पुष्कर पशु मेले में ठिठके ऊंट पशुपालकों के कदम, ऊंटों से ज्यादा बिके घोड़े

 

पुष्कर पशु मेले में ठिठके ऊंट पशुपालकों के कदम। फोटो जागरण
सरकारी उपेक्षा प्रशासनिक अनदेखी मशीनी युग और कोरोना के खौफ के रहते इस बार राजस्थान में तीर्थराज पुष्कर पशु मेले में चमक और दमक के साथ पहुंचने वाले ऊंट पशुपालकों के कदम ठिठक गए हैं।

पुष्कर (अजमेर), सन्तोष गुप्ता। मरुभूमि सरीसे सुनहले रंग, विशाल काय, छबीला कद-रूप, अनूठे अंदाज और नयनाभिराम श्रृंगार से देसी-विदेशी सैलानियों का मन मोह लेने वाले रेगिस्तानी जहाज ऊंटों का अपनी आन-बान-शान के लिए दशकों से फहराता परचम अब अस्तांचल की ओर ढलता नजर आ रहा है। सरकारी उपेक्षा, प्रशासनिक अनदेखी, मशीनी युग और कोरोना के खौफ के रहते इस बार तीर्थराज पुष्कर पशु मेले में चमक-दमक के साथ पहुंचने वाले ऊंट पशुपालकों के कदम ठिठक गए हैं। बहुसंख्या में ऊंटों के नहीं पहुंचने से पुष्कर का सालाना पशु मेला अपना स्वरूप बदलता सा दिख रहा है। पहले पुष्कर के रेतीले धोरों में दूर तक जहां नजर जाती थी, हजारों की संख्या में ऊंट वंश के मवेशी ही दिखाई देते थे।jagran

पश्चिमी राजस्थान बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, पाली, मारवाड़, सोजत, नागौर आदि इलाकों सहित मध्य प्रदेश और गुजरात से पुष्कर मेले में बहुसंख्या में ऊंट पहुंचते थे। देसी-विदेशी लोग और दुनिया भर से फोटो पत्रकार व अन्य पर्यटक लाखों की संख्या में आते थे। किन्तु बीते कुछ सालों में खरीद-फरोख्त के लिए पहुंचने वाले राज्य पशु ऊंटों की संख्या साल दर साल घट रही है। इसके मुकाबले अश्व वंश यानी घोड़े-घोड़ियों ने ले लिया है। राजस्थान ही नहीं राजस्थान से लगते अन्य प्रदेशों जैसे हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, आदि प्रांतों से भी अश्व वंश पशुपालकों ने पुष्कर मेले को अच्छी नस्लों के अश्वों की खरीद-फरोख्त की बड़ी मंडी बना दिया है। हाल और हालात ऐसे ही रहे तो विश्व प्रसिद्ध पुष्कर मेले में राज्य पशु ऊंटों के छैल-छबीले, नखरीले अंदाज देखने को देसी-विदेशी पर्यटकों की आंखें तरस जाएंगी।

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ऊंटों से ज्यादा बिके घोड़े 

पशु पालन विभाग से मोटे तौर पर मिले आंकड़ों के अनुसार साल 2019 में भरे पुष्कर पशु मेले में तकरीबन सात हजार 300 छोटे-बड़े मवेशी पहुंचे थे। इनमें ऊंट, अश्व, गाय-भैंस, गधा-गधी, बकरी-भेड़ भी शामिल थे। साल 2021 में पचास प्रतिशत ही ऊंट वंश के पशु पालक पुष्कर मेले में पहुंचे। यानी जहां साल 2019 में 4 हजार 717 ऊंट पुष्कर मेले में आए थे इसकी तुलना में साल 2021 में मात्र 2 हजार 340 ऊंटों की ही पुष्कर पशु मेले में आवक दर्ज हुई है। पुष्कर मेले में गुरुवार को एक भी नया पशु नहीं आया। मेले में अब तक कुल 2340 ऊंट आए इनमें से 525 बिके। वहीं, राजस्थान के बाहर से 381 समेत 2291 अश्व आए। इनमें से 645 घोड़े-घोड़ी बिके। 645 में से 540 अश्व राजस्थान के बाहर से आए व्यापारियों ने खरीदे। यानी ऊंटों के मुकाबले 120 अश्व ज्यादा बिके।

ऊंट अधिकतम एक लाख में बिका तो घोड़ा पांच लाख में 

पुष्कर पशु मेले में कुल 1170 जानवरों की खरीद-फरोख्त हुई हैं, इससे पशु पालकों के बीच करीब चार करोड़ रुपये का लेन देन हुआ है। ऊंट अधिकतम एक लाख का व न्यूनतम 18 हजार का बिका। घोड़ा-घोड़ी अधिकतम पांच लाख रुपए में बिका व न्यूनतम 80 हजार में।

कोरोना गाइड लाइन ने रोके पशु पालकों के कदम 

बाड़मेर से आए एक पशुपालक कुंभाराम ने बताया कि कोरोना-19 के बाद लगातार डेढ़-दो साल से लॉकडाउन व अन्य सख्त गाइडलाइन के चलते गत साल राज्य सरकार ने पुष्कर मेला स्थगित कर दिया था। इस साल राज्य सरकार ने हाल में कोरोना गाइडलाइन में सभी क्षेत्रों के लिए शिथिलता प्रदान की थी और सख्त पाबंदियां हटा दी थीं, तब भी तीर्थराज पुष्कर पशु और धार्मिक व आध्यात्मिक मेले को लेकर कोई सूचना नहीं थी। पशु विभाग असमंजस की स्थिति में रहा, उसने प्रदेश भर में पशु पालकों को भेजे संदेश में कहा कि पुष्कर पशु मेले में मवेशियों को ले जाने वाले पशुपालकों को कोरोना वैक्सीन के दोनों डोज लगे होने अनिवार्य हैं। साथ ही, पुष्कर मेले में प्रवेश के समय कोरोना जांच भी करानी जरूरी होगी। इन स्थितियों में पशु पालकों की मेले में पहुंचने के लिए सामूहिक राय नहीं बन सकी और गांव-देहात से पुष्कर के लिए निकलने का समय गुजर गया।

