बस चाहने मात्र से चीजें जिंदगी में नहीं मिलती हैं, उस दिशा में वांछनीय कर्म करना जरूरी

 

जीवन में आगे बढ़ने की राह (प्रतीकात्मक फोटो)

मानसिक और आध्यात्मिक धरातल पर जो विषय आमतौर से हर बौद्धिक व्यक्ति को आजीवन प्रभावित करते हैं ऐसे कई बिंदुओं को भी संगृहीत किया गया है। उदाहरण के तौर पर प्रेम वासना तृप्ति रस अहंकार धर्म मुक्ति नियति और मृत्यु आदि।

 जब तक जीवन के कर्म जिंदगी में आनंद की अनुभूति से जुड़ नहीं जाते, तब तक मनुष्य की प्रत्येक सोच, उसका आचार-विचार सब व्यर्थ है। यह कहना बिल्कुल असंगत नहीं होगा कि जीवन में प्रत्येक प्राणी सुख पाने की आकांक्षा से सदा भरा रहता है। ऐसा भी हो सकता है कि किसी के अंदर अदम्य प्यास भी हो, जुनून भी हो, फिर भी वह उचित फल जीवन में प्राप्त नहीं कर पाता है। संभावना यह भी हो सकती है कि उसको प्राप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम किसी और मार्ग की ओर उन्मुख हो चला हो। कई अन्य कारणों से भी वांछित फल बहुत बार मार्ग से भटक जाता है। बस चाहने मात्र से चीजें जिंदगी में नहीं मिलती हैं, इसके लिए सही दिशा में आगे बढ़कर वांछनीय कर्म भी करना पड़ता है। डा. प्रवीण कुमार अंशुमान की 'शब्द-संवाद' पुस्तक जीवन में आगे बढ़ने की राह दिखाती प्रतीत होती है।

इस पुस्तक में जीवन के प्राय: सभी क्षेत्रों, जैसे- सफलता, असफलता, परिवार, हार-जीत, स्त्री का पुरुष प्रधान समाज के द्वंद्वों से गुजरना, अस्पृश्यता, शिक्षा जैसे तमाम विषयों पर सार्थक टिप्पणियां की गई हैं। मानसिक और आध्यात्मिक धरातल पर जो विषय आमतौर से हर बौद्धिक व्यक्ति को आजीवन प्रभावित करते हैं, ऐसे कई बिंदुओं को भी संगृहीत किया गया है। उदाहरण के तौर पर प्रेम, वासना, तृप्ति, रस, अहंकार, धर्म, मुक्ति, नियति और मृत्यु आदि। लेखक द्वारा अपने मित्रों के साथ एक वाट्सएप ग्रुप पर लगभग पांच महीने के दौरान प्रतिदिन सुबह-सुबह साझा किए गए विचारों से यह पुस्तक उपजी है। लेखक का मानना है कि जो कुछ भी इस जगत में सोचने से पैदा होता है, वह विचार है, लेकिन जो समझ से पैदा हो, वह अविचार होता है। पुस्तक में उद्धृत लगभग सभी अविचार न सिर्फ विचारों की जड़ता को चुनौती देते हैं, बल्कि रूढ़िनिर्मित दीवारों को भी ध्वस्त करते दिखते हैं। सरल शब्दों में लिखी गई यह पुस्तक पठनीय जाहिर होती है।

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पुस्तक : शब्द-संवाद

लेखक : डा. प्रवीण कुमार अंशुमान

प्रकाशक : आथर्स प्रेस

मूल्य : 230 रुपये