जीडीपी वृद्धि के अनुमान और आर्थिक चुनौतियां, कोरोना से निपटने के प्रयास में सरकारी कर्ज में वृद्धि

 

अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन फिलहाल कमजोर स्थिति में है। प्रतीकात्मक

महामारी जनित कारणों से जीडीपी ग्रोथ रेट में 7.3 प्रतिशत की गिरावट आई थी। सांख्यिकी कार्यालय का यह अनुमान आरबीआइ के 2021-22 के लिए जताए गए 9.5 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान से कुछ कम है। ऐसे में इसके विविध आयामों को समझना होगा।

देश भर में कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर जोर पकड़ रही है। हालांकि अब तक आर्थिक गतिविधियों पर इसका बहुत अधिक असर नहीं पड़ा है, परंतु जिस तरह से संक्रमण के आंकड़े एक बार फिर से बढ़ते जा रहे हैं, उससे यह आशंका जरूर है कि भविष्य में आर्थिक गतिविधियां कुछ हद तक प्रभावित हो सकती हैं। वैसे कोविड रोधी टीकाकरण की बढ़ती गति में इस तरह की तमाम आशंकाओं को निराधार बनाने की क्षमता है।

इन आशंकाओं के बीच राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से वित्त वर्ष 2021-22 में देश की आर्थिक वृद्धि दर 9.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है। हालांकि सरकार की तरफ से स्पष्ट कर दिया गया है कि अभी प्रथम अग्रिम अनुमान जारी हुआ है। 31 जनवरी को अगला अनुमान जारी किया जाएगा। व्यापार, परिवहन, होटल आदि में प्रथम अनुमान के अनुसार बेहतर सुधार हुआ है, लेकिन अंतिम निजी व्यय अभी भी वित्त वर्ष 2020 की समान अवधि के स्तर से नीचे है। इसी तरह विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र में दो अंकों की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। हालांकि देश की अर्थव्यवस्था में आधे से अधिक की हिस्सेदारी वाले सेवा क्षेत्र का प्रदर्शन अभी भी कमजोर बना हुआ है।

प्रति व्यक्ति आय : राष्ट्रीय आमदनी को देश की आबादी में बराबर विभाजित किया जाए तो भारतीयों की आमदनी वित्त वर्ष 2021-22 में महामारी के पूर्व अवधि (2019-20) की तुलना में करीब 12 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2020-21 की तुलना में 17 प्रतिशत बढ़ सकती है। सरकार की ओर से जारी राष्ट्रीय आय में अग्रिम अनुमान के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 में प्रति व्यक्ति आमदनी 1.50 लाख रुपये होने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2020-21 में 1.20 लाख रुपये थी।

घरेलू खपत : घरेलू खपत और व्यय अभी भी महामारी के पहले के स्तर पर नहीं पहुंचा है। वास्तविक सकल नियत पूंजी सृजन वित्त वर्ष 2021-22 में 48.5 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो 2020-21 के अंतिम अनुमान में 42.2 लाख करोड़ रुपये था। लेकिन निजी अंतिम खपत व्यय, जिससे घरेलू व्यय व खपत का अनुमान लगता है, वह 2021-22 में 80.8 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो 2020-21 में 75.6 लाख करोड़ रुपये और 2019-20 में 83.2 लाख करोड़ रुपये था। घरेलू खपत अभी कमजोर है जिसे और मजबूत बनाना होगा।

3.9 प्रतिशत रहेगी कृषि क्षेत्र की वृद्धि : वित्त वर्ष 2021-22 में कृषि एवं संबंधित गतिविधियों की वृद्धि दर 3.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है जो इससे पिछले वित्त वर्ष में रहे 3.6 प्रतिशत से ज्यादा है। जीडीपी के पहले अग्रिम अनुमान में कृषि की स्थिति महामारी से प्रभावित वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान 3.6 प्रतिशत की वृद्धि दर से मजबूत दिख रही है। राष्ट्रीय आमदनी का पहला अग्रिम अनुमान फसल उत्पादन के पहले अग्रिम अनुमान पर आधारित है, जो खरीफ फसलों के उत्पादन को दिखाता है।

