सर्वाधिक रोजगार देने वाला जूट उद्योग आज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर

 

वर्ष 1855 में बंगाल के हुगली जिले के रिसड़ा में बंद हो चुकी वेलिंगटन जूट मिल। फाइल फोटो

चीनी के अलावा गेहूं और धान जैसे खाद्यान्नों की खरीद में जूट की बोरियों के इस्तेमाल को अनिवार्य किया गया है। ऐसे में जो भी समस्याएं हैं उनका निदान तत्काल किया जाना चाहिए ताकि जूट उद्योग के दिन बहुर जाएं।

कोलकाता, बंगाल में हाल में तीन जूट मिल बंद हुए हैं। केवल पिछले एक वर्ष पर नजर डालें तो कच्चे माल की कमी का हवाला देकर 13 जूट मिलें बंद हो चुकी हैं। इस कारण लगभग 45 हजार श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं। इस समय बंगाल की 60 जूट मिलों में से 17 बंद हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में जूट उद्योग का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। देश के विभाजन से पूर्व जूट उद्योग में भारत और विशेष रूप से बंगाल का एकाधिकार था। यहां से कच्चे जूट के साथ-साथ तैयार टाट-बोरियां विभिन्न देशों में भेजी जाती थीं, जोकि विदेशी मुद्रा अर्जन का प्रमुख स्रोत था। यही कारण था कि भारत में जूट को ‘गोल्डेन फाइबर’ यानी ‘सोने का रेशा’ भी कहा जाता है। पर जूट को सोने का रेशा बनाने और सर्वाधिक रोजगार देने वाला यह उद्योग आज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है।

केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अगर तत्काल ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह उद्योग पूरी तरह से दम तोड़ देगा। हालांकि नए वर्ष में उम्मीद की जा रही है कि इस उद्योग के दिन एक बार फिर बहुरेंगे। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान युद्ध स्थलों पर खाद्य तथा आयुध सामग्रियां पहुंचाने के लिए जूट निर्मित उत्पादों की मांग में हुई अप्रत्याशित वृद्धि से बंगाल में इस उद्योग की तेज प्रगति हुई। भारत में पहली जूट मिल 1855 में स्काटलैंड के एक व्यापारी जार्ज आकलैंड ने हुगली जिले में श्रीरामपुर के निकट रिसड़ा में हुगली (गंगा) नदी के किनारे स्थापित की थी। उसके बाद उस इलाके में हुगली के दोनों किनारों पर कई जूट मिलें स्थापित हुईं।

सबसे पहले देश के विभाजन से यह उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुआ। उस समय जूट की 112 मिलों में से 102 भारत के हिस्से में आईं, लेकिन कच्चे जूट का अभाव हो गया। साथ ही वर्ष 1949 में भारतीय रुपये के अवमूल्यन के कारण यहां की मिलों के लिए पाकिस्तान का कच्चा जूट बहुत महंगा हो गया। पाकिस्तान ने बदलती हुई परिस्थितियों का भरपूर लाभ उठाया। हालांकि शीघ्र ही इस समस्या का निदान हो गया। बंगाल, असम और बिहार के किसानों ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए जूट के उत्पादन में अथक परिश्रम किया और वे अपने लक्ष्य में सफल रहे, लेकिन 1990 के बाद धीरे-धीरे जूट उद्योग की हालत बिगड़ती गई। वैसे तो इसके कई कारक हैं, लेकिन सबसे बड़े कारण वामपंथियों का बंद, हड़ताल और यूनियनबाजी रहे। यही वजह रही कि 102 से इन मिलों की संख्या घटकर 60 रह गई है और अब लगभग प्रत्येक सप्ताह एक जूट मिल बंद हो रही है।

वर्तमान में देश के सबसे बड़े जूट उत्पादक बंगाल की जूट मिलों को पर्याप्त रूप से कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है, जिसकी वजह से लगातार मिलें बंद हो रही हैं। मिल के प्रबंधकों का कहना है कि सरकार द्वारा तय कीमत पर पटसन (कच्चा जूट) नहीं मिल पा रहा है। तय कीमत पर कच्चे जूट की खरीद में नाकाम रहने के बाद मिलें उत्पादन बंद करने को मजबूर हैं। कच्चे जूट की खरीदारी पर्याप्त मात्रा में नहीं होने के कारण जूट के बोरों के उत्पादन पर असर पड़ रहा है। इससे अनाज भंडारण के लिए इस्तेमाल होने वाले बोरों की कमी हो सकती है। वहीं जूट मिल मालिकों का कहना है कि उन्होंने घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुरूप कच्चे जूट का भाव बढ़ाकर 7,200 रुपये प्रति क्विंटल करने का सुझाव दिया था, जिसे सरकार ने नहीं माना।

सही भाव नहीं मिलने से किसान पटसन की खेती से बच रहे हैं। इससे जूट मिलों को पर्याप्त कच्चा माल नहीं मिल पा रहा है। जूट मालिकों के संगठन इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन (आइजेएमए) का कहना है कि जूट आयुक्त कार्यालय से कच्चे जूट का अधिकतम मूल्य प्रति ¨क्वटल 6,500 रुपये तय किया गया है, लेकिन गैर-कानूनी तरीके से कच्चे जूट की जमाखोरी होने से बाजार से बहुत ज्यादा मूल्य पर कच्चे जूट की खरीद करनी पड़ रही है। जुट आयुक्त कार्यालय के मुताबिक जमाखोरों ने किसानों से भारी मात्र में कच्चे जूट की खरीद करके उसे जमा करके रखा है। कुछ भ्रष्ट जूट मालिक भी उनसे मिले हुए हैं। जमाखोर कृत्रिम कमी पैदा करके कच्चे जूट की कीमत बढ़ाना चाहते हैं।

आइजेएमए के चेयरमैन राघवेंद्र गुप्ता का कहना है कि 7,200-7,300 रुपये प्रति क्विंटल की दर से कच्चा जूट खरीदना पड़ रहा है। जमकर कालाबाजारी हो रही है। हालांकि केंद्र और बंगाल सरकार की ओर से जूट उद्योग में सुधार के लिए पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं। चीनी के अलावा गेहूं और धान जैसे खाद्यान्नों की खरीद में जूट की बोरियों के इस्तेमाल को अनिवार्य किया गया है। ऐसे में जो भी समस्याएं हैं, उनका निदान तत्काल किया जाना चाहिए, ताकि जूट उद्योग के दिन बहुर जाएं।