जर्मनी के राजदूत बोले, भारत के बिना किसी भी बड़ी वैश्विक समस्या का समाधान संभव नहीं

 

हिंद प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता निर्यात आधारित जर्मनी के निजी हित में : वाल्टर लिंडर
भारत में जर्मनी के राजदूत वाल्टर लिंडर ने नई सरकार के भारत के साथ रिश्तों की भावी दिशा और संभावनाओं पर विशेष संवाददाता जयप्रकाश रंजन के साथ बातचीत की। उनको भरोसा है कि भारत और जर्मनी के रिश्ते पहले से भी ज्यादा प्रगाढ़ होंगे।

नई दिल्ली, [ स्पेशल]। जर्मनी में ओलाफ शोल्ज के नेतृत्व में नई सरकार बनने की प्रक्रिया जारी है। माना जा रहा है कि पूर्व चांसलर एंजेला मर्केल के 16 वर्षों के कार्यकाल के बाद दुनिया और भारत के साथ जर्मनी के रिश्तों के नए युग की शुरुआत हो सकती है। भारत में जर्मनी के राजदूत वाल्टर लिंडर ने नई सरकार के भारत के साथ रिश्तों की भावी दिशा और संभावनाओं पर विशेष संवाददाता जयप्रकाश रंजन के साथ बातचीत की। उनको भरोसा है कि भारत और जर्मनी के रिश्ते पहले से भी ज्यादा प्रगाढ़ होंगे।

जर्मनी में नई सरकार के गठन के बाद भारत के साथ रिश्तों पर आप किस तरह का असर पड़ते हुए देख रहे हैं?

- हमने देखा है कि जर्मनी के पुराने सभी चांसलरों और भारतीय प्रधानमंत्रियों के बीच काफी अच्छी दोस्ती रही है। खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चांसलर एंजेला मर्केल के बीच काफी सौहार्दपूर्ण रिश्ते रहे हैं जिसका असर द्विपक्षीय संबंधों पर भी दिखा है। अब दिसंबर के पहले हफ्ते में हमारे देश में नई सरकार होगी। दोनों देशों के संबंध पहले की तरह ही प्रगाढ़ बने रहेंगे क्योंकि हमारे बीच कई सारे साझा हित हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और जर्मनी की तरह ही संघीय देश है। हमारी कई चुनौतियां एक जैसी हैं। जैसे पर्यावरण, आतंकवाद, खाद्य सुरक्षा। मेरा मानना है कि भारत जैसे विशाल देश के बिना किसी भी वैश्विक चुनौती का समाधान नहीं निकाला जा सकता। भारत और जर्मनी कई मुद्दों पर साथ काम कर रहे हैं। एक ताजा उदाहरण अफगानिस्तान का है। हम संयुक्त राष्ट्र में बदलाव को लेकर काम कर रहे हैं। शिक्षा, विज्ञान जैसे तमाम क्षेत्रों में हमारे रिश्ते काफी व्यापक हैं और इनका निरंतर विस्तार हो रहा है। मेरा मानना है कि सत्ता बदलने के बाद जिन क्षेत्रों में हम काम कर रहे हैं वहां रिश्ते और मजबूत होंगे। सत्ता बदलने से दो देशों के रिश्तों नहीं बदलते।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत और जर्मनी के बीच रिश्तों को किस तरफ बढ़ता देख रहे हैं?

- जर्मनी एक निर्यात आधारित देश है और उसके निर्यात में हिंद प्रशांत क्षेत्र की स्थिति काफी महत्वपूर्ण है। हम निर्यात चैंपियन हैं। दुनिया के कुल निर्यात का 50-60 प्रतिशत हिंद प्रशांत क्षेत्र से गुजरता है। इसलिए यह हमारे निजी हित में है कि यह क्षेत्र पूरी तरह से शांत हो और यहां किसी भी तरह की राजनीतिक अस्थिरता या असुरक्षा न हो। साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस क्षेत्र के कम से कम चार देश भारत, पाकिस्तान, चीन और संभवत: उत्तर कोरिया परमाणु क्षमता से संपन्न हैं। साथ ही यहां दुनिया के दूसरे हिस्से के मुकाबले ज्यादा तेजी से आर्थिक विकास हो रहा है। यहां की कुल आबादी में 40 प्रतिशत 20 वर्ष आयु वर्ग के हैं। इन वजहों से यहां हमारी खास रुचि है और इस क्षेत्र में किसी भी तरह के तनाव को हम सही नहीं मानते। हम एक शांतिप्रिय देश हैं और यही वजह है कि हम एक कानून सम्मत हिंद प्रशांत क्षेत्र चाहते हैं।

पर्यावरण एक बहुत अहम मुद्दा बन चुका है। इस क्षेत्र में किस तरह का सहयोग किया जा रहा है?

- पर्यावरण से जुड़े कई स्तरों पर भारत और जर्मनी एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं। ग्लासगो में काप-26 के दौरान तय लक्ष्यों में हम एक दूसरे की मदद कर रहे हैं। भारत में कई सारी परियोजनाओं में हम मदद कर रहे हैं। अभी एक दिन पहले ही इस बारे में जर्मनी से आए वरिष्ठ अधिकारियों का एक दल भारत सरकार के उच्चस्तरीय प्रतिनिधियों से मिला है जिसमें भारत को जर्मनी से 1.2 अरब यूरो की मदद देने का फैसला किया गया है। यह राशि ऊर्जा, शहरी विकास और कृषि क्षेत्र में दी जाएगी ताकि पर्यावरण अनुकूल कदम उठाये जा सकें। इसके अलावा वर्ष 2015-20 के दौरान भारत को सौर ऊर्जा में मदद के लिए एक अरब यूरो का लोन और तकनीकी सहयोग भी दिया गया। राज्यों को अलग से गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्त्रोतों के विकास में वित्तीय मदद मिलेगी। भारत के कई महानगरों में जर्मनी की मदद से परिवहन से जुड़ी परियोजनाओं को लागू किया जा रहा है।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर फिर से बात होने जा रही है, जर्मनी का क्या रुख होगा?

- जैसा मैंने पहले भी कहा है कि हम निर्यात आधारित देश हैं और इस लिहाज से हम एक उदारवादी एफटीए का समर्थन करते हैं। हम यूरोपीय संघ को इसके लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं कि वह भारत के साथ इस बारे में तेजी से आगे बढ़े। लेकिन सात वर्षों से वार्ता बाधित है और अभी यह फैसला किया गया है कि फिलहाल समूह में बातचीत की जाएगी ताकि बाद में पूर्ण तरीके से एफटीए पर वार्ता शुरू हो सके। हम चाहते हैं कि दोनों पक्ष इस समझौते को लेकर प्रतिबद्धता दिखाएं और इसे शीघ्रता से संभव बनाएं।