लोकतांत्रिक देश की मजबूती के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायिक प्रणाली का होना बेहद जरूरी

 

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की आवश्यकता। फाइल फोटो
उम्मीद जताई जा रही है कि इसी माह केंद्रीय विधि मंत्री किरण रिजिजू और राज्य के कानून मंत्रियों के बीच होने वाली एक प्रस्तावित बैठक के एजेंडे में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन करना शामिल हो सकता है।

 अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन देश की संपूर्ण न्याय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है। एआइजेएस यानी अखिल भारतीय न्यायिक सेवा से अखिल भारतीय मेरिट चयन प्रणाली के जरिये योग्य और नई कानूनी प्रतिभाओं को शामिल करने का मौका मिलेगा। बता दें कि नीति आयोग ने बहुत पहले ही सुझाव दिया था कि निचली अदालतों में न्यायाधीशों के चयन के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन किया जाए, जिससे जजों की कमी से जूझ रही न्यायपालिका में युवाओं को आकर्षित किया जा सके। वैसे अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के लिए केंद्र सरकार एक बार फिर सक्रिय हो रही है। इसके गठन का विचार कोई नया नहीं है। विधि आयोग अपनी कई रिपोर्ट में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की सिफारिश कर चुका है।

यही वजह है कि न्यायिक व्यवस्था को गति देने के लिए अब केंद्र सरकार ने देश में न्यायिक सेवा के स्वरूप को बदलने की तैयारी पर विचार शुरू कर दिया है। मालूम हो कि अधीनस्थ न्यायपालिका में इस समय न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के 21,320 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से करीब 25 प्रतिशत रिक्त ही हैं। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के अभाव में उतनी नियुक्तियां नहीं हो पा रही हैं, जितने न्यायाधीशों की जरूरत है। देश में लंबित अदालती मामलों में 80 प्रतिशत से अधिक जिला और अधीनस्थ अदालतों में हैं। यानी प्रत्येक न्यायाधीश के पास औसतन 1,350 मामले लंबित हैं, जो प्रति माह 43 मामलों को मंजूरी देता है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर भारत में प्रति दस लाख लोगों पर लगभग 17.7 न्यायाधीश ही हैं।

उल्लेखनीय है कि विधि आयोग ने अपनी 120वीं रिपोर्ट में सिफारिश की है कि प्रति दस लाख जनसंख्या पर न्यायाधीशों की संख्या 50 होनी चाहिए। इसके लिए स्वीकृत पदों की संख्या बढ़ाकर तीन गुना करनी होगी, क्योंकि आज भी अगर पूरे देश के न्यायालयों (निचली) में लंबित मामलों पर ध्यान दिया जाए तो यह संख्या करोड़ों में है। दुनिया के विकसित देशों पर ध्यान केंद्रित किया जाए तो पता चलता है कि आस्ट्रेलिया में प्रति दस लाख की आबादी पर जजों की संख्या 42, कनाडा में 75, ब्रिटेन में 51 और अमेरिका में 107 है, लेकिन भारत में यह केवल 11 है। गौरतलब है कि कई बार सरकार न्यायिक गति को दुरुस्त करने की कोशिश कर चुकी है। सरकार ने पिछले वर्षो में भी अखिल भारतीय न्यायिक सेवा परीक्षा कराने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन तब नौ हाईकोर्ट ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था, जबकि आठ ने प्रस्तावित ढांचे में बदलाव की बात कही थी। केवल दो हाईकोर्ट ने सरकार के इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। इसके पहले 1961, 1963 और 1965 में मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन पर चर्चा हुई थी और सहमति बनी थी, लेकिन यह प्रस्ताव कागजों से आगे नहीं बढ़ सका।

