मानव सभ्यता को नई दिशा दे सकता है कृत्रिम सूरज

 

परमाणु से बिजली अन्य विकल्पों के मुकाबले ज्यादा स्वच्छ और टिकाऊ मानी जाती रही है।

हाल में वहां इससे संबंधित एक परियोजना में कृत्रिम सूर्य जैसी व्यवस्था बनाकर असली सूरज से भी ज्यादा तापमान पैदा किया गया। चीन ने यह प्रयोग अपने हेफेई प्रांत में स्थित एक्सपेरिमेंट्स फार एन एडवांस्ड सुपरकंडक्टिंग टोकामाक (ईस्ट) नामक संयंत्र में किया है।

सदियों पहले जब इंसान का परिचय आग से नहीं हुआ था, तब ऊर्जा या गर्मी का अकेला स्नेत वह प्राकृतिक सूर्य था, जिसकी परिक्रमा धरती समेत सौरमंडल के अन्य ग्रह करोड़ों वर्षो से कर रहे हैं। करीब पांच हजार साल पहले आग पैदा करने की जानकारी के साथ मानव सभ्यता ऊर्जा के विभिन्न स्नेतों से परिचित हुई। इसमें सबसे बड़ी उपलब्धि पानी, कोयले और तेल से बिजली बनाने के रूप में मिली। यह बिजली ऐसी थी, जिस पर इंसान नियंत्रण कर सकता था। औद्योगिक विकास के दो सौ साल की इस यात्रा में यह समझ भी बनी कि बिजली के ये सारे स्नेत प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिग जैसी उन समस्याओं को पैदा करते हैं जिनसे आगे चलकर जीवन और धरती के विनाश की आशंका जताई जा रही है।

बिजली के मामले में परमाणु ऊर्जा एक राहतभरा विकल्प नजर आ रहा है, लेकिन इसमें भी परमाणु कचरे के रूप में निकलने वाले रेडियोएक्टिव पदार्थो के सैकड़ों वर्षो तक विघटित नहीं होने की समस्या हमारी सभ्यता के लिए चिंता की वजह बनी हुई है। फिर भी कोई संदेह नहीं कि परमाणु बिजली पैदा करने के अन्य विकल्पों के मुकाबले ज्यादा स्वच्छ और टिकाऊ मानी जाती रही है। इसमें भी एक नए तरीके ने दुनिया को ज्यादा बड़ी उम्मीद दिखाई है, जिसके तहत परमाणुओं के पारंपरिक विखंडन के बजाय उनके संलयन से बिजली बनाने की कोशिश दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हो रही है। संलयन की प्रक्रिया में कोई कचरा नहीं निकलता। इससे विखंडन के मुकाबले कई गुना ज्यादा ऊर्जा निकलती है। इस संबंध में एक उल्लेखनीय प्रयास हमारे पड़ोसी देश चीन में किया गया है। हाल में वहां इससे संबंधित एक परियोजना में कृत्रिम सूर्य जैसी व्यवस्था बनाकर असली सूरज से भी ज्यादा तापमान पैदा किया गया।

साकार होने वाला है परमाणु संलयन का सपना : चीन ने यह प्रयोग अपने हेफेई प्रांत में स्थित एक्सपेरिमेंट्स फार एन एडवांस्ड सुपरकंडक्टिंग टोकामाक (ईस्ट) नामक संयंत्र में किया है। यह एक प्रकार का प्रायोगिक परमाणु रिएक्टर है, जिसमें नाभिकीय संलयन (फ्यूजन) प्रक्रिया से ऊंचा तापमान पैदा किया जा सकता है। इसे कृत्रिम सूर्य कहने से अभिप्राय यह है कि इसमें परमाणुओं के संलयन से उसी प्रकार ऊर्जा उत्पन्न की जा रही है, जैसे सूरज पर परमाणुओं के संलयन से ऊर्जा पैदा होती है। दिसंबर 2021 के अंतिम सप्ताह में किए गए इस प्रयोग में इस रिएक्टर में 1056 सेकेंड तक करीब सात करोड़ डिग्री प्लाज्मा तापमान पैदा किया गया। इस प्रयोग की सफलता के आधार पर कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता संलयन ऊर्जा (फ्यूजन एनर्जी) को हकीकत में बदलने के करीब है। इससे पूरी धरती को सैकड़ों वर्षो तक जगमग रखने का रास्ता खुलने लगा है। प्रयोग के दौरान ऊंचा तापमान हासिल करना और उसे लंबे समय तक टिकाए रखना-दोनों ही बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य हैं। इस सिलसिले में उल्लेखनीय है कि बीते वर्ष जून में चीन ने इसी संयंत्र में 20 सेकेंड तक 16 करोड़ डिग्री प्लाज्मा तापमान और उससे पहले 101.2 सेकेंड तक 12 करोड़ डिग्री सेल्सियस प्लाज्मा तापमान हासिल कर चुका है, लेकिन हालिया उपलब्धि बेहद ऊंचे तापमान को साढ़े सत्रह मिनट तक टिकाए रखने की है, जिसे एक कीर्तिमान के तौर पर दर्ज किया गया है। टोकामाक रिएक्टर में ईंधन के तौर पर ड्यूटेरियम और ट्राइटियम से मिलाकर तैयार किया गया प्लाज्मा का इस्तेमाल होता है। प्लाज्मा एक आवेशित पदार्थ के रूप में होते हुए भी अपने आप में एक प्रकार का परमाणु कचरा है। आवेशित पदार्थ होने के कारण इसे इलेक्टिक चुंबकों की मदद से तेजी से घुमाया जा सकता है, लेकिन समस्या यह है कि इस कचरे को करीब डेढ़ करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान पर ही हासिल किया जा सकता है। यानी बिजली बनाने के लिए पहले तो प्लाज्मा पैदा करना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।

