे में नए सिरे से सोचना होगा, जिनका हम निर्माण करते हैं। वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य को पाने के लिए सात बड़े बदलाव करने की आवश्यकता होगी। पहला, भारत को अपनी सौर क्षमता को आज के 40 गीगावाट से अगले 50 वषों में 5600 गीगावाट से ज्यादा तक बढ़ाने की जरूरत होगी। इससे लाखों नए रोजगार पैदा होंगे। इसे पाने के लिए एक मजबूत नीतिगत समर्थन, निवेश के लिए खरबों डालर की पूंजी और जल-जमीन की पर्याप्त उपलब्धता की भी आवश्यकता होगी।

दूसरा, आने वाले दशकों में अर्थव्यवस्था के व्यापक दायरे के विद्युतीकरण को संभव बनाने के लिए बिजली क्षेत्र में कई सुधार करने की जरूरत होगी। कोयला आधारित बिजली उत्पादन को सुव्यवस्थित और चरणबद्ध तरीके से हटाना होगा। इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पावर ग्रिड बड़ी मात्र में अक्षय ऊर्जा से उत्पादित बिजली को लेने के लिए तैयार रहें। बिजली उत्पादन कंपनियों की माली सेहत में भी सुधार करना महत्वपूर्ण होगा। यह कोशिश होनी चाहिए कि भविष्य में देश की बिजली प्रणालियां ज्यादा डिजिटल, ज्यादा विकेंद्रीकृत और क्रमिक रूप से कार्बन उत्सर्जन घटाने वाली हों।

तीसरा, भारत को कोयले से दूरी रखते हुए योजना बनाने की शुरुआत करने की जरूरत होगी। काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के विश्लेषण के अनुसार, नेट-जीरो लक्ष्य पाने के लिए भारत को बिजली और औद्योगिक क्षेत्रों में कोयले के उपयोग में 2040 से कटौती की शुरुआत करने की जरूरत होगी। नए उद्योगों को महत्व देते हुए कम कार्बन उत्सर्जन वाली आर्थिक विकास योजना का निर्माण प्राथमिकता होनी चाहिए। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लाभों के अलावा, कोयला खनन में लगे श्रमिकों को अन्य उद्योगों में रोजगार के लिए नए सिरे से प्रशिक्षित करना होगा और बेरोजगारी की विस्तारित अवधि के लिए बीमा सुरक्षा भी देनी होगी। इस परिवर्तन को आसान बनाने के लिए राज्यों और कोयला श्रमिकों की मदद करने के लिए एक ‘जस्ट ट्रांजिशन फंड’ बनाना चाहिए। भारतीय रेलवे को भी अपने व्यावसायिक माडल को भविष्य की चुनौतियों के लिहाज से सुरक्षित बनाने की जरूरत है। अभी रेलवे अपने राजस्व के बड़े हिस्से को कोयले की ढुलाई से कमाता है। इससे उसे यात्री किराये में सब्सिडी देने में मदद मिलती है। नई व्यवस्था में राजस्व के लिए अन्य स्नोतों को बढ़ाने के प्रयासों को तेज करने की जरूरत है।

चौथा, भारत को अपने दोपहिया, तिपहिया और पैसेंजर कार बाजार का तेजी से विद्युतीकरण करना होगा। 2070 तक देश में कारों की कुल बिक्री का 84 प्रतिशत और ट्रकों की कुल बिक्री का 79 प्रतिशत हिस्सा बैट्री-इलेक्टिक तकनीक से, जबकि शेष हिस्सा हाइड्रोजन से चलने वाला बनाना होगा। इलेक्टिक वाहनों (ईवी) को प्रमुखता के साथ अपनाने से भारत को कच्चे तेल के आयात पर बचत करने में मदद मिलेगी। यह बैट्री रिसाइकिलिंग, बड़े पैमाने पर ईवी फैक्टियों के स्थापित होने और ईवी चाजिर्ंग के लिए बुनियादी ढांचे के विकास व संचालन जैसे क्षेत्रों में नए रोजगार पैदा करने में भी मददगार होगा।

पांचवां, भारत को अपने उद्योगों को कार्बन मुक्त बनाने के लिए योजनाओं को विस्तार देने की आवश्यकता होगी। अभी उद्योगों की भारत के उत्सर्जन में हिस्सेदारी 25 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री पहले ही भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन और निर्यात का एक वैश्विक केंद्र बनाने के लिए राष्ट्रीय हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन की घोषणा कर चुके हैं। बड़े पैमाने पर इस्तेमाल योग्य कम खर्चीली हाइड्रोजन तकनीकियों के आकलन, विकास और डिजायन के लिए सीईईडब्ल्यू ने एक बहु-देशीय, बहु-संस्थागत नेटवर्क के रूप में एक ग्लोबल ग्रीन हाइड्रोजन एलायंस स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है।छठा, भारत को सभी क्षेत्रों में बिजली की कम खपत वाली (एनर्जी एफिशियंट) तकनीकों को अपनाना चाहिए। लाखों छोटे और मध्यम व्यवसायों में ऊर्जा दक्षता संबंधी सुधारों के लिए काफी संभावनाएं हैं।

अंत में, भारत को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सतत बदलाव पर भी काम करना चाहिए। ग्रामीण भारत में आजीविका को सहारा देने में विकेंद्रीकृत स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग के लिए 3.7 लाख करोड़ रुपये का अवसर मौजूद है। इसमें हाइड्रोपोनिक्स-आधारित हरे चारे के उत्पादन से लेकर ऊर्जा दक्षता वाली रेशम रीलिंग, दुग्ध शीतलन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे विभिन्न कार्य शामिल हैं। इसी तरह से अनाज उत्पादन, वितरण और खपत प्रणालियों में भी ऐसे व्यापक बदलाव करने की जरूरत होगी।

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