तुलनात्मक दृष्टि से कृषि क्षेत्र के आंकड़े सराहनीय नजर आते हैं, परंतु जब किसानों की आय के दोगुनी होने की दृष्टि से इसे देखा जाए तो यह वृद्धि कम है। वर्ष 2016-17 में जब 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात बजट में रखी गई, तब नीति आयोग ने अशोक दलवाई की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। इस समिति ने किसानों की आय दोगुनी होने के लिए कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 12 प्रतिशत करना आवश्यक बताया था। इस दृष्टि से कृषि क्षेत्र बहुत पीछे है और उसपर काफी ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

रोजगार सृजन और महंगाई : सीएमआइई यानी सेंटर फार मानिटरिंग इंडिया इकोनामी के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2021 में बेरोजगारी दर बढ़कर 7.91 प्रतिशत हो गई थी। साथ ही शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 9.3 प्रतिशत तक पहुंच गई। अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर इन तीन महीनों में बेरोजगारी दर सात प्रतिशत से अधिक रही है। देश में इस समय खुदरा महंगाई दर पांच प्रतिशत तक पहुंच गई है। अगर थोक महंगाई दर की बात करें, तो यह 14 प्रतिशत से ऊपर है। थोक महंगाई दर प्राय: खुदरा महंगाई दर से कम होती है, परंतु जब वह दहाई आंकड़ा को पार करने लगे तो खतरनाक महंगाई की ओर संकेत जाता है। उच्च बेरोजगारी और उच्च महंगाई दर की परिस्थितियां भारत के लिए एक नई चुनौती पेश कर रही हैं। महंगाई में वृद्धि होने का अंदेशा है, वहीं इस बात का भी कोई संकेत नहीं है कि बेरोजगारी दर में बहुत कमी आने वाली है।

रुपया कमजोर : आरबीआइ द्वारा नीतिगत दरें नहीं बढ़ाने के बावजूद उसमें अनेक कारणों से बढ़ोतरी हो रही है। बैंकों की उधारी दर तो कमोबेश स्थिर लग रही है, मगर बाजार दरें बढ़ रही हैं। आधार दर और एचसीएलआर (बैंकों की उधारी दरों को परिलक्षित करने वाली दरें) सभी लगभग स्थिर हैं या हाल के दिनों में बहुत कम हो रही हैं। मगर विभिन्न परिपक्वता अवधि वाले ‘एएए’ रेटिंग वाले कारपोरेट बांड पर प्रतिफल बढ़ रहे हैं। इस बात की गुंजाइश कम है कि बैंक अब लंबे समय तक मौजूदा ब्याज दर बरकरार रख पाएंगे। दिसंबर मध्य में एसबीआइ ने पिछले दो वर्षो में पहली बार आधार दरें बढ़ा दी थी। दूसरी बात यह है कि 2021 में अधिकांश समय डालर की तुलना में रुपये में गिरावट देखी गई। दिसंबर 2021 तक एक डालर की तुलना में रुपया 75.5 तक पहुंच गया। घरेलू उपभोक्ताओं के स्तर पर मांग में कमी और क्षमता का इस्तेमाल कम रहने से भारत में निवेश पर प्रतिकूल असर हुआ है। अब ब्याज दरों में तेजी और रुपये के मूल्य में ह्रास हालात को और कठिन बना सकते हैं। बढ़ती महंगाई, ब्याज दरों में तेजी और रुपये में कमजोरी के साथ उपभोक्ताओं की तरफ से मांग में कमी बड़ी कंपनियों को निवेश के लिए आकर्षित करने की राह में सबसे बड़ी बाधा है।

नई परियोजनाओं में कमी : सितंबर तिमाही की तुलना में दिसंबर तिमाही में नई परियोजनाओं में 6.3 प्रतिशत की कमी आई है। सीएमआइई के अनुसार अभी समाप्त तिमाही के दौरान नई परियोजनाओं का मूल्य महज 2.1 लाख करोड़ रुपये रहा है, जो सितंबर तिमाही में 2.2 लाख करोड़ रुपये की तुलना में कम है। सीमेंट का उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम हो गया है। वहीं सूचकांक के अन्य उद्योगों जैसे कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पादों, स्टील और बिजली के उत्पादन में कमी आई, केवल उर्वरक के उत्पादन में मामूली वृद्धि हुई। रिजर्व बैंक के अनुसार विनिर्माण क्षेत्र का क्षमता उपयोग 2021-22 की पहली तिमाही में घटकर 60 प्रतिशत पर आ गया, जो इसमें पहली तिमाही में 68.4 प्रतिशत था।

