बिहार के बक्सर में श्रीराम और लक्ष्मण ने की थी पंचकोसी यात्रा, साधु-संतों की जुटान से लौटेगा आध्यात्मिक माहौल

 

भभुवर के मंदिर में होगा पंचकोशी का तीसरा पड़ाव।
बक्सर का पुराना नाम सिद्धाश्रम और व्याघ्रसर है और यह 88 हजार ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही है। मान्यता है कि त्रेतायुग में जब राक्षस महर्षि विश्वामित्र के तप में विध्न डाल रहे थे तब वे अयोध्या से श्रीराम और लक्ष्मण को यहां शांति की स्थापना के लिए लेकर आए थे।

 बक्सर : 'सिद्धाश्रमसमं तीर्थ न भूतं न भविष्यति' स्कंद पुराण में बक्सर का जिक्र इस श्लोक से हुआ है, जिसका तात्पर्य है पृथ्वी पर सिद्धाश्रम के समान न तीर्थ हुआ है और न ही होगा। आध्यात्म और आस्था की नगरी बक्सर का पुराना नाम सिद्धाश्रम और व्याघ्रसर है और यह 88 हजार ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही है। ऐसी मान्यता है कि त्रेतायुग में जब राक्षस महर्षि विश्वामित्र के तप में विध्न डाल रहे थे, तब वे अयोध्या से भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को यहां शांति की स्थापना के लिए लेकर आए थे। अपने तप बल से उन्हें ज्ञात हो चुका था कि अयोध्या नरेश दशरथ के यहां श्रीराम के रूप में भगवान विष्णु अवतरित हो चुके हैं। प्रभु श्रीराम ने यहीं राक्षसी ताड़का का उद्धार कर महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ को संपन्न कराया। इसके बाद बाद ऋषियों से आशीर्वाद लेने को पंचकोसी परिक्रमा की थी। अगहन माह में कृष्णपक्ष पंचमी से हर साल श्रद्धालु पांच दिवसीय पंचकोसी यात्रा करते हैं। पिछले साल कोरोना के कारण यात्रा में आम श्रद्धालुओं की संख्या सीमित कर दी गई थी, इस साल 24 नवंबर से प्रारंभ हो रही यात्रा से दो साल बाद बक्सर में आध्यात्मिक माहौल वापस लौट रहा है। पंचकोसी यात्रा के पहले दिन अहिरौली में गौतम ऋषि के आश्रम में संतों का जुटान होगा। ऐसी मान्यता है कि यहां गंगा तट पर भगवान श्रीराम ने अहिल्या का उद्धार किया था। यात्रा के दौरान साधु-संत एवं श्रद्धालु नदांव, भभुअर, बड़का नुआंव आदि धार्मिक महत्व रखने वाले स्थलों पर पड़ाव लेते हुए 28 नवंबर को चरित्रवन पहुंचेंगे। जहां लिट्टी-चोखा का प्रसाद ग्रहण कर यात्रा पूरी करेंगे। अगले दिन विश्राम कुंड से संतों की विदाई हो जाएगी। 

बीते वर्ष कोरोना संक्रमण को लेकर इन विभिन्न स्थलों पर कल्पवास (रहने-खाने) की व्यवस्था नहीं की गई थी। पंचकोसी परिक्रमा समिति को पूरी उम्मीद है की इस बार प्रशासन की ओर से उन्हें भरपूर सहयोग मिलेगा। इसके लिए प्रशासन को जानकारी भी दे दी है। बतौर समिति के अध्यक्ष बसांव पीठाधीश्वर अच्युत प्रपन्नाचार्य जी महाराज- पंचतत्व से बने हुए इस शरीर से मुक्ति की प्राप्ति हेतु लोग त्रेतायुग में भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित इस पंचकोसी परिक्रमा का अनुगमन निरंतर करते आ रहे हैं, कहा की, महाजनों येन गत: स पंथा, अर्थात जिस मार्ग से प्रबुद्ध चले हों उस मार्ग पर चलने से शांति मिलती है।

नदांव में नारद आश्रम, भभुअर में भार्गवाश्रम जाते हैं श्रद्धालु

प्रभु श्रीराम भाई लक्ष्मण के साथ प्रथम पड़ाव में अहिरौली में गौतमाश्रम पहुंचे थे। अनुष्ठान का दूसरा पड़ाव नदांव में नारद आश्रम में होता है। यहां बड़े से तालाब का श्रद्धलु परिक्रमा करते हैं और रात बिताते हैं। अगले दिन तीसरे पड़ाव में पड़ाव में भभुअर के भार्गवाश्रम में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जहां संतों का प्रवचन सुनते हैं। चौथे दिन श्रद्धालुओं का पड़ाव बड़का नुआंव के उद्दालक आश्रम में होता है। पांचवें दिन चरित्रवन में महर्षि विश्वामित्र के आश्रम से भोजन कर विदा हुए। मान्यता है कि पंचकोसी यात्रा में प्रभु इन्हीं पांचों जगह की परिक्रमा करते हैं जो एक-दूसरे से तकरीबन पांच कोस की दूरी पर है। यात्रा जिस दिन आश्रम में पहुंचती है, उस दिन वहां मेला लगता है और गुड़ की जलेबी, बुंदिया जैसे पारंपारिक पकवान और ग्रामीण इस्तेमाल के सामान मिलते हैं।

