महिलाओं में स्वाभिमान जगाया क्रांतिकारी स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की पत्नी यमुनाबाई ने

 

क्रांतिकारी स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर की पत्नी यमुनाबाई

आजादी के संग्राम में सीना खोल कर खड़े सेनानियों की पत्नियों के संग्राम के किस्से महान हैं और सावरकर घराने की तो तीनों महिलाओं येसूवहिनी माई ताई के त्याग की कहानी तो अमिट है..

नई दिल्ली। जिन पत्नियों के पति काले पानी की सजा काटने चले जाएं, उनके वापस आने की उम्मीद धुंधला जाए, उनके बच्चे छोटी उम्र में ही भगवान को प्यारे हो जाएं, और तो और रोज अंग्रेज सिपाही परेशान करने घर आएं, उन पत्नियों के कष्टों का कयास लगा पाना भी कठिन है। लेकिन सावरकर परिवार के तीनों भाइयों गणेश, विनायक और नारायण सावरकर की पत्नियों क्रमश: यशोदाबाई, यमुनाबाई और शांताबाई ने न केवल अपनी देशभक्ति का हिम्मत से परिचय दिया बल्कि समाज के सुधार और महिलाओं में स्वाभिमान जगाने के लिए भी वे आगे आईं।

यूं आईं यमुनाबाई सावरकर घर में

अल्पायु में ही वीर सावरकर की मां का देहांत हो गया था। घर में एक महिला का होना जरूरी समझते हुए पिता ने बड़े बेटे गणेश सावरकर की शादी की और यशोदाबाई मात्र 11 साल की उम्र में सावरकर परिवार की बड़ी बहू बन गईं। सभी उन्हें प्यार और आदर से 'येसूवहिनी' कहते थे। पिता के भी जाने और आर्थिक संकट आने पर गणेश सावरकर और येसूवहिनी ने छोटे भाइयों की पढ़ाई का बीड़ा उठाया। येसूवहिनी ने जैसे-तैसे अपने गहने बेच कर मझले भाई विनायक दामोदर सावरकर को मैट्रिक करवाया। अब उनकी आगे की पढ़ाई पर प्रश्नचिन्ह था।

इसी बीच जवाहर रियासत के दीवान भाऊराव चिपलूनकर ने विनायक के लिए अपनी सात बेटियों में सबसे बड़ी यमुना के विवाह का प्रस्ताव विनायक के लिए भेजा और उनकी उच्च शिक्षा का खर्चा उठाने की भी बात की। बात आगे बढ़ी और यमुनाबाई चिपलूनकर सावरकर परिवार में मंझली बहू बनकर आ गईं। उन्हें 'माई' कहा जाने लगा। माई मात्र चार कक्षा तक पढ़ी थीं।

मायके में चांदी की थाली में खाती थीं खाना रईस घराने की होने के कारण माई अपने मायके में चांदी की थाली में खाना खाती थीं, जबकि सावरकर के घर के हालात ठीक इसके विपरीत थे। इसके बावजूद शादी के बाद माई ने सावरकर के घर को अच्छी तरह से संभाल लिया। सावरकर परिवार की तीनों महिलाओं के स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान पर नाटक 'तिया तिघी' में तीनों किरदार स्वयं निभाने वाली पुणे की एक्टर अपर्णा सुरेंद्र चोथे कहती हैं, 'माई ने बिना कोई प्रतिरोध किए सावरकर के परिवार को अपना लिया। जब उनका पहला बेटा प्रभाकर हुआ, तब विनायक सावरकर लंदन में थे और संघर्ष कर रहे थे। कुछ समय बाद उनके बेटे प्रभाकर की चेचक से मृत्यु हो गई।

माई के सामने पुत्र के जाने और पति के पास न होने का दुख था लेकिन उन्होंने बहुत हिम्मत रखी और सावरकर को भी निराश नहीं होने दिया। 'सिटी आफ विक्ट्री' के लेखक और ब्लागर रत्नाकर लिखते हैं कि विनायक सावरकर से शादी होने के बाद माई ने देशभक्ति को अपना जीवन बना लिया।

पति के शब्द दिल में बिठाए

जब वीर सावरकर को काले पानी की सजा के लिए अंडमान ले जाया जाने वाला था, तब माई ने मुश्किल से उनसे मिलने की अनुमति प्राप्त की। मुंबई की डोंगरी जेल में वह अपने पति से मिलीं। उस समय उन्हें नहीं पता था कि इसके बाद वह अपने पति को देख भी पाएंगी या नहीं। वह अपने बेटे प्रभाकर की चेचक से हुई मौत से भी आहत थीं। उन्हें देखकर मजबूत हृदय वाले वीर सावरकर ने भावुक स्वर में अपनी पत्नी से कहा, 'तिनके-तीलियां बीनना और बटोरना तथा उससे एक घर बनाकर उसमें बाल-बच्चों का पालन-पोषण करना..., यदि इसी को परिवार और कर्तव्य कहते हैं तो ऐसा संसार तो कौए और चिड़िया भी बसाते हैं। अपने घर-परिवार-बच्चों के लिए तो सभी काम करते हैं, मैंने अपने देश को अपना परिवार माना है, इसका गर्व कीजिए।

