सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पूजा करने, नारियल तोड़ने या देवी-देवता को माला पहनाने के तरीके बताना अदालतों का काम नहीं

 

सुप्रीम कोर्ट तिरुपति बालाजी मंदिर में पूजा के तरीकों को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी
मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि संवैधानिक अदालतें यह नहीं बता सकतीं कि कैसे अनुष्ठान (मंदिर में पूजा) किया जाना चाहिए नारियल कैसे तोड़ा जाना चाहिए या किसी देवता पर माला कैसे चढ़ाई जानी चाहिए।

नई दिल्ली, आइएएनएस। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि अदालतें किसी मंदिर के दैनिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर के कुछ अनुष्ठानों में अनियमितता के आरोपों वाली याचिका पर नोटिस जारी करने से इन्कार कर दिया। प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि संवैधानिक अदालतें यह नहीं बता सकतीं कि किसी मंदिर में कैसे पूजा और अनुष्ठान किए जाएं, कैसे नारियल तोड़े जाएं या देवी-देवता को किस तरीके से माला पहनाई जाए।

पीठ, जिसमें जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस हिमा कोहली भी शामिल थीं, ने कहा कि ये मुद्दे याचिका के जरिये तय नहीं किए जा सकते हैं। याचिकाकर्ता सर्वरी दद्दा ने कहा कि यह एक सार्वजनिक मंदिर है। इस पर पीठ ने कहा, 'कोर्ट इस मामले में कैसे दखल देगा..कैसे अनुष्ठान किए जाएं?' पीठ ने माना कि याचिका में जो राहत मांगी गई है वह मंदिर के दैनिक कामकाज के मामलों में हस्तक्षेप वाली हैं। अदालतें इसको नहीं देख सकती हैं। अगर परंपरा से कुछ अलग होने की बात हो और उसके संबंध में सुबूत हों तब अदालत मामले पर विचार कर सकती है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि मंदिर प्रशासन याचिकाकर्ता की शिकायतों पर ध्यान दे और इसके बाद भी कुछ शिकायतें रह जाती हैं तो याचिकाकर्ता उचित मंच पर अपनी बात रख सकता है। भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के भक्त दद्दा ने तिरुपति मंदिर के पूजा पाठ में अनियमितता का आरोप लगाया था। 29 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर का प्रबंधन करने वाले तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) को हफ्ते भर के भीतर शिकायत पर जवाब देने को कहा था। इससे पहले आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने भी यह याचिका यह कहते हुए रद कर दी थी कि वह पूजा करने के तौर तरीकों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। हाई कोर्ट ने कहा था कि यह मामला देवस्थानम के अधिकार क्षेत्र में आता है।