हर दिन अलग-अलग बंटता है परंपराओं का प्रसाद

पंचकोसी परिक्रमा के निमित्त सभी धर्मस्थलों पर अलग-अलग प्रसाद खाने की परंपरा रही है। ऐसी मान्यता है कि प्रभु श्रीराम को संतों के आश्रम में यही पकवान परोसे गए थे। वैदिकाचार्य रामनाथ ओझाा बताते हैं कि पहले पड़ाव में अहिरौली में पूजा-पाठ के बाद श्रद्धालु पुआ-पूरी का प्रसाद ग्रहण्र करते हैं। नदांव में दूसरे दिन खिचड़ी का भोग लगता है। भभुअर में श्रद्धालु चूड़ा-दही का प्रसाद खाकर तृप्त होते हैं। बड़का नुआंव के उद्दालक आश्रम में सत्तू और मूली का प्रसाद चढ़ाया जाता है। यात्रा के अंतिम दिन चरित्रवन में लिट्टी-चोखा का प्रसाद सेवन किया जाता है। इसके बाद अगले दिन देशभर से आए साधु-संतों को बसाांव मठिया से विदाई दी जाती है। पंचकोसी यात्रा पर शोध कर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो.देवेन्द्र चौबे बताते हैं कि पंचकोसी के जितने प्रसाद का भोग लगता है, वह आज भी हमारी लोक-संस्कृति में खान-पान का हिस्सा हैं। एक दिन हम पुआ-पूरी खाते हैं तो अगले दिन सुपाच्य खिचड़ी, दही-चूड़ा के बाद सत्तू-मूली का हल्का भोजन और भोजपुरी संस्कृति में कोई भी आनंदोत्सव लिट्टी-चोखा के बगैर पूरा नहीं होत

माई बिसरी-बाबू बिसरी, पंचकोसवा के लिट्टी-चोखा ना बिसरी

पंचकोसी को लेकर स्थानीय स्तर पर एक कहावत प्रचलित है, माई बिसरी-बाबू बिसरी, पंचकोसवा के लिट्टी-चोखा न बिसरी। पड़ाव के अंतिम दिन चरित्रवन में कई जिलों से लोग पहुंचकर उपले की आंच पर अपने हाथों से लिट्टी-चोखा पकाकर महाप्रसाद के रूप में ग्रहण कर आनंदोत्सव मानते है। अब तो यह महोत्सव का रूप ले चुका है। पूरा बक्सर शहर इस दिन लिट्टी चोखा बनाता और खाता है। पास के यूपी और झाारखंड से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं और जहां खाली जगह मिली, वहां खुद लिट्टी-चोखा सेंक कर खाते हैं। पकवान बनाने में इस्तेमाल होने वाले ऊपले और अन्य जरूरी सामानों की कई दुकानें किला मैदान और आसपास के क्षेत्रों में खुल

श्रद्धालुओं के लिए पैकेज टूर भी उपलब्ध

पंचकोसी के पांचों दिन यात्रा के लिए पर्यटन अथवा कला-संस्कृति विभाग के स्तर से तो कोई व्यवस्था नहीं होती, लेकिन स्थानीय स्तर पर ऑटो और वाहन चालक टूर पैकेज जारी करते हैं। इसमें शहर के किसी खास स्थल से रोज वे सवारी को बिठाते हैं और कार्यक्रम स्थल पर दिनभर रहने के बाद शाम में फिर वहीं लाकर छोड़ देते हैं। इसके लिए प्रति दिन पांच से सात सौ रुपये चार्ज करते हैं। इसके अलावा स्टेशन से भी अलग-अलग दिन आश्रमों के लिए ऑटो चलते हैं। पंचकोसी परिक्रमा समिति के सदस्य डा.रामनाथ बताते हैं कि आयोजन समिति साधु-संतों को लाने-ले जाने के लिए बस का इंतजाम करता है। उनका कहना है कि सरकारी स्तर पर थोड़ा भी सहयोग मिले तो श्रद्धालुओं को बहुत सहूलियत मिलेगी। 

पंचकोस के दो दिन बाद से सियपिय मिलन महोत्सव

पंचकोसी यात्रा के समापन बाद नया बाजार स्थित श्री सीताराम विवाह महोत्सव आश्रम की ओर से नौ दिवसीय कार्यक्रम सियपिय मिलन महोत्सव शुरू होने वाला है। यह महोत्सव 01 दिसंबर से प्रारंभ हो रहा है, जो नौ दिसंबर तक चलेगा। गौरतलब हो की आश्रम ने सन 2019 में इस कार्यक्रम के तहत अपना स्वर्ण जयंती मनाया था। जिसमें रामलीला, रासलीला, विविध विद्वानों के श्री मुख से धर्मकथा तथा विशेष रुप से विश्व प्रसिद्ध संत मुरारी बापू के 'बक्सर में अहिल्या उद्धार' कथा कार्यक्रम का श्रवण श्रद्धालुओं ने किया था। जिसमें हजारों-हजार की संख्या में संत समाज व श्रद्धालु शिरकत किए थे। महंत राजाराम शरण दास जी महाराज ने बताया की इस बार श्रीमज्जगद्गुरु रामानुजाचार्य डॉ. स्वामी राघवाचार्य जी महाराज (श्रीअवध धाम) के मुखारविंद से श्रद्धालु श्रीमद् बाल्मीकीय रामायण आधारित कथा प्रसंग का श्रवण कर सकेंगे। वहीं, वृंदावन की प्रख्यात मंडल के माध्यम से सुबह में रासलीला और रात्रि में रामलीला तथा अन्य विद्वतजनों के मुख से धर्मकथा की अमृत वर्षा होगी। कार्यक्रम के दौरान देश के कोने-कोने से शिरकत कर रहे साधु-संतों से इस धरती पर एक बार फिर से हरियाली लौटने वाली है।

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