इस दुनिया में बोए बिना कुछ भी उगता नहीं है। धरती से ज्वार की फसल उगानी हो तो उसके कुछ दानों को जमीन में बोना ही होता है। बीज जमीन में, खेत में जाकर मिलते हैं तभी अगली ज्वार की फसल आती है। यदि हिंदुस्तान में अच्छे घरों का निर्माण करना है तो हमें अपना घर कुर्बान करने से पीछे नहीं हटना चाहिए। जब तक कोई न कोई मकान ध्वस्त होकर मिट्टी में नहीं मिलेगा, तब तक नये मकान का नवनिर्माण कैसे होगा?कल्पना करो कि हमने अपने ही हाथों अपने घर के चूल्हे फोड़ दिए हैं, अपने घर में आग लगा दी है, परंतु आज का यही धुआं कल भारत के प्रत्येक घर से स्वर्ण का धुआं बनकर निकलेगा।'

वीर माई ने संभाला सावरकर को

सावरकर यमुनाबाई के कष्टों को समझ रहे थे। वह बोले कि यदि अगला जन्म मिला, तो हमारी भेंट होगी, अन्यथा यहीं से विदा लेता हूं। उन दिनों काले पानी की सजा से वापस लौटना मुश्किल माना जाता था। इस मुश्किल परिस्थिति में भी मात्र 25-26 वर्ष की युवा माई सावरकर ने पति के चरणों को स्पर्श किया और कहा, 'हम ऐसा ही करेंगे। जहां तक हमारा सवाल है हम जरूर मिलेंगे। आप चिंता न करें। अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखे।' माई ने निराश हो रहे सावरकर को अपने शब्दों से संभाला। उन्होंने सावरकर के समाज सुधार के अभियानों में भी साथ दिया।

यमुना ही थीं युवा कमला

माना जाता है कि सावरकर की लिखी महान कविता 'कमला' में युवा कमला का व्यक्तित्व माई से मिलता है। माई के प्रति सम्मोहन को ही उन्होंने शब्दों में ढाला। यह भी कहा जाता है कि यमुनाबाई की आवाज भी बहुत मीठी थी। जल्दी ही वह सावरकर की काव्य कल्पना की आवाज बन गईं। माई ने उनकी कविताओं को अपनी आवाज में गाया। वीर सावरकर दुनिया के ऐसे पहले कवि थे, जिन्होंने कालापानी की सजा के दौरान अंडमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएं लिखीं और फिर उन्हें याद किया।

इस प्रकार याद की हुई 10 हजार पंक्तियों को उन्होंने जेल से छूटने के बाद फिर से लिखा। जाने-माने लेखक विक्रम सम्पत ने अपनी किताब 'सावरकर-एक भूले बिसरे अतीत' में लिखा है कि अंडमान की सेलुलर जेल की जिस कोठरी में सावरकर को रखा गया था, उसी में उन्होंने अपने महाकाव्य 'कमला' की रचना की। जब सावरकर अंडमान से छूटकर रत्नागिरी में आए तो यमुनाबाई रत्नागिरी में अस्पृश्यता आंदोलन का हिस्सा बनीं। सावरकर को हमेशा अपनी पत्नी का साथ मिला। सावरकर की बिना शर्त रिहाई के बाद जब माई सार्वजनिक तौर पर नजर आने लगीं तब उन्होंने एक सभा में कहा कि, 'यह देश मेरा घर है और मेरा घर मेरा देश।'

माई की रसोई में कस्तूरबा

जब मार्च 1927 में गांधी जी कस्तूरबा के साथ महाराष्ट्र के दौरे पर आए तो वे रत्नागिरी भी गए। एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने सावरकर से मिलने की इच्छा प्रकट की। चूंकि सावरकर को उन दिनों बुखार था इसलिए वह गांधीजी से मिलने नहीं जा सके और उन्हें अपने घर पर ही आमंत्रित किया। तब गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ उनके घर जाकर मिले। यह गोपनीय बैठक करीब 90 मिनट तक चली। इस बीच कस्तूरबा और माई रसोईघर में आपस की बातें करती रहीं। जब गांधी जी की हत्या हुई, तब एक भीड़ ने सावरकर के घर पर हमला कर दिया। ऐसे में माई लाठी लेकर उनसे भिड़ गईं और सावरकर की ढाल बन गईं।

