देश के किसानों की वर्षा जल पर निर्भरता खत्म करने की है जरूरत

 

देश के किसानों की वर्षा जल पर निर्भरता खत्म करने की है जरूरत। फाइल
कल्पना करें कि देश में एक दिन सिंचाई के लिए जल संसाधन की आपूर्ति निरंतर पूरे वर्ष प्रत्येक किसान के हर छोटे-बड़े भू-भाग पर मुहैया होती रहे? ऐसा होने पर सभी किसान पूरे साल अपने खेतों में कोई न कोई फसल उगाकर उन्हें हराभरा रख सकते हैं।

आज किसानों की आय बढ़ाकर कृषि को फायदे का सौदा बनाने की बात हर तरफ की जा रही है। इसके लिए सरकारें तरह-तरह के प्रयास भी कर रही हैं, लेकिन उनसे कुछ विशेष हासिल होता नजर नहीं आ रहा है। जाहिर है इसके लिए समाज, कृषक समुदाय, सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर चौतरफा प्रयास करने होंगे। हमारा शहरी-ग्रामीण समाज, कृषि व्यवसाय, कृषक समुदाय आपस में एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। हमारा समाज क्षेत्रों और भाषाओं के आधार पर विविधताओं से परिपूर्ण है। महानगरों, छोटे-बड़े कस्बों, शहरों की जीवन संस्कृति एवं अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवनशैली एवं अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, लेकिन परस्पर निर्भर भी हैं। स्वस्थ जीवन के लिए शहरी समाज ग्रामीण समाज पर निर्भर है। जो लोग भी पहले इस सच्चाई से अनभिज्ञ थे कोविड-19 महामारी ने उन सबको इससे परिचित करा दिया है।

यह भी सच है कि शहरी समाज के लोग ग्रामीण समाज की तुलना में ज्यादा सुविधा संपन्न हैं। इसके कारणों के विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि सभी प्रबुद्ध वर्ग इस बात को समझता है। अत: ग्रामीण समाज सक्षम बने इस पर अब नीति नियंताओं की निगाहें होनी चाहिए। नीति आयोग के अनुसार आज ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त वित्तीय निवेश अति आवश्यक है, जहां कृषक समाज रहता है। इसके फलस्वरूप ही कृषि व्यवसाय और कृषक समुदाय के लिए पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करके उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। एक रोचक तथ्य है। वह यह कि निजी संस्थाएं हमेशा अपना निवेश ग्रामीण क्षेत्र में करने से बचती रही हैं। विश्व में कुल होने वाले निवेश में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी दो प्रतिशत ही है।

भारत के संदर्भ में यह आंकड़ा 0.5 प्रतिशत के करीब है। अत: कृषक समाज में खुशहाली और आत्मनिर्भरता लाने के लिए निवेश प्रणाली को पुनर्जीवित करते हुए कृषि में ढांचागत विकास जरूरी है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि देश में कुल कृषिगत भूमि का 50 प्रतिशत हिस्सा ही समुचित सिंचाई सुविधा से संपन्न है, बाकी 50 प्रतिशत खेती योग्य भूमि अभी भी वर्षा जल पर ही निर्भर है। बढ़ती हुई जनसंख्या एवं घटते हुए जोत से कृषकों में भारी असुरक्षा है। कृषक परिवार की भावी पीढ़ी में कृषि को अपनाने को लेकर असमंजस की स्थिति है। ऐसे में गांवों से शहरों की ओर पलायन की प्रवृत्ति बढ़ी है। इन समस्याओं के समाधान के लिए मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के माध्यम से खेती के लिए किसानों की बारिश पर से निर्भरता को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए हैं।

यह अच्छी बात है कि मोदी सरकार ने भारत को विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाने का सपना देखा है और वह हमें भी वैसा सपना देखने को प्रेरित कर रही है। पिछले 70-75 वर्षो में ऐसे सपनों के पांच उदाहरण सामने आते हैं। आत्मनिर्भरता के उदाहरण जापान, जर्मनी, इजरायल, चीन और वियतनाम हैं। इसके लिए इन तमाम देशों के नागरिकों ने अपनी भाषा से बेहद प्रेम किया, देशभक्ति, अनुशासन का परिचय दिया और निर्धारित समय से ज्यादा काम आदि किया। हमारा समाज ऐसा क्यों नहीं कर सकता? इसके लिए इसके सामने क्या-क्या बाधाएं हैं? इस पर चर्चा आवश्यक है। हमारे देश में चरित्र निर्माण की प्रयोगशाला युक्त पाठशाला चाहिए। माना जा रहा है कि यह उम्मीद नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से अवश्य पूरी होगी और फिर हमारा समाज आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो सकेगा। इससे देश में उद्योगीकरण की संस्कृति विकसित होगी। इससे लोगों में यह भावना भी पैदा होगी कि हर काम के लिए सरकार पर निर्भर रहने के बजाय हम नागरिकों को भी आगे आना चाहिए।

कृषि व्यवसाय कैसे आत्मनिर्भर हो सकता है इस पर ध्यान दें तो उत्तर मिलता है कि भारत की कृषि प्राचीन काल से वर्षा खासकर मानसून पर निर्भर है। अत: कृषक समुदाय भी अपने व्यवसाय के लिए सदा जल वृष्टि पर निर्भर रहा है। मानसून पर आजकल जलवायु परिवर्तन की छाया है। इसके कारण वर्षा चक्र छिन्न-भिन्न हो गया है। इससे किसानों को कभी भारी बारिश तो कभी सूखे का सामना करना पड़ रहा है। यदि कृषक समुदाय को आत्मनिर्भर बनाना है तो वर्षा पर से उसकी निर्भरता समाप्त करनी होगी। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए आवश्यक निवेश करने होंगे और गांव-गांव जलाश्रम सृजित करने होंगे। इसके लिए हमें कुछ बातों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। जैसे-हमें अपने नजरिये को सकारात्मक बनाना होगा। टाल-मटोल की आदत छोड़कर तुरंत काम को करो पर अमल करना सीखना होगा। हमें आत्मनिर्भर बनने के लिए सपने देखने के बजाय संकल्प लेने होंगे, क्योंकि सपने कभी भी नींद खुलने से टूट सकते हैं। लक्ष्य को प्राप्त करने का एकमात्र विकल्प सतत कड़ी मेहनत करते रहना ही है। इसके लिए हमें अपने चरित्र में पवित्रता, प्रतिबद्धता, दृढ़ विश्वास और साहस का समावेश करना होगा। अपने काम को बेहतर बनाने में समय लगाना होगा। ऐसा कुछ अभ्यास यदि भारतीय जनमानस करे तो हमारा समाज कृषि व्यवसाय और कृषक समुदाय को आत्मनिर्भर बना सकता है।

कल्पना करें कि देश में एक दिन ऐसी आधारभूत सुविधा सुनिश्चित हो जाए कि सिंचाई के लिए जल संसाधन की आपूर्ति निरंतर पूरे वर्ष प्रत्येक किसान के हर छोटे-बड़े भू-भाग पर मुहैया होती रहे? ऐसा होने पर सभी किसान पूरे साल अपने खेतों में कोई न कोई फसल उगाकर उन्हें हराभरा रख सकते हैं। फलस्वरूप सीमांत किसान हों या खेतिहर मजदूर, वे भी पेशेवर की तरह हर महीने अपने लिए आमदनी अर्जित कर सकते हैं। निश्चित रूप से इस प्रकार से अपनी आय में वृद्धि कर कृषक समुदाय आत्मनिर्भर बन जाएगा।