उत्तर प्रदेश में चढ़े चुनावी तापमान का असर बिहार की राजनीति में भी दिखने लगा

 

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ तालमेल के प्रयास में रामचंद्र प्रसाद सिंह। फाइल

भाजपा के साथ जदयू की दाल गलेगी कि नहीं? बिहार हारने वाले राजद को यूपी में सपा की जीत से अपने घाव पर मरहम लगाने का मौका मिलेगा या नहीं? ये तो दस मार्च को ही स्पष्ट हो पाएगा। तब तक इनकी चाल पर ही निगाहें रखनी होंगी।

पटनार। उत्तर प्रदेश में चढ़े चुनावी तापमान का असर बिहार में भी दिखने लगा है। एक-दूसरे पर शाब्दिक कटाक्षों के बूते समय काट रहे क्षेत्रीय राजनीतिक दल उत्तर प्रदेश में संभावनाएं टटोलने लगे हैं। सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षाएं सत्ता में शामिल दलों ने पाल रखी हैं। सभी यूपी में दांव लगाने के फेर में हैं और उनकी आशाओं का केंद्र वह भाजपा है जिसकी विचारधारा को लेकर वही साथी आए दिन बयानबाजी करते नहीं थकते।

अभी एक किताब में सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब से करने को लेकर भाजपा पर जदयू (जनता दल यूनाइटेड) हमलावर है। उसके बाद भी वह यूपी में भाजपा के सहयोग से अपनी जमीन तलाशने की जुगत में लगा है। बिहार में एनडीए की सत्ता है, जिसमें भाजपा, जदयू, हम (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) व वीआइपी (विकासशील इंसान पार्टी) शामिल है। यूपी में भाजपा की ही सरकार है और बिहार से उसके सहयोगी वहां उसके साथ मिलकर चुनाव में उतरने का मन बनाए हैं। जदयू पिछले चुनाव में भी इस जुगत में था, लेकिन भाजपा की तरफ से कोई आश्वासन न मिलने के कारण वह पीछे हट गया था। इस बार राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए जदयू की उम्मीदें यूपी पर टिकी हैं।

भाजपा के साथ तालमेल के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री रामचंद्र प्रसाद सिंह को लगाया है और कम से कम तीन दर्जन सीटों की मांग रखी है इस घुड़क के साथ कि सीटें न मिलने की स्थिति में वह अकेले मैदान में उतरेगी। हालांकि भाजपा की तरफ से अभी कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला है। बातचीत में रोड़ा यूपी में भाजपा का सहयोगी अपना दल बना है, क्योंकि जदयू व अपना दल, दोनों की राजनीति कुर्मी वोटों पर टिकी है और दोनों का राजनीतिक मैदान पूर्वी उत्तर प्रदेश ही है। ऐसे में भाजपा के सामने दोनों को समायोजित करने की समस्या है, क्योंकि जदयू की सूची में जो सीटें शामिल हैं, उन पर अपना दल का भी दावा है। ऐसे में जदयू को लेने पर उसे अपना दल की नाराजगी ङोलनी पड़ेगी। जो वह नहीं चाहेगी।

वैसे ही इस समय यूपी में भाजपा के दिन फिलहाल ठीक नहीं चल रहे। पिछले चुनाव में जुड़े पिछड़े वर्ग के तमाम छोटे दल एक-एक कर उसका साथ छोड़ रहे हैं। पिछले पांच दिनों में तीन मंत्रियों व 11 विधायकों के साथ छोड़ प्रतिद्वंद्वी सपा (समाजवादी पार्टी) में चले जाने से उसे तगड़ा झटका लगा है। ऐसे में वह अपना दल को नाराज करने की स्थिति में नहीं है। जबकि जदयू भाजपा को लग रहे झटकों के बीच दबाव बनाने में जुटा है। उसे उम्मीद है कि बिहार की दोस्ती और अति पिछड़ों के बीच लोकप्रिय नीतीश कुमार का चेहरा भाजपा के लिए फायदेमंद ही होगा, इसलिए वह नीतीश कुमार को भी नाराज नहीं करना चाहेगी और बात बन ही जाएगी।

जदयू की तरह ही दूसरी सहयोगी वीआइपी भी निषाद वोटों के बूते मैदान में उतरने को तैयार खड़ी है। उत्तर प्रदेश में सहयोगी निषाद पार्टी के कारण भाजपा ने वीआइपी को जब कोई भाव नहीं दिया तो अब उसने अकेले ही 165 सीटों पर ताल ठोकने का मन बना लिया है। निषाद आरक्षण और फूलनदेवी की मूर्ति लेकर निकली वीआइपी को उम्मीद है कि वह अपना वोट बैंक बढ़ाने में सफल होगी। तीसरा सहयोगी हम अब वीआइपी के साथ है। संभवत: दोनों मिलकर चुनाव लड़ेंगे और भाजपा इसे अपने लिए फायदेमंद मान रही है। उसका मानना है कि संजय निषाद से नाराज निषाद वोट समाजवादी पार्टी में लामबंद होने की जगह अगर वीआइपी में जाएंगे तो उसे ही फायदा होगा।

इसके विपरीत महागठबंधन में अपेक्षाकृत शांति है। राजद अपनी रिश्तेदारी निभाने ही यूपी जाएगा, चुनाव लड़ने नहीं। राजद ने सपा को बिना शर्त समर्थन की घोषणा कर दी है। वामदलों में भाकपा-माले ही चुनाव लड़ने का मन बनाए है और वह समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ना चाहता है। उसकी मांग 18 सीटों की है। इसके अलावा पंजाब व उत्तराखंड में भी उसे जमीन की तलाश है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी यूपी की ओर देख रही है, लेकिन वह अकेले ही सभी सीटों पर मैदान में उतरने की घोषणा कर चुकी है। कुल मिलाकर बिहार के राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षाएं यूपी में चुनावी डुगडुगी बजने के बाद हिलोरे मारने लगी हैं। जाति आधारित राजनीति पर अपना अस्तित्व खड़ा करने वाले इन दलों को लगता है कि वे यूपी में भी मतदाताओं को लुभाने में कामयाब होंगे। अब इनमें से कौन सफल होगा और कौन नहीं? भाजपा के साथ जदयू की दाल गलेगी कि नहीं? बिहार हारने वाले राजद को यूपी में सपा की जीत से अपने घाव पर मरहम लगाने का मौका मिलेगा या नहीं? ये तो दस मार्च को ही स्पष्ट हो पाएगा। तब तक इनकी चाल पर ही निगाहें रखनी होंगी।