आर्थिक वृद्धि दर के प्रथम और द्वितीय अनुमान का मुख्य उद्देश्य सरकार को बजट निर्माण से पहले ग्रोथ रेट की भरोसेमंद स्थितियों से अवगत कराना है। प्रथम अग्रिम अनुमान में 9.2 प्रतिशत वृद्धि दर प्रथम दृष्टया संतोषजनक प्रतीत होते हैं, परंतु जब अर्थव्यवस्था के समक्ष उपस्थित विभिन्न चुनौतियों की दृष्टि से इसे देखा जाता है, तब वित्त मंत्री को बजट निर्माण के लिए यह रूपरेखा प्रदान करती है। महामारी से निपटने की कोशिश में घाटे के साथ ही सरकारी कर्ज में तेजी से वृद्धि हुई है। राजस्व को हो रहे नुकसान के बीच खर्च करना भी अनिवार्य था और यह अपेक्षाकृत कम ही रहा। इसके बावजूद केंद्र और राज्य का ‘सरकारी कर्ज’ जीडीपी के 90 प्रतिशत के आसपास है।

महामारी के पूर्व यह 70 प्रतिशत पर था, जबकि इसका वांछित स्तर 55 से 60 प्रतिशत के बीच ही है। इस कारण से ब्याज का बोझ बढ़ रहा है। महामारी के पहले यह सरकारी प्राप्तियों के 34.8 प्रतिशत के स्तर पर था। यह आंकड़ा लगभग एक दशक से नहीं बदला था, क्योंकि 2011-12 में भी यह 34.6 प्रतिशत ही था। लेकिन चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमान के अनुसार ब्याज की हिस्सेदारी 40.9 प्रतिशत हो गई। यदि अनुमान 34.8 प्रतिशत पर बना रहता तो सरकार के पास अपने कार्यक्रमों में खर्च करने के लिए 1.2 लाख करोड़ रुपये बचते। यदि ब्याज दर बढ़ती है, तो बिल का आकार और बढ़ेगा। भविष्य के लिए यह बड़ा बोझ होगा और अन्य प्रकार के व्यय को सीमित करेगा। इसके अलावा बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में जीडीपी के हिस्से के रूप में कर राजस्व की हिस्सेदारी अधिक होती है, जिससे स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण योजनाओं के साथ बुनियादी ढांचे तथा रक्षा क्षेत्र का वित्त पोषण किया जा सके। भारत के मामले में केंद्रीय सकल कर राजस्व संग्रह लगभग अपरिवर्तित है। एक दशक पहले यह 10.2 प्रतिशत था और इस वर्ष इसके 9.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

राजस्व में कमी का एक कारण कारपोरेट कर भी है। वर्तमान मूल्य पर देखें, तो जीडीपी गत एक दशक में 160 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि कारपोरेट टैक्स से आने वाला राजस्व केवल 70 प्रतिशत। तुलनात्मक रूप से देखें तो व्यक्तिगत आयकर से हासिल होने वाला राजस्व एक दशक में 230 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। इस तरह कारपोरेट टैक्स के मामले में जबरदस्त असंतुलन दिखता है। उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि सरकारी राजस्व में समुचित वृद्धि अभी नजर नहीं आ रही है। इस कारण विशिष्ट कार्यक्रमों की व्यय राशि में बदलाव एक तय दायरे में ही हुआ है।

अगर राजस्व का बड़ा हिस्सा कर्ज के ब्याज भुगतान में चला जाएगा तो बजट में सामाजिक आर्थिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राजकोषीय उपायों की गुंजाइश और सीमित रहेगी। ऐसे में इस स्थिति को दूर करने के लिए और राजस्व को बढ़ाने के लिए केवल दो तरीके हैं, पहला तेज आर्थिक वृद्धि। मालूम हो कि सदी के पहले दशक में ब्याज के भारी बोझ से तेज आर्थिक वृद्धि से ही निपटा गया था। आर्थिक वृद्धि के लिए वित्त मंत्री को बजट में मांग में वृद्धि और निर्यात में तेजी लाने के लिए अन्य मजबूत प्रयास करने चाहिए। दूसरा तरीका है, कर संबंधी अनेक प्रकार की कमियों को दूर करना और यह सवाल करना कि आखिर पूंजीगत लाभ पर लगने वाला कर अर्जित आय पर लगने वाले कर से कम क्यों है? इन त्रुटियों को जल्द से जल्द दूर करने की आवश्यकता है।