राज्य पशु ऊंट के प्रदेश से बाहर भेजने पर रोक 

नागौर से मवेशियों का झुंड लेकर पुष्कर मेले में डेरा जमाए गुमाना चौधरी ने बताया कि सरकार ने राज्य के बाहर ऊंटों को भेजने पर रोक लगा रखी है, इस कारण कोई खरीदार ही नहीं आ रहा। कोई पशु पालक दूर से मवेशी लाकर मेले में क्या करेगा। ऊंटों को राज्य पशु घोषित किए जाने के बाद से ही राज्य सरकार की ओर से राज्य पशु ऊंट को प्रदेश से बाहर भेजे जाने पर पाबंदी लगा दिए जाने से भी पशु पालकों का पुष्कर पशु मेले में पहुंचने के प्रति खिंचाव और लगाव दोनों ही समाप्त हो गया। यूपी, बिहार, अन्य प्रदेशों से पहुंचने वाले खरीदारों ने भी मेले से बेरुखी कर ली।

एग्रीकल्चर और माल ढुलाई में ऊंटों की जरूरत घटी 

राजस्थान प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में ऊंटों का कृषि-काश्तकारी (एग्रीकल्चर) और माल ढुलाई में सर्वाधिक उपयोग हुआ करता था। समय परिवर्तन के साथ मशीनी युग आ गया। कृषि में काम आने वाले उपकरणों के अत्याधुनिक दौर में ऊंटों के पालन पोषण पर होने वाला सालाना खर्च मशीनों से ज्यादा महंगा साबित होने लगा। लिहाजा पशुपालकों ने मशीनों पर ही खेत-खलियानों को संभालना शुरू कर दिया।

ऊंटों के प्रजनन-संवर्धन प्रोत्साहन योजना हुई बंद 

राज्य में सामान्य तौर पर ऊंट पश्चिमी राजस्थान में बहुसंख्या में पाया जाता है। इसीलिए ऊंटों को रेगिस्तान का जहाज कहा जाता है। पश्चिमी राजस्थान मरुभूमि है। यहां रेतीले धोरे हैं। ऊंटों का आवास-प्रवास और प्रजनन विकास के लिए सर्वाधिक माफिक होता है। पिछली राज्य सरकार ने ऊंटों की कम होती वंश वृद्धि को गंभीरता से लेते हुए ऊंटों के वंश वृद्धि प्रोत्साहन योजना के तहत प्रत्येक ऊंट पशु पालक को बेबी ऊंट होने पर 10 हजार रुपये साल के तीन बार समान किस्तों में देना शुरू किया था। मौजूदा राज्य सरकार ने इस योजना को बंद कर रखा है।

पशु पालन विभाग को नहीं मिलता पर्याप्त बजट 

मेले आयोजन के लिए चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक या फिर पशुओं के लिए ही हो मेलों में व्यवस्थाओं के नाम पर बिजली, पानी, टेंट, खाद्य, सुरक्षा, चिकित्सा आदि अन्य जरूरी इंतजाम तो करने ही होते हैं, फिर इतने बड़े पशु व धार्मिक मेले के लिए जिसमें पूर्व से लेकर पश्चिम तक देसी-विदेशी सैलानियों की लाखों की संख्या में आवक होती है तो इंतजाम भी अव्वल दर्जे के होने ही चाहिए। किन्तु प्रशासनिक और सरकारी लाल फीताशाही में सब निकल जाता है। उधार में या चंदे से फिर जैसे काम हो सकते हैं वैसे ही होते हैं। सरकारी बजट भी आता है तो उसकी बंदर बांट हो जाती है।

इस कारण घटी ऊंटों की आवक

पुष्कर पशु मेले में इस बार मवेशियों की आवक कम रहने के कई कारण हैं। खास तौर पर ऊंटों की आवक आधी रहने के पीछे कोविड-19 तो एक मुख्य कारण है ही। साथ में मशीनी युग में मवेशियों का पालन पशु पालकों को महंगा पड़ रहा है। ऊंटों का एग्रीकल्चर उपयोग खतम सा ही हो गया है। ऊंटों के प्रजनन प्रोत्साहन की सरकारी योजनाओं से उन्हें खास लाभ नहीं मिलता जो प्रोत्साहन योजना थी वह भी फिलहाल स्थगित हैं। विभाग के स्तर पर सभी प्रयास किए जाते हैं, जैसे जैसे बजट स्वीकृत होता है, पशु पालकों के प्रोत्साहन व पशुओं की चिकित्सा-परामर्श आदि पर वहन किया जाता है। मेले के लिए हर साल सरकार से बजट मांगा जाता है पर उपलब्धता ऊंट में मुंह में जीरे की सी ही होती है। फिर भी विभाग अन्य माध्यमों से पशुपालकों को सभी सहयोग व सुविधाएं देता है। यह जानकारी पशु पालन विभाद के संयुक्त निदेशक प्रफुल्ल माथुर ने दी।