चुनावी राज्यों में दनादन निकल रहीं वर्षों से अटकी भर्तियां, युवाओं के मन में उठ रहे कई सवाल

 

हर दिन किसी न किसी विभाग में कुछ न कुछ ही सही नौकरियां दी जा रही
जल्द ही देश के कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में यह मुद्दा फिर से चुनावी विमर्श के केंद्र में आ सकता है। चुनावी राज्यों में नौकरियों को लेकर हो रही नित नई घोषणाओं से यह स्वाभाविक भी प्रतीत होता है।

 जिन युवाओं को प्राय: भारत की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में प्रचारित किया जाता है, कहीं वही भारत की कमजोर कड़ी न बन जाएं, हमें इस बात का बखूबी ध्यान रखना होगा। सीधे शब्दों में कहें तो अगर इतनी बड़ी युवा आबादी को हम रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध करा सकें तभी यह युवा वर्ग हमारे लिए संपदा सृजन कर पाएगा अन्यथा यही तबका हमारे लिए विपदा का कारण बन जाएगा। मूल प्रश्न यही है कि अपेक्षित स्तर पर रोजगार सृजन कैसे किया जाए?

जल्द ही देश के कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में यह मुद्दा फिर से चुनावी विमर्श के केंद्र में आ सकता है। चुनावी राज्यों में नौकरियों को लेकर हो रही नित नई घोषणाओं से यह स्वाभाविक भी प्रतीत होता है। चुनावी राज्यों में दनादन भर्तियां निकल रही हैं, जो वर्षों से अटकी पड़ी थीं। युवा वर्ग भी सोच रहा है कि इतनी भर्तियां पहले आई होतीं तो अब तक कुछ और ही स्थिति होती। फिर नौकरियों की समूची प्रक्रिया भी बहुत अनिश्चित है। कब कौनसी भर्ती आ जाए और कब कौनसी निरस्त हो जाए इसका पता निश्चित नहीं है।

फिलहाल हर दिन किसी न किसी विभाग में कुछ न कुछ ही सही नौकरियां दी जा रही हैं। ऐसा नहीं है कि ये पद अभी खाली हुए हैं, मगर चुनावी दस्तक ने उनकी गति जरूर बढ़ा दी है। इस बीच केंद्र सहित कई राज्य सरकारें स्वरोजगार पर भी जोर दे रही हैं। यह सही रणनीति प्रतीत होती है, क्योंकि सरकारी तो छोड़िए, निजी क्षेत्र में भी इतने लोगों को खपाना संभव नहीं। इसी कारण स्टार्टअप संस्कृति विकसित हो रही है। हालांकि, इसकी सफलता के लिए धरातल पर कुछ दिक्कतें भी आ रही हैं। जैसे देश में हर युवा स्वरोजगार अपनाएगा तो उसके लिए पूंजी की व्यवस्था कैसे होगी?

क्या बैंक उसे तुरंत ऋण देने के लिए तैयार हो जाता है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में स्टार्टअप का एक इकोसिस्टम बना है और जो काफी हद तक सफल हुआ है, परंतु जिन सफल स्टार्टअप्स को हम देखते हैं, वे कुछ गिनती के ही हैं। भारत में स्वरोजगार और सरकारी रोजगार में काफी अंतर है। सरकारी नौकरी से समाज में मिलने वाली जो प्रतिष्ठा है वह भारत में कुछ अन्य कार्यों से नहीं मिलती है। इस कारण उसके प्रति एक आकर्षण अब भी बना हुआ है।आइआइटी और आइआइएम से पढ़े और अच्छी नौकरी हासिल करने वाले भी सरकारी नौकरी के मोह से नहीं बच पाते।

जाहिर है कि हमें इस मानसिकता से भी मुक्ति पानी होगी। सरकार स्वयं कहती है कि सभी को सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती। देश की विशाल जनसंख्या को देखकर यह बात ठीक है, पर इस पर विचार भी किया जाए कि सरकारी पदों की संख्या क्यों घटती जा रही है? उन्हें कुछ तो बढ़ाया जाए, ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिल सके।