पूजा में कोई खलल नहीं

माई एक धार्मिक महिला थीं। उन्होंने मौन रहकर सावरकर को प्यार किया और उनकी पूजा की। वह सावरकर की छोटी-छोटी जरूरतों का खयाल रखती थीं। वह रोज भगवान की पूजा किया करती थीं। हालांकि सावरकर खुद पूजा पर विश्वास नहीं करते थे, पर वे दूर से उन्हें देखते रहते। हालांकि उन्होंने कभी माई को पूजा करने से रोका टोका नहीं।

परिवार का आधार येसूवहिनी

सावरकर जैसे आजादी के दीवानों के बारे में शोध करने वाले तो हजारों मिल जाते हैं लेकिन जब बात उनकी पत्नियों की वीरता और त्याग की आती है तो यह संख्या दो या चार ही रह जाती है। प्रसिद्ध नाटककार अपर्णा सुरेंद्र चोथे आगे कहती हैं, 'यशोदा बाई यानी येसूवहिनी, सबसे बड़े भाई बाबाराव सावरकर की पत्नी थीं। मैंने उन पर एक शोध पुस्तक लिखी है। जब सावरकर भाइयों के पिता प्लेग में गुजर गए तो उन्होंने अपने गहने बेचकर छोटे भाइयों की पढ़ाई को जारी रखने में पति बाबाराव की सहायता की। वे उन दो छोटे बच्चों की मां बन गईं, जबकि उनकी दो बेटियां दस दिन की आयु में ही चल बसी थीं। उन्होंने 'आत्मनिष्ठ युवती संघ' नाम से एक अभियान चलाया जिसमें क्रातिकारियों की पत्नियां शामिल रहती थीं। वे स्वदेशी का प्रयोग करने के लिए महिलाओं को प्रेरित करती थीं। उस समय जब महिलाएं घर की चौखट भी नहीं लांघती थीं, तब येसूवहिनी के संघ में करीब डेढ़ सौ महिलाएं भाग ले रही थीं। जब उनकी बैठक होती तो उसमें हल्दी-कुमकुम के कार्यक्रम होते थे।

लोकमान्य तिलक के भाषण पढ़े जाते थे। वीर सावरकर की कविताओं को गाया जाता। 'आत्मनिष्ठ युवती समाज' की सदस्य महिलाएं अपने हाथ में भारत की बनी कांच की चूड़ियां ही पहनतीं और हाथ से बने कपड़े पहनतीं। लोकमान्य तिलक की पत्नी सत्यभूमि जब नासिक आईं तो इन महिलाओं ने उन्हें सम्मानित किया।

इन सदस्यों ने कोर्ट केस लड़ने में तिलक की सहायता के लिए पैसे भी जुटाए। येसूवहिनी के पति बाबाराव और विनायक सावरकर दोनों को अंग्रेजों ने काला पानी की सजा दी थी। उस समय जिन क्रांतिकारियों को काला पानी की सजा हुई थी उन सबकी पत्नियों का येसूवहिनी आधार बनीं। वह मात्र 34 वर्ष तक ही जीवित रहीं लेकिन उनका योगदान इतना था कि मैं उनके छोटे से जीवन पर 144 पेज की किताब 'तू धैर्याची अससी मूर्ति' लिख पाई।'

जरूरी दस्तावेज गद्दों में छिपा देती थीं शांताबाई सबसे छोटे भाई की पत्नी शांता बाई सावरकर भी महान थीं। जब दोनों बड़े भाई अंडमान में काला पानी की सजा भुगत रहे थे और उनकी तस्वीर भी कोई घर में नहीं रख सकता था, तब शांताबाई ने सबसे छोटे भाई नारायण सावरकर से जिद करके शादी की। उस समय उन्होंने अपनी हिम्मत दिखाई। सावरकर भाइयों के जिस घर में पानी पीना भी मना था, उस घर में वह शादी करने के लिए अड़ गईं। उन्होंने उसी घर में शादी की और अपनी देशभक्ति का परिचय दिया। उन्हें 'ताई' कहा जाने लगा।

एक्टर, एंकर अल्पना चोथे भी कहती हैं कि, 'जब बाबाराव सावरकर अंडमान से आए तो वह बहुत बीमार थे। ताई ने उनकी सेवा बेटी की तरह की। येसूवहिनी भी अपने आखिरी दिनों में काफी बीमार थीं तो शांता बाई ने उनकी भी काफी सेवा की। उन्होंने घर को संभाला। बाबाराव सावरकर जब जेल गए, तो उन्होंने उनके कागजात संभाले। जब उनके यहां अंग्रेज तलाशी लेने आते तो ताई व येसूवहिनी बुद्धिमत्ता के साथ उन कागजों को बचा लेतीं। शांताबाई ने भी येसूवहिनी का हर समय साथ दिया। घर की महिलाएं जरूरी दस्तावेज गद्दों में छिपा देती थीं। यह कोई 100 साल पुरानी बात है लेकिन उस समय भी ये महिलाएं बहुत मजबूत थीं।'

