वैक्सीन की उपलब्धता और बीमारी होने की दशा में सस्ती दवाइयां और इलाज मानवता के बचाव के लिए एक जरूरी शर्त

 

कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए कारगर दवाइयों और वैक्सीन से अब तक अनेक देश वंचित हैं। फाइल फोटो

भारत कोरोना रोधी टीकाकरण के मामले में बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है परंतु विश्व के अनेक गरीब देशों में कई कारणों से यह अब तक शुरू भी नहीं हो पाया है या फिर आरंभिक अवस्था में है। फाइल

पिछले लगभग दो वर्षों से मानवता कोरोना महामारी से जूझ रही है, जिसका अंत निकट भविष्य में दिखाई नहीं दे रहा। मानवता के समक्ष केवल यह बीमारी ही नहीं है, बल्कि इससे बचाव के लिए विश्व के एक बड़े हिस्से में टीकाकरण का अभाव और बीमारी हो जाने की दशा में महंगी दवाइयां और इलाज किसी दु:स्वप्न से कम नहीं है।

ऐसी परिस्थिति में वैक्सीन की उपलब्धता और बीमारी होने की दशा में सस्ती दवाइयां और इलाज मानवता के बचाव के लिए एक जरूरी शर्त है। वह यह कि कोरोना की दवाओं और इलाज के उपकरणों पर कंपनियों के पेटेंट और अन्य बौद्धिक संपदा अधिकार हैं। इसकी वैक्सीन के फार्मूलों और कच्चे माल पर भी कंपनियों का नियंत्रण है। सरकार की सजगता, विज्ञानियों के प्रयासों और कोरोना योद्धाओं की कड़ी मेहनत के कारण भारत इस महामारी से जूझने में शेष दुनिया से बेहतर रहा है। टीकाकरण में निरंतर बढ़ोतरी के साथ ही यह माना जा रहा है कि कोरोना से लड़ने के लिए हमारे भीतर पर्याप्त प्रतिरोधात्मक शक्ति आई है। आशा की जा रही है कि कोरोना के नए प्रकार से भी भारत अपने आप को बचाने में सफल हो सकेगा।

ट्रिप्स से छूट का मतलब : अक्टूबर में भारत और दक्षिण अफ्रीका की ओर से विश्व व्यापार संगठन में व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप्स) से छूट के लिए एक मांग रखी गई थी, ताकि विश्व में वैक्सीन और कोरोना की दवाएं समानता के आधार पर पूरी मानवता को उपलब्ध हो सकें। ट्रिप्स से छूट का मतलब होगा कि जिन कंपनियों के पास वैक्सीन, दवाओं और इलाज के उपकरणों के बौद्धिक संपदा अधिकार हैं, वे निरस्त हो जाएंगे और भारत समेत दुनिया के अनेक देश इन वैक्सीनों, दवाओं और उपकरणों का स्वयं उत्पादन कर सकेंगे।

भारत और दक्षिण अफ्रीका की इस मांग को 100 से भी ज्यादा देशों का समर्थन प्राप्त हुआ। हालांकि पहले अमेरिका इसका विरोध कर रहा था, लेकिन बाद में उसने अपना रवैया बदला और केवल वैक्सीन के लिए ट्रिप्स से छूट का समर्थन किया। उधर यूरोपीय समुदाय के देश लगातार इसका विरोध ही करते रहे। अब उनका रुख कुछ नरम हुआ है, लेकिन अभी भी वे इसके लिए अपनी सहमति देने से पूर्व कई शर्तें रख रहे हैं।

कोरोना के ओमिक्रोन वैरिएंट आने के बाद आज भारत और दक्षिण अफ्रीका की मांग के अनुसार ट्रिप्स से छूट का महत्व और बढ़ गया है। इस संबंध में अब तक यदि निर्णय हो गया होता तो विश्व के गरीब देशों में टीकाकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता था और कई ऐसे लोगों, जो दवाई के अभाव में दम तोड़ गए, उनकी जान बचाई जा सकती थी। हालांकि कई लोग यह भी तर्क दे रहे हैं कि भारत अपनी संपूर्ण जनसंख्या का टीकाकरण करने में सक्षम है और वह जल्द ही सभी को टीकाकरण के उद्देश्य को प्राप्त कर लेगा, इसलिए भारत के लिए ट्रिप्स से छूट का अब कोई खास महत्व नहीं है। कई लोग तो यह भी कहते हैं कि भारत ने अच्छी प्रभावशील वैक्सीन स्वयं ही काफी मात्रा में निर्मित कर ली है, वह भी इसका लाभ उठाकर दुनिया भर को उसे बेचने का कार्य कर सकता है, क्योंकि इस वैक्सीन के बौद्धिक संपदा अधिकार भारत के पास हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत और दक्षिण अफ्रीका की ट्रिप्स से छूट की मांग उनके अपने देशों के लिए ही नहीं थी, बल्कि पूरी मानवता के लिए थी। यदि यह तर्क मान भी लिया जाए कि भारत में कुछ विदेशी कंपनियों ने कोरोना के इलाज के लिए आवश्यक दवाओं के स्वैच्छिक लाइसेंस भारतीय कंपनियों को दिए हैं, लेकिन उनकी कीमत अभी भी काफी अधिक है, क्योंकि यदि ट्रिप्स के प्रविधानों से छूट मिले तो इन दवाओं को और अधिक सस्ता बनाया जा सकता है और गरीब जनता को उनके इलाज में सुविधा दी सकती है। यही नहीं, स्वैच्छिक लाइसेंस की शर्तों के अनुसार भारत की कंपनियां इन दवाओं को बनाकर भारत में ही बेच सकती हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि स्वैच्छिक लाइसेंस देने पर भी दुनिया की एक बड़ी आबादी को ये दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाएंगी, जो मानवता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी। वास्तव में ट्रिप्स छूट में देरी विश्व व्यापार संगठन के ट्रिप्स समझौते और जनस्वास्थ्य के संदर्भ में दोहा घोषणा की भावना के भी खिलाफ है। इसलिए स्वैच्छिक लाइसेंस अनिवार्य लाइसेंस का विकल्प नहीं है।

एक नया रंगभेद ले रहा जन्म : आज दुनिया में एक विशेष प्रकार का रंगभेद जन्म ले रहा है, टीकाकरण से युक्त और इससे वंचित के बीच का भेद। हाल ही में जो मंत्रीस्तरीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन जेनेवा, स्विट्जरलैंड में होने वाला था, उसमें शर्त रखी गई थी कि वही लोग इसमें भाग ले पाएंगे जिनका विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रमाणित वैक्सीन के साथ टीकाकरण हो चुका हो। शेष सदस्यों को हर 72 घंटे में टेस्ट कराना होगा। उल्लेखनीय है कि दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां अभी टीकाकरण शुरू ही नहीं हुआ है या आरंभिक अवस्था में है। यानी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अब ऐसे देशों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाएगा, जिनके प्रतिनिधि टीकाकरण युक्त नहीं होंगे। ऐसे में समय की मांग है कि अमेरिका, यूरोप सहित सभी अमीर देशों, जो ट्रिप्स से छूट की मांग का विरोध करते हुए मानवता को खतरे में डालने का कार्य कर रहे हैं, उनका हर मंच पर बहिष्कार हो।