दूर होनी चाहिए समय से न्याय मिलने की राह में आने वाली सभी बाधाएं

 

त्वरित गति से न्याय मिलने की उम्मीद जग सकती है।
 पिछले दिनों देश में सभी राज्य सरकारों एवं उच्च न्यायालयों को अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की दिशा में आपसी सहमति कायम करते हुए जल्द से जल्द एक निर्णायक कदम उठाने की आवश्यकता है।

 पिछले कुछ समय से देश में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की मांग जोर-शोर से की जा रही है। दरअसल अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के तहत अखिल भारतीय मेरिट चयन प्रणाली के जरिये योग्य और प्रतिभावान लोगों को शामिल किया जाएगा। हालांकि यह केंद्र सरकार को यह सुझाव पहले भी दिया जा चुका है, जिसके तहत देश की निचली अदालतों में न्यायाधीशों के चयन के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की सिफारिश की गई थी। इस सेवा के गठन के मुख्य कारणों में यह बताया गया था कि ऐसा होने से देश में न्यायाधीशों की कमी को दूर करने के साथ ही युवाओं मेंउल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा कोई नया एजेंडा नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 312 में आल इंडिया सर्विसेज (अखिल भारतीय सेवा) की बात कही गई है। वर्ष 1976 में संविधान संशोधन के जरिये प्रविधान किया गया था कि संसद कानून बनाकर एक या उससे ज्यादा अखिल भारतीय सेवाएं (आल इंडिया सर्विसेज) सृजित कर सकती है और इसमें अखिल भारतीय न्यायिक सेवा भी शामिल है। दरअसल विधि आयोग पूर्व में तीन बार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की सिफारिश कर चुका है। वहीं कोरोना महामारी जनित कारणों से प्रभावित होती न्यायिक व्यवस्था को केंद्र सरकार द्वारा देश में न्यायिक सेवा के स्वरूप में परिवर्तन करके समुचित गति प्रदान किया जा रहा है। इससे युवाओं को अधिक से अधिक संख्या में न्यायिक सेवा में आने का अवसर मिलेगा।

हालांकि इस सेवा के गठन की राह में अनेक चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं, लेकिन केंद्र सरकार समेत इससे संबंधित तमाम प्राधिकरणों को आपसी तालमेल के जरिये कोई व्यावहारिक समाधान निकालना ही होगा, ताकि लोगों को समय पर न्याय मिल सके। वहीं दूसरी ओर इस संबंध में सरकार का मानना है कि अगर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन होता है तो इससे प्रतिभाशाली लोगों का एक पूल बनाने में मदद मिलेगी जो न्यायपालिका का हिस्सा बन सकते हैं।देखा जाता है कि निचली अदालतों में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद जैसे मुद्दे हावी रहते हैं। इस कारण कुछ खास वर्ग के लोग ही न्यायिक प्रणाली में पाए जाते हैं। इतना ही नहीं, कई मामलों में यह भी देखा गया है कि कुछ निचली अदालतों में कुछ खास स्थानीय परिवार के लोगों का दबदबा रहता है। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन से इस प्रकार की समस्याओं से भी निपटने में सहायता मिल सकती है।

लिहाजा, न्यायिक सेवा आयोग बनने के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति में पक्षपात के आरोपों पर भी विराम लग सकता है। ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2019’ के अनुसार न्यायिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने की दिशा में बात की गई है। इस सेवा के गठन से महिलाओं को न्यायिक सेवा से जोड़ा जाएगा जिससे सामान्य वर्ग की महिलाओं को भी त्वरित गति से न्याय मिलने की उम्मीद जग सकती है। देशभर की अदालतों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या निश्चित तौर पर न्यायाधीशों की नई भर्ती प्रणाली के गठन की मांग करती है, क्योंकि देश का सामाजिक और आर्थिक विकास तब तक नहीं संभव है जब तक देश में उचित और तीव्र न्यायिक प्रक्रिया विकसित नहीं होगी।

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