'स्वदेश' पुस्तक में उठी मातृभूमि की पुकार, बौद्धिक प्रतिभा के पलायन पर प्रश्न

 

Book Review: 'स्वदेश' पुस्तक में उठी मातृभूमि की पुकार, बौद्धिक प्रतिभा के पलायन पर प्रश्न
 बौद्धिक प्रतिभा का पलायन सशक्त भारत की राह में बड़ी चुनौती है। भारत में पले-बढ़े और संस्कारित नौजवान पढ़ाई करने विदेश जाते हैैं और वहां की चकाचौंध से प्रभावित होकर वहीं बस जाते हैं। पढ़ें पूरी समीक्षा।

बौद्धिक प्रतिभा का पलायन सशक्त भारत की राह में बड़ी चुनौती है। भारत में पले-बढ़े और संस्कारित नौजवान पढ़ाई करने विदेश जाते हैैं और वहां की चकाचौंध से प्रभावित होकर वहीं बस जाते हैं। पीछे छूट जाते हैैं बुजुर्ग माता-पिता और उनकी मातृभूमि। लेखिका ममता चंद्रशेखर ने अपने उपन्यास स्वदेश में इसी गंभीर समस्या को उठाया है।

यह उपन्यास एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर के नवाचार पर केंद्रित है। वह बौद्धिक प्रतिभा पलायन से व्यथित हैैं और इसे रोकना अपना राष्ट्रधर्म मानते हैं। उन्हें लगता है कि भारतीय नवयुवकों का हुनर, कौशल और ज्ञान दुनिया के अन्य देशों से बेहतर है, लेकिन सुख-सुविधाओं के नाम पर यह हुनर विदेश में बिक जाता है। इसका लाभ उनकी मातृभूमि को नहीं मिल पाता। एक सड़क दुर्घटना में घायल उनकी पत्नी विदेश में बसे अपने दोनों बेटों को देखने की हसरत लिए चल बसती हैैं। जीवनभर पठन-पाठन में व्यस्त रहे प्रोफेसर साहब बौद्धिक प्रतिभा पलायन को बड़ी समस्या मानकर स्वदेशी की जमीन पर एक वैचारिक आंदोलन का बीजारोपण करते हैं। स्वदेश नामक इस आंदोलन में उन्हें वृद्धाश्रम में रह रहे कुछ बुजुर्गों और इस वृद्धाश्रम की संचालिका डाक्टर मानसी का सहयोग मिलता है, जिनका भाई भी विदेश में बस गया है।

प्रोफेसर साहब नवयुवकों को स्वदेश में रहने के लिए प्रेरित करते हैैं। वे जनसामान्य की मानसिकता को परिवर्तित करने के लिए संघर्ष करते हैैं। उनका मानना है कि आवश्यक होने पर नवयुवक उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाएं, लेकिन लौटकर स्वदेश जरूर आएं। वे अपने हुनर का उपयोग मातृभूमि के विकास हेतु करें। उनके स्वदेश लौटने से उनके बुजुर्ग माता-पिता को भी प्रसन्नता होगी और उन्हें अपना बुढ़ापा अकेले या वृद्धाश्रम में नहीं काटना पड़ेगा। अपनों से अपनों का अपनत्व बना रहेगा। उनके माता-पिता को परदेश में रहने वाली अपनी संतान का मुंह देखने के लिए तड़पना नहीं पड़ेगा। प्रोफेसर साहब अपने उद्देश्य में कितने सफल होते हैैं? क्या मातृभूूमि की पुकार सुनकर उनके बेटे भी स्वदेश लौटते हैं? इन प्रश्नों के दिलचस्प जवाब देता है यह उपन्यास।

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पुस्तक : स्वदेश

लेखिका : ममता चंद्रशेखर

प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स

मूल्य : 300 रुपये