सवाल उठता है कि आखिर जब सब चाहते हैं कि देशभर में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आयोग बने और युवा, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में पहुंचे तो आखिर क्या वजह है कि 60 साल से ज्यादा समय से प्रस्ताव के बाद भी ऐसा आयोग नहीं बन पा रहा है? देश में कमजोर होती न्यायिक प्रणाली को सुधारने के संबंध में अब न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का समय आ गया है। इस सेवा के न लागू होने का एक कारण सीआरपीसी और सीपीसी के प्रविधानों को भी माना जा रहा है। इन प्रविधानों के तहत अधीनस्थ न्यायालयों में आदेश स्थानीय भाषा में भी दिया जा सकता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि अखिल भारतीय न्यायिक नियुक्ति सेवा के लागू होने के बाद न्यायाधीशों का एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण होने लगेगा जिससे भाषा की समस्या आएगी। इसके लिए सरकार को अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक कार्यो में स्थानीय भाषा के इस्तेमाल के तथ्य को ध्यान में रखते हुए इस सेवा के गठन के लिए प्रयास करना चाहिए। अभी अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायिक अधिकारियों की भर्ती, नियुक्ति, स्थानांतरण और सेवा की अन्य शर्ते भी संबद्ध राज्य सरकारें ही तैयार करती हैं। इसीलिए कुछ राज्य सरकारें और हाईकोर्ट को लगता रहा है कि अखिल भारतीय न्यायिक नियुक्ति सेवा हो जाने के बाद न्यायाधीशों की नियुक्तियों में उनकी भूमिका सिमट जाएगी तो कुछ राज्य इसे संघीय ढांचे के खिलाफ भी मानते हैं, जिनके नाते अब तक अखिल भारतीय न्यायिक नियुक्ति सेवा का प्रस्ताव कागजों से आगे नहीं बढ़ पाया।

यदि इस सेवा का गठन होता है तो न्यायाधीशों की नियुक्ति में अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के समान एक निष्पक्ष एजेंसी की भूमिका होगी। इससे न्यायिक सेवा में प्रतिभावान विधि स्नातक शामिल किए जा सकेंगे, जो सामान्यत: न्यायिक सेवा में भर्ती न होकर सरकारी और निजी क्षेत्र में अन्य ऐसे पदों की तलाश में रहते हैं जहां उन्हें ज्यादा आर्थिक लाभ मिल सके। इसे लागू करने से ऐसी भी उम्मीद की जा रही है कि प्रतिभावान युवा कम उम्र में ही न्यायिक सेवा में आ जाएंगे। साथ ही देश के अलग-अलग राज्यों में न्यायिक सेवा में नियुक्ति और पदोन्न्ति में एकरूपता आ सकती है। न्यायिक सेवा आयोग बनने के बाद लगातार न्यायाधीशों की नियुक्ति में जो पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं, वे भी समाप्त हो जाएंगे।

गौरतलब है कि ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2019’ कहती है कि न्यायिक व्यवस्था में महिलाओं की समुचित भागीदारी नहीं होना चिंता का विषय है। अगर अखिल भारतीय न्यायिक नियुक्ति सेवा का गठन हो जाएगा तो यह समस्या भी खत्म हो जाएगी और महिलाएं अपनी प्रतिभा साबित कर इस क्षेत्र में अपना स्थान बना सकेंगी। इससे लैंगिक असमानता भी खत्म होगी और त्वरित न्याय की अवधारणा भी सफल होगी। देश की जिला अदालतों में अभी जो स्थिति है, उसमें भी निश्चित ही न्यायपालिका को अधिक जवाबदेह, दक्ष, पेशेवर एवं पारदर्शी बनाकर न्याय की गुणवत्ता और पहुंच में वृद्धि होगी। नवनियुक्त न्यायाधीशों को स्थानीय भाषा सिखाकर अथवा निचली अदालतों के न्यायाधीशों का केवल राज्य के अंदर ही स्थानांतरण करने जैसे प्रविधानों से राज्यों की चिंताओं को दूर किया जा सकता है, ताकि राज्य एवं उच्च न्यायालय इस सेवा की स्थापना को सहर्ष स्वीकार करें।

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