ताकतवर चुंबकों का कमाल : प्लाज्मा की मदद से सूर्य जैसी गर्मी या ऊर्जा पाने का सवाल है तो यह काम टोकामाक संयंत्र के भीतर चारों ओर लगे सुपरकंडक्टिंग इलेक्ट्रो-मैग्नेट (ताकतवर चुंबक) की मदद से होता है। ये चुंबक तापमान बढ़ाए जाने पर ऊर्जा के सुपरकंडक्टर बन जाते हैं। ये चुंबक प्लाज्मा को गर्म करने और फिर इसे तरल नाइट्रोजन की मदद से नियंत्रित करने का दोहरा काम करते हैं। ये चुंबक प्लाज्मा तो रिएक्टर की स्थिर दीवार से दूर रखते हैं। इस रिएक्टर में असली चुनौती संलयन की प्रक्रिया को आरंभ करना और फिर उसे लंबे समय तक कायम रखते हुए नियंत्रित करना है। ध्यान रहे कि संलयन की प्रक्रिया को आरंभ करने के लिए बहुत ऊंचे तापमान की जरूरत होती है। अभी तक के प्रयोगों में ये सारी प्रक्रियाएं अलग-अलग चरणों में की गई हैं। जिस दिन विज्ञानी तीनों प्रक्रियाओं को एक ही समय में साथ रखते हुए सफलतापूर्वक संपन्न करा लेंगे, तब परमाणु संलयन से बिजली बनाने का काम आरंभ हो जाएगा। चीनी विज्ञानियों का कहना है कि अगले पांच साल में वे टोकामाक की मदद से फ्यूजन रिएक्टर बना देंगे। हालांकि उसके पूर्ण रूप लेने में दस साल और लगेंगे। उसके बाद वर्ष 2040 तक वे इसकी मदद से मनचाही मात्र में बिजली बनाने लगेंगे। चीन ने निश्चित ही फ्यूजन रिएक्टर के मामले में बढ़त हासिल कर ली है, लेकिन यह कारनामा करने वाला वही अकेला मुल्क नहीं है।

मुकाबले को तैयार होता आइटीईआर : वैसे तो परमाणु संलयन तकनीक से बिजली बनाने की योजनाओं की शुरुआत अमेरिका से मानी जाती है, लेकिन टोकामाक रिएक्टर की परिकल्पना को 1951 में सोवियत विज्ञानियों आंद्रेई सखारोव और इगोर टैम ने मिलकर तैयार किया था। रूसी और अमेरिकी विज्ञानियों का सपना एक ऐसे सुरक्षित संलयन तकनीक से चलने वाले परमाणु रिएक्टर को बनाना था, जिनसे कोई परमाणु कचरा न निकले। दुनिया को लगा कि शायद यह काम किसी अकेले देश के वश का नहीं है। लिहाजा 2006 में मुख्यत: छह देशों-रूस, जापान, अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया, यूरोपीय संघ और भारत ने मिलकर इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (आइटीईआर) नामक दुनिया की सबसे बड़ी फ्यूजन रिसर्च परियोजना पर काम शुरू किया। वर्ष 2013 में फ्रांस में आइटीईआर का निर्माण कार्य शुरू हुआ, जिसकी लागत में नौ से 10 प्रतिशत खर्च (करीब 17,500 करोड़ रुपये) का योगदान भारत अपनी ओर से कर रहा है। भारतीय विज्ञानी और इंजीनियर इस परियोजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण उपकरणों का निर्माण भी कर रहे हैं। अनुमान है कि आइटीईआर रिएक्टर 2025 में बनकर तैयार हो जाएगा और वर्ष 2040 से इसके जरिये बिजली मिलने लगेगी। हालांकि चीन की इस दिशा में प्रगति देखने वाले कह सकते हैं कि अगर चीन यह करिश्मा अपने बूते कर सकता है तो भारत ने ऐसा क्यों नहीं किया, जबकि सीवी रमन, मेघनाद साहा, सत्येंद्रनाथ बोस, होमी जहांगीर भाभा जैसी प्रतिभाओं वाला हमारा देश परमाणु ऊर्जा के मामले में इतना पिछड़ा कभी नहीं रहा है।

बहरहाल जहां तक परमाणु से बिजली पैदा करने का मामला है तो परमाणु रिएक्टर से हम सभी भलीभांति परिचित हैं। हमारे देश में तारापुर, रावतभाटा, कुडनकुलम, कैगा, काकरापार, कलपक्कम और नरोरा परमाणु बिजलीघरों की बिजली हमारी ऊर्जा जरूरतों में महती योगदान दे रही है। पर इसके निर्माण का आधार एटम बम के विस्फोट की तकनीक है जिससे अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी अंजाम दिए थे और जिससे निकलने वाले रेडियोएक्टिव कचरे का सुरक्षित निष्पादन दुनिया के लिए सिरदर्द बना हुआ है। नाभिकीय विखंडन के मुकाबले नाभिकीय संलयन को इसीलिए नई उम्मीद से देखा जा रहा है, क्योंकि एक बार इसे नियंत्रित करते हुए बिजली पैदा करने का रास्ता खुल गया तो कई समस्याओं का एक झटके में समाधान हो सकेगा। इससे न सिर्फ बेहद सस्ती बिजली मिल सकेगी, बल्कि धरती पर ही कृत्रिम सूरज जैसा यह प्रबंध एटमी कचरे और उसके जानलेवा प्रदूषण के झंझट को खत्म कर देगा। ध्यान रहे कि परमाणु संलयन की प्रक्रिया में दो या दो से अधिक परमाणु के नाभिक आपस में टकराकर एक भारी नाभिक का निर्माण करते