यूनिसेफ की जुबानी जानें- आखिर क्‍यों बच्‍चों के लिए सबसे घातक साबित हुआ है सदी का दूसरा दशक

 

बच्‍चों के लिए बेहद घातक रहा सदी का दूसरा दशक

दुनिया के कई देशों चल रहे संघर्ष की वजह से कई बच्‍चों ने बीते एक दशक के दौरान अपनी जान गंवाई है। यही वजह है कि ये दशक ऐसे बच्‍चों और युवाओं के लिए बेहद घातक साबित हुआ है।

न्‍यूयार्क (यूएन)। इस सदी का दूसरा दशक बच्‍चों के लिए काफी घातक साबित हुआ है। पूरी दुनिया में इस दशक के दौरान बच्‍चों को कई तरह की परेशानियों से दो-चार होना पड़ा है। इन परेशानियों ने उनकी पूरी जिंदगी को एक झटके में बर्बाद करने का काम किया है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह खूनी संघर्ष रहा है। इसकी जानकारी खुद संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की कार्यकारी निदेशक हेनरीएटा फोर ने दी है। उनके मुताबिक इस दशक के दौरान हिंसक संघर्ष पहले की अपेक्षा अधिक लंबे समय तक चलते दिखाई दिए। इसका सीधा असर वहां पर रहने वाले खासतौर पर युवाओं पर पड़ा है। फोर का यहां तक कहना है कि ये संघर्ष अधिक संख्‍या में युवाओं की मौत का कारण बने हैं।

यूनीसेफ के मुताबिक वर्ष 2010 की शुरुआत से लेकर अब तक के दरमियान बच्चों के अधिकार हनन के मामलों में भी जबरदस्‍त उछाल देखा गया है। इस दौरान करीब 70 हजार मामले सामने आए हैं। इसका अर्थ है हर रोज 45 मामले दर्ज किए गए हैं। ये अपने आप में गहरी चिंता का विषय है। फोर इस पर चिंता जताते हुए विश्‍व को इस तरफ ध्‍यान देने और इसकी रोकथाम के उपायों पर विचार करने की अपील की है। उनका कहना है कि बच्‍चों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। संघर्ष में शामिल गुट खुलेतौर पर उनके बुनियादी हकों और युद्ध के बुनियादी नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

यूनीसेफ चीफ ने इस पर अपनी चिंता व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि वर्ष 1989 में बाल अधिकार संधि के पारित होने के बाद हिंसक संघर्ष से पीड़ित देशों की संख्या मौजूदा दौर में सबसे अधिक है। इस तरह के हथियारबंद संघर्षों में बच्‍चों की बड़ी संख्‍या में मौत हो रही है। बच्‍चे दिव्‍यांग बन रहे हैं। साथ ही इसकी वजह से बच्‍चों को अपना घर छोड़कर दूसरी जगहों पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्‍होंने इस बात पर भी चिंता जाहिर की कि अधिकतर मामलों के सामने आने के बात केवल अफसोस जाहिर कर उन्‍हें ठंडे बस्‍ते में डाल दिया जाता है। वहीं कई मामले सामने तक नहीं आ पाते हैं।

आंकड़ों का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि वर्ष 2018 में यूनीसेफ ने बाल अधिकार हनन के चौबीस हजार से अधिक मामलों का सत्यापन किया था। इनमें हत्या, अपंगता, यौन हिंसा, बाल सैनिकों की भर्ती और स्कूलों व अस्पतालों पर हमले, अपहरण, मानवीय राहत का अभाव शामिल हैं। जो मामले सामने नहीं आ पाते हैं उनके लिए यूएन ने अपनी व्‍यवस्‍था को मजबूत किया है। हालांकि अपने मकसद में अब तक हमें सफलता नहीं मिली है। वर्ष 2010 की तुलना में बच्‍चों के खिलाफ हुए मामलों की संख्‍या तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2019 में भी बच्चों के ऊपर हुई हिंसा और उन पर हुए हमलों के मामले में कोई कमी नहीं आई। 2021 में ही जून तक यूएन ने करीब 10 हजार मामले दर्ज किए हैं। ये मामले कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, यूक्रेन और सीरिया में दर्ज किए गए हैं।