पीढ़ियों से संरक्षित वनस्पतियों में तलाश रहे भविष्य का मंत्र

 

जिनोम संरक्षण प्राधिकरण कर रहा ऐसी विरासत संजोने वालों को सम्मानित
एकल नग वाला लहसुन सदियों से आदिवासी क्षेत्रों में खाया जाता है। उसकी गुणवत्ता का बड़ा बखान किया गया है। स्थानीय लोगों ने उनके प्रभाव को पीढ़ियों से देखा है। हालांकि इन वनस्पतियों के गुणों की वैज्ञानिक जांच परख अभी होनी बाकी है।

नई दिल्ली,  ब्यूरो। जलवायु परिवर्तन की वजह से कृषि क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों की नजर अपनी परंपरागत प्राचीन वनस्पतियों पर है। वैज्ञानिक इन वनस्पतियों में भविष्य की चुनौतियों से निपटने का मंत्र तलाश रहे हैं। देश के सुदूर क्षेत्रों में जहां प्राचीन समय से वनस्पतियों का संरक्षण वहां का समुदाय परंपरागत तरीके से करता आ रहा है। ऐसी प्राचीन और अद्भुत वनस्पतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित करने वाले परिवारों और समुदायों को पौधा किस्म और किसान अधिकार संरक्षण प्राधिकरण पिछले कई सालों से सम्मानित कर रहा है।

ऐसा पौधा जिसमें सारे गुण तुलसी के हैं, जिसे खाया जाता है, लेकिन देखने में वह तुलसी के पौधे जैसा नहीं है। इसी तरह हल्दी के गुण वाला पौधा, पर हल्दी जैसा नहीं। इसी तरह की सैकड़ों प्रजातियां हैं, जो विभिन्न पोषक तत्वों वाली है, जिसमें कई औषधीय और सूक्ष्म तत्व भरे पड़े हैं, इन्हें स्थानीय लोगों ने संरक्षित कर रखा है।

एकल नग वाला लहसुन सदियों से आदिवासी क्षेत्रों में खाया जाता है। उसकी गुणवत्ता का बड़ा बखान किया गया है। स्थानीय लोगों ने उनके प्रभाव को पीढ़ियों से देखा है। हालांकि इन वनस्पतियों के गुणों की वैज्ञानिक जांच परख अभी होनी बाकी है।

कुछ ऐसी जड़ी बूटियां भी हैं, जो विभिन्न बीमारियों को ठीक करने में काम आती है, उनके दावों को संबंधित राज्य सरकारों, स्थानीय शोध संस्थानों और अन्य संस्थाओं ने सम्मान के लिए नामित किया है।

प्राधिकरण के अध्यक्ष डाक्टर केवी प्रभु ने बताया कि कर्नाटक के बीदर के एक व्यक्ति के पास 500 पशुओं का झुंड है, जिनमें तरह-तरह के पशु हैं। उनके मिश्रित गोबर की खाद से जो गन्ना पैदा हुआ, उसकी रिकार्ड मोटाई है। गन्ने की गांठ पर एक के बजाय तीन-तीन आंखें हैं, जिससे इसकी बोआई में कम गन्ना लगता है।

इसी तरह छत्तीसगढ़ से चावल की ऐसी प्रजाति को एंट्री मिली है, जिसके खाने से लोगों में जबर्दस्त इम्यूनिटी बढ़ती है। दावा तो यहां तक किया गया है कि इसके खाने वालों में से किसी को भी कोरोना जैसा घातक रोग नहीं हुआ। हालांकि अभी इसका वैज्ञानिक परीक्षण होना बाकी है।

समारोह में कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने नौ राज्यों से आए 28 कृषि विरासतों को कई पीढ़ियों से संजोने वाले किसानों को पुरस्कृत किया। इन्हें एक लाख से 10 लाख रुपये तक का पुरस्कार दिया गया।