शिक्षण को रोचक और प्रभावी बनाने के लिए नवाचार जरूरी, केवल शिक्षण का कार्य करें शिक्षक

 

शिक्षकों को पूरी सजगता के साथ अपने छात्रों के भविष्य निर्माण की दिशा में जुट जाना चाहिए
शिक्षक की श्रेष्ठता इस बात में नहीं है कि वह कितना योग्य है बल्कि इस बात से होती है कि उसने अपनी योग्यता से अपने विद्यालय के बच्चों को किस योग्य बनाया। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार केवल शिक्षक ही ला सकता है।

 एक समय था जब अधिकांश बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ा करते थे। लेकिन धीरे-धीरे समय बदला। वर्तमान परिस्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं। आज कोई भी संपन्न व्यक्ति अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में पढ़ाना नहीं चाहता। इसलिए नहीं कि वहां सुविधाओं का अभाव है और उसके बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलेगी, बल्कि इसलिए कि उसे लगता है कि ये विद्यालय केवल उन लोगों के लिए रह गए हैं जो अपने बच्चों को एक समय का भोजन नहीं दे सकते, उनके लिए दो जोड़ी कपड़े, स्वेटर, जूते आदि का खर्च वहन नहीं कर सकते।

दरअसल समाज में यह भ्रांति फैला दी गई है कि सरकारी विद्यालय के शिक्षक अपना कार्य सही से नहीं करते हैं। समय से विद्यालय नहीं जाते हैं। बच्चों को मन से नहीं पढ़ाते हैं। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। अधिकांश शिक्षक विषम परिस्थितियों में भी नियमित रूप से अपने विद्यालय जाते हैं और पूर्ण मनोयोग से बच्चों को अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करते हैं। कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं जो हर जगह होते हैं, लेकिन केवल चंद लोगों की वजह से सारे शिक्षक समुदाय को दोषी नहीं माना जाना चाहिए।

विगत वर्षो के दौरान अनेक शिक्षकों ने अपने वेतन से अपने विद्यालय का कायाकल्प करने का प्रयास किया है जिसकी सराहना विभिन्न समाचार पत्रों द्वारा भी की जाती रही है। इंटरनेट मीडिया मंचों पर रोज किसी न किसी शिक्षक को अपने विद्यालय और बच्चों का स्वरूप बदलते हुए देखकर अच्छा लगता है। उनसे प्रभावित होकर और बेहतर कार्य करने का मन करता है। एक शिक्षक होने के नाते मेरा मानना है कि शिक्षण कार्य बहुत जटिल कार्य है, इसे कदापि सरल न समझें। बेसिक शिक्षा में तो ये और भी जटिल हो जाता है, क्योंकि यहां की अधिकांश परिस्थितियां विपरीत हैं। हमें ऐसे बच्चों को शिक्षा देनी होती है जिनमें से अधिकांश बच्चे न तो स्वयं शिक्षा ग्रहण करना चाहते हैं और न ही उनके माता-पिता उनको शिक्षा दिलाने के प्रति सजग रहते हैं। वे शिक्षा के महत्व को नहीं समझते। अधिकांश समय वे बच्चों को घरेलू व आजीविका संबंधी कार्यो में अपने साथ व्यस्त रखते हैं।

आज बेसिक शिक्षा एक ऐसी प्रयोगशाला का रूप लेती जा रही है जिसमें अधिकांश प्रयोग अपने शुरुआती दौर में ही असफल हो जाते हैं और केवल कागजों पर सफल नजर आते हैं। शिक्षक रोज नए शासनादेश का पालन करने के लिए विवश है। वह करे तो करे क्या? शासनादेश का पालन करते करते वह अपने मूल कार्य को ही भूलता जा रहा है और शिक्षण कार्य को छोड़ अन्य सभी कार्यो में मजबूरन रुचि ले रहा है। बेसिक शिक्षा के जो बदलाव कहीं न कहीं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में बाधक बनते नजर आ रहे हैं, उसमें शिक्षक के महत्वपूर्ण सुझाव को दरकिनार किया जा रहा है।

शिक्षक के मनोभावों को समझने का प्रयास नहीं किया जाता। धरातल पर कार्य करने वाले शिक्षकों का सुझाव लेने व उन्हें महत्व देने की जरूरत है। शिक्षकों के प्रति भरोसा बढ़ाया जाए, जिसके लिए उनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। थोपे जाने वाले बदलाव शिक्षा की गुणवत्ता को कमजोर कर रहे हैं। शिक्षण को रोचक और प्रभावी बनाने के लिए नवाचार जरूरी है, लेकिन सीमित रूप में। शिक्षक की श्रेष्ठता इस बात में नहीं है कि वह कितना योग्य है, बल्कि इस बात से होती है कि उसने अपनी योग्यता से अपने विद्यालय के बच्चों को किस योग्य बनाया। वर्तमान समय बेसिक शिक्षा में व्यापक परिवर्तन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है, क्योंकि यह मामला वर्तमान सरकार की प्राथमिकता में भी है और विद्यालय के भौतिक परिवेश में पंचायती राज विभाग के सहयोग से बच्चों के लिए मूलभूत सुविधाओं की स्थापना की जा रही है। लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार केवल शिक्षक ही ला सकता है, इसलिए शिक्षकों को पूरी सजगता के साथ अपने छात्रों के भविष्य निर्माण की दिशा में जुट जाना चाहिए।