हमेशा बहनों की तरह रहीं

यशोदाबाई, यमुनाबाई और शांताबाई इन तीनों के संस्कार अलग थे, फिर भी तीनों ने अपने पतियों के साथ स्वतंत्रता संग्राम की राह पकड़ी। तीनों महिलाओं की पहली संतान की मृत्यु हुई। विनायक सावरकर के छोटे भाई नारायण सावरकर डेंटिस्ट बने। उन्हें डाक्टर बनाने और वीर सावरकर को बैरिस्टर बनाने में बड़े भाई बाबाराव सावरकर व उनकी पत्नी ने काफी त्याग किए। वह अपने देवरों को दूध-जलेबी खिला देतीं और खुद पानी पीकर सो जातीं। सावरकर के परिवार की तीनों महिलाओं का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। जब विनायक सावरकर के बेटे का निधन हुआ, तब भी येसूवहिनी उनके साथ खड़ीं थीं। उन्होंने एक-दूसरे का भरपूर साथ निभाया। तीनों अलग-अलग घर से आई थीं लेकिन बहन की तरह रहीं।

सावरकर बहुओं के किरदार मेरा जीवन बन गए

डा. शुभा साठे का मराठी में एक उपन्यास है 'त्या तिघी', जो तीनों सावरकर भाइयों की पत्नियों यशोदा बाई सावरकर, यमुनाबाई सावरकर और शांता बाई सावरकर पर आधारित है। जब मैंने यह उपन्यास पढ़ा तो मुझे लगा कि इसके बारे में अभी तक किसी को पता नहीं है। मैं खुद सावरकर जी के विचारों को मानती हूं लेकिन मुझे भी उस घर की महिलाओं के बारे में इतना पता नहीं था। आजादी की लड़ाई में पहले नायकों का जिक्र आता है और फिर उनकी पत्नियों का। जैसे महात्मा गांधी की बात के बाद ही कस्तूरबा का नाम आएगा, आंबेडकर के बारे में बात कर लेंगे तो रमा बाई का नाम आएगा। अगर ज्योति फुले के बारे में बोल लेंगे तो उसके बाद ही सावित्री बाई फुले के बारे में बोलना होगा। लेकिन इस संदर्भ में मुझे यह बात अच्छी तरह से समझ में आई कि सावरकर घराने की बड़ी, मझली और छोटी बहू का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है।

माई का योगदान है कि वह एक तेज क्रांतिकारी की पत्नी थीं और अपने पति का बराबर सहयोग करती रहीं। जब सावरकर अंडमान से आए तो उन्होंने अस्पृश्यता आंदोलन पर काफी काम किया था। जब सावरकर ने जाति प्रथा को तोड़ने की कोशिश की थी तो माई भी उनके साथ गांवों में जातीं। उन लोगों के घरों में जातीं जिन्हें छूना अपराध माना जाता था। अगर सावरकर की पत्नी किसी के घर जातीं तो वे गर्व से भर उठते। उपन्यास पढऩे के बाद मुझे लगा कि इसमें कुछ कर सकते हैं। फिर मैंने पूरा स्क्रिप्ट लिखा और एकल प्रदर्शन के लिए नाटक तैयार किया। एक घंटे बीस मिनट तक लगातार अभिनय से खुद तीनों किरदार निभाती हूं। कोशिश करती हूं कि उनके जीवन के त्याग और आजादी के संग्राम में उनकी भूमिका सभी के सामने आए। स्क्रिप्ट तैयार करने और उसे स्टेज पर लाने में मुझे नौ महीने लगे।

इस प्रदर्शन के लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी मिला। मैंने उन पर शोध किया और यह कोशिश की कि देखने वालों को किरदार वास्तविक लगे। अब तो यह विषय और अभिनय ही मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया है। आज हम छोटी सी नाकामयाबी से निराश हो जाते हैं। इन महिलाओं से कठिन जीवन में हिम्मत रखने की प्रेरणा मिलती है। अपने निर्णयों को जिम्मेदारी के साथ कैसे आगे लेकर जाना है, यह हम उनसे सीख सकते हैं। सावरकर घराने की महिलाएं स्व-संरक्षण जानती थी। माई, येसूवहिनी व ताई में काफी हौसला था। सावरकर के त्याग को हम सब जानते हैं लेकिन उनके दोनों भाइयों ने भी आजादी की लड़ाई में अपना काफी योगदान दिया। बहुत कुछ लिखा। काला पानी की सजा उनके बड़े भाई ने भी काटी है। सावरकर भाई क्रांति सूर्य हैं। उनके पीछे तीनों पत्नियों के प्रयास छुप जाते हैं।