रामकथा को सीता की दृष्टि से देखने का प्रयास है 'सीतायण'

 

कहानी को कहने का तरीका ही इस पुस्तक को अनूठा बना देता है (प्रतीकात्मक फोटो)

चित्रा इससे पहले द्रौपदी की महाभारत में द्रौपदी की दृष्टि से महाभारत की कहानी लिख चुकी हैं। सीतायण उससे भी एक कदम आगे बढ़ने का अनुभव कराती है। अंग्रेजी में लिखी चित्रा बैनर्जी दिवाकरुणी की इस किताब का अनुवाद आशुतोष गर्ग ने किया है।

 रामायण की कथा मूलत: हमारे समाज की प्राण-गाथा है। जितनी भी भाषाओं में और जितने भी प्रकार से यह कथा कही गई है, जनमानस द्वारा स्वीकार की गई है। रामायण का हर पात्र हमें जीवन को जीने और समझने की नई दृष्टि देता है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि रामायण जितनी राम की कथा है, उतनी ही यह सीता की भी कहानी है। समय-समय पर कई लेखकों ने उस गाथा को सीता की दृष्टि से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। चित्रा बैनर्जी दिवाकरुणी की 'सीतायण' भी ऐसा ही प्रयास है। यह कहानी अपने पहले ही पन्ने से अपनी ओर खींचने लगती है। कहानी को कहने का तरीका ही इस पुस्तक को अनूठा बना देता है।

चित्रा इससे पहले 'द्रौपदी की महाभारत' में द्रौपदी की दृष्टि से महाभारत की कहानी लिख चुकी हैं। 'सीतायण' उससे भी एक कदम आगे बढ़ने का अनुभव कराती है। अंग्रेजी में लिखी चित्रा बैनर्जी दिवाकरुणी की इस किताब का अनुवाद आशुतोष गर्ग ने किया है। ऐसी पुस्तकों के संदर्भ में अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका होती है। अनुवाद करते समय लेखक की भावनाओं को समझते और संजोते हुए आगे बढ़ना आवश्यक है और आशुतोष गर्ग इसमें खरे उतरते हैं। पुस्तक को पढ़ते समय यह अनुभव नहीं होता है कि यह अनूदित है।

पुस्तक में सीता को मुख्य पात्र रखा गया है। रामायण के तमाम पात्रों को सीता की दृष्टि से समझने और समझाने का प्रयास करते हुए कहानी आगे बढ़ती है। कथा की शुरुआत महर्षि वाल्मीकि के आश्रम से होती है और फिर सीता के जन्म और स्वयंवर की ओर बढ़ जाती है। इस क्रम में महाराजा जनक और महारानी सुनयना के भी नए स्वरूप गढऩे का प्रयास किया गया है। वस्तुत: यह पुस्तक समाज में नारी का सशक्त चित्रण करते हुए बढ़ती है। लेखिका ने महारानी सुनयना को मात्र जनक की पत्नी और सीता की माता से कुछ कदम आगे बढ़कर राज्य कार्यों का संचालन करने में दक्ष एक महारानी के रूप में चित्रित किया है। महारानी सुनयना अपनी पुत्री सीता को केवल आदर्श पत्नी एवं गृहिणी ही नहीं, अपितु एक संपूर्ण नारी बनने के लिए प्रशिक्षित करती हैं।

लेखन की श्रेष्ठता यह भी है कि किसी स्त्री पात्र की श्रेष्ठता को गढ़ने के क्रम में उसके निकट के पुरुषों के प्रति कोई द्वेष नहीं दिखता है। यह पुस्तक एक की श्रेष्ठता के लिए दूसरे को न्यून करने का कोई प्रयास नहीं करती है। महारानी सुनयना के चरित्र को गढ़ते समय भी महाराज जनक के ओज को कम नहीं किया गया। यही दृष्टि अन्य सभी पात्रों के संदर्भ में भी अपनाई गई है। सीता स्वयंवर और शिवधनुष भंग के प्रकरण को भी नई ऊर्जा दी गई है। सीता और धनुष का संवाद भी कहानी को नवीनता देता प्रतीत होता है।

'सीतायण' की सीता 'रामायण' की सीता का ही विस्तार है। कथा को पढ़ते-पढ़ते बहुधा ऐसे प्रसंगों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें पढ़ते समय मन में यही प्रश्न उठता है कि ऐसा हमने पहले क्यों नहीं सोचा? इस पहलू की ओर हमारी दृष्टि पहले क्यों न गई? कहानी को गढ़ते समय सीता के जीवन में आए कई छोटे-छोटे पात्रों के माध्यम से भी सीता के संपूर्ण व्यक्तित्व को स्थापित किया गया है। शूर्पनखा का प्रसंग हो या रावण की लंका में राक्षस दासियों के बीच अकुलाती सीता का, हर जगह कुछ नया अनुभव होता है। अग्निपरीक्षा के प्रसंग को भी नए स्वरूप में कहने का प्रयास किया गया है। यह भी सत्य है कि श्रीराम और सीता मात्र किसी कथा के पात्र नहीं हैं। समाज ने उन्हें अपने गौरव की तरह पूजा है। ऐसे में सीता के नए स्वरूप को गढऩे का प्रयास कहीं कुछ प्रसंगों में आपत्ति का कारण भी बन सकता है। ऐसे विषय में यह स्वाभाविक ही है। सीता के प्राकट्य, स्वयंवर, वनवास और अग्निपरीक्षा से लेकर पृथ्वी के गर्भ में समाती सीता तक पूरी कथा को इसमें पिरोया गया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक पठनीय बन पड़ी है।

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पुस्तक का नाम : सीतायण

लेखिका : चित्रा बैनर्जी दिवाकरुणी

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस

मूल्य : 350 रुपये