संगमनगरी के एक कमरे में कैसे समाई मां गंगा की यात्रा, बहुत ही रोचक है यह रहस्‍य

 

प्रयागराज के गोविंद बल्लभ पंत संस्थान में अनूठा संग्रहालय है। यहां गंगा की यात्रा का मनोहारी वर्णन किया गया है।
संग्रहालय के रिसर्च असिस्टेंट जय प्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि संग्रहालय में गंगा के रौद्र रूप के अलावा उफनाती नदी और शांत गंगा को भी देखा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि गंगा में पाई जाने वाली डाल्फिन की जानकारी को भी यहां सहेजा गया है।

प्रयागराज]। हिमालय की गोद से निकलकर गंगासागर तक कल-कल बहने वाली पतितपावन गंगा की यात्रा की कहानी के रहस्य को एक स्थान पर समाहित करने के लिए अनूठी पहल की गई है। गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान ने छोटे से कमरे में ऐसा संग्रहालय तैयार किया है, जिसमें गंगा की यात्रा का मनोहारी वर्णन किया गया है। इस अनोखे संग्रहालय में गंगा के सभी धार्मिक महत्वों समेत ऐतिहासिक विवरण भी मौजूद हैं। साथ ही, विभिन्न स्थलों के वाद्य यंत्रों को भी संग्रहालय में रखा गया है। झूंसी स्थित गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के संग्रहालय में संतों के जीवन से जुड़ा साहित्य और अन्य दुर्लभ सामग्री भी सहेजी गई है। 

2005 में रखी संग्रहालय की नींव

गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी बताते हैं कि संग्रहालय की नींव 2005 में रखी गई थी। गंगा की शुरुआत देवप्रयाग से हुई थी। वहां गंगा की गहराई तो कम थी, लेकिन लहरों की रफ्तार इतनी तेज थी कि पहाड़ काट डाले। देवप्रयाग का हिंदू धर्म में अहम महत्व है। देवप्रयाग में भगीरथी और अलकनंदा मिलती हैं। इनके संगम से ही बनती है गंगा की धारा।

संग्रहालय में देखिए गंगा के कई रूप

संग्रहालय के रिसर्च असिस्टेंट जय प्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि संग्रहालय में गंगा के रौद्र रूप के अलावा उफनाती नदी और शांत गंगा को भी देखा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि गंगा में पाई जाने वाली डाल्फिन की जानकारी को भी यहां सहेजा गया है। शोध के अनुसार गंगा में दो हजार से भी कम डाल्फिन बची हैं। ये पानी में रहने वाले किसी भी जीव की सबसे कम तादाद है।

तटीय इलाकों की जीवनशैली की झलक

संग्रहालय में तस्वीरों के जरिए तटीय इलाकों की जीवनशैली की भी झलक दिखाई देगी। इसमें गंगा के किनारे लोग खेलते-कूदते भी नजर आएंगे और धार्मिक अनुष्ठान करते भी। बताया गया है कि गंगा करीब 40 करोड़ लोगों के लिए पानी का जरिया भी है। यह लोग दावा करते हैं कि गंगा से मोक्ष मिलता है। उन्हें मां कहकर पूजा जाता है। इसके बावजूद गंगा को गंदा करने में हिचकिचाहट नहीं होती। 

गंगा पर निर्भर हैं निषाद और संत

संग्रहालय में करीने से यह भी दिखाया गया है कि नदियां जल का मुख्य श्रोत हैं और सभी जीवों का भरण-पोषण करती हैं। इस लिहाज से मानव ने ऐसे स्थापत्य का निर्माण गंगा के किनारे किया, जहां प्राचीनकाल से ही दुनिया की मुख्य सभ्यताएं पनपीं। इसके किनारे बसे विभिन्न समुदायों को इसने एक भिन्न सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक संपत्ति भी प्रदान की। किसान, मांझी, मल्लाह, पुजारी और कई अन्य समुदाय अपनी जीविका के लिए गंगा पर निर्भर हैं। नदी पार कराना, मछली मारना, बालू का खनन निषादों का मुख्य व्यवसाय रहा है। इसके अलावा वह नदियों के किनारे रेती में फसल, ककड़ी, खरबूज, तरबूज, लौकी, करेला, कद्दू, तरोई आदि तैयार कर जीवनयापन करते हैं।

सुंदरबन का सुंदर नजारा

संग्रहालय में कोलकाता की हुगली नदी के किनारे बसे सुंदरबन का नजारा भी देखने को मिलता है। गंगा को बंगाल में हुगली के नाम से जाना जाता है। कोलकाता तीन गांवों सुतानाटी, गोविंदपुरी और कालिकाता से मिलकर बना है। धीरे-धीरे विकसित होते हुए इसने महानगर का रूप ले लिया। यहां हुगली नदी का बंदगाह भी है। जहां से प्रतिवर्ष जहाजों से सामग्रियां भरकर अन्य स्थानों को भेजी जाती हैं। बंगाल में ही सुंदरबन डेल्टा है। डेल्टा का यह दृश्य गंगा नदी घाटी की एक विशिष्ट संस्कृति दिखाती है। इसमें मैनग्रोव यानी सुंदर गांछ का विशाल जंगल है। इसमें रायल बंगाल टाइगर आज भी वास करते हैं। वन में रहने वाले समुदाय कृषि व जंगल से जुड़े व्यवसायों से अपना जीवनयापन करते हैं। मधुपालन, मछली मारना, लकड़ी काटकर बेचना यहां के समुदायों का मुख्य पेशा है। यहां की वन देवी मां दुर्गा का एक रूप हैं, जिनकी पूजा वन बीबी के रूप में की जाती है।

गंगासागर है गंगा का आखिरी पड़ाव

गंगा का आखिरी छोर गंगासागर है। यहां आकर गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हैं। गंगासागर बंगाल में स्थित है, जो गंगा की यात्रा का अंतिम पड़ाव है। इस स्थान को पवित्र माना जाता है क्योंकि यहीं भगीरथी ने अपने पूर्वजों की अस्थियों को गंगाजल से पवित्र किया था। यहां कपिलमुनि का एक मंदिर भी स्थित है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस अवसर पर आश्रम की ओर देखते हुए यहां स्नान करने का अपना पहत्व है। इस पर्व को मनाने के लिए यहां विशाल गंगासागर मेला लगता है।

जीबी पंत संस्‍थान के निदेशक ने यह कहा

जीबी पंत संस्‍थान के निदेशक प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी ने कहा कि संस्थान में स्थापित गंगा संग्रहालय में गंगोत्री से गंगासागर तक का स्वर्णिम इतिहास समेटा गया है। इसमें लोगों को ज्यादा से ज्यादा आना चाहिए। इससे पतितपावनी मां गंगा के बारे में मन में जो जिज्ञासाएं होंगी, वह शांत हो जाएंगी।