जीवन में जलाएं ज्ञान का दीया, हटाएं अज्ञानता का अंधेरा; सबके बारे में अच्छा सोचें

अपने जीवन से हटाएं अज्ञानता का अंधेरा।(फोटो: प्रतीकात्मक)
उस दिन दूसरों के लिए प्रकाश बनने का महत्व समझ में आया। इसी तरह दीपक भी हमें दूसरों के जीवन में प्रकाश करने की प्रेरणा देते हैं। अगर हम सब सबके बारे में इसी तरह अच्छा सोचने लगें तो यह कोरोना रूपी अंधकार भी एक दिन अवश्य गायब हो जाएगा।

पिछले लगभग दो वर्ष से कोरोना का प्रकोप सभी लोगों पर छाया हुआ है। हर किसी को किसी न किसी परेशानी का सामना करना पड़ा है। अभी दो दिन पहले दीपावली की रात को तरह-तरह के दीये , मोमबत्ती, बिजली से जलने वाली झालर कुछ अलग ही संदेश देकर गई हैं। संदेश यह कि अंधेरा कितना भी घना हो लेकिन छोटा-सा दीया पूरी ताकत से उसका सामना कर सकता है। यह बहुत ही सकारात्मक दृश्य होता है। किसी कवि ने कहा है, ‘एक माटी का दीया सारी रात अंधियारे से लड़ता है , तू तो भगवन का दीया है किस बात से डरता है।’

अज्ञानता का अंधेरा

हमारे कस्‍बे में एक बहुत बड़े व्यापारी थे, उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा था लेकिन उनकी चिंता का कारण अपने तीन बेटों में से उत्तराधिकारी का चयन था। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि व्यापार की बागडोर किसके हाथ में सौंपे। आखिरकार वह अपने गुरु के पास गए और समस्या बताई तो गुरुजी ने कहा कि एक परीक्षा लेकर हम उत्तराधिकारी का चयन कर सकते हैं। तीनों बेटों को बुलाकर बराबर पैसे देकर कम से कम पैसे खर्च करके एक कमरे को भरने का काम सौंपा गया। एक दिन का समय दिया गया। जब दिन के अंत में सबसे बड़े बेटे के पास पहुंचे तो उसने सारे पैसे खर्च करके कमरे को जानवरों के चारे से भरा हुआ था, दूसरे बेटे ने रुई से सारे कमरे को भरा हुआ था। गुरुजी कुछ ख़ास प्रभावित नहीं लग रहे थे। अंत में सबसे छोटे बेटे के पास पहुंचे तो क्या देखते हैं कि कमरे में एक दीपक जल रहा है और पूरे कमरे में प्रकाश भरा हुआ है और उसने काफी पैसे बचाकर भी रखे हैं। पूछने पर छोटे बेटे ने बताया कि अज्ञानता का अंधेरा कितना भी घना हो, जब ज्ञान का दीपक जलता है तो अंधकार को भागना ही होता है। आपको हैरानी नहीं होनी चाहिए कि सेठ ने अपने छोटे बेटे के हाथ में अपने व्यवसाय की बागडोर सौंप दी और निश्चिंत हो गए।

इसी से मिलती जुलती एक घटना लगभग 32 साल पुरानी है। उस समय हमारे देश में आधुनिकीकरण बस प्रारंभ हुआ ही था। बिजली की कमी थी, होटल बनने बस शुरू हुए थे। ज्यादातर लोग दूसरे शहर की यात्रा करने पर किसी रिश्तेदार के घर पर रुक जाते थे। उन दिनों हम लोग भी सपरिवार कार से नैनीताल जा रहे थे, तभी रास्‍ते में कार में कुछ खराबी आ गई और उसे हल्द्वानी में ही मैकेनिक को दिखाना पड़ा। लेकिन तब तक अंधेरा हो गया था और आगे का रास्ता पहाड़ी था, तो सोचा गया कि आज हल्द्वानी में ही रुक लेते हैं। उन दिनों वहीं पर हमारे एक दूर के रिश्तेदार रहते थे । कार ठीक होने के बाद हम लोग पूछते-पूछते उनके घर तक पहुंचे। वह समय ऐसा था जब टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल जैसी वस्तुएं उपलब्ध नहीं थीं, लोग जल्दी सो जाते थे। हम जब रिश्तेदार के घर के पास पहुंचे तो देखा कि दरवाजे पर बल्ब जल रहा था।

हमारे घर पर यह सामान्य प्रैक्टिस थी कि जो भी अंतिम व्यक्ति घर में आता था वह बाहर का बल्ब बंद कर देता था। ऐसे में रिश्तेदार के घर के बाहर बल्ब जल रहा था तो हमें खुश हुए कि लोग अभी जाग रहे हैं। जब दो-तीन बार बेल बजने के बाद दरवाजा खुला तो पता चला कि सब सो चुके थे। स्वागत मुस्कान के साथ अंदर बुलाया गया। आगे की बाकी व्यवस्‍थाएं होने लगीं, लेकिन मेरे दिमाग में जलते बल्ब का प्रश्‍न चक्‍कर मार रहा था। आखिरकार मुझसे नहीं रहा गया और मैंने अंकल से पूछा कि सब लोग सो रहे थे तो बाहर का बल्ब क्यों जल रहा था। तब अंकल बोले कि उनके पिताजी कहा करते थे कि जीवन में हम किसी को राह दिखा सकें या नहीं, लेकिन अगर अंधेरे में किसी को गड्ढे में गिरने से बचा लें तो कितनी अच्छी बात है। इसलिए हम लोग अपने दरवाजे का बल्ब जरूर जलाकर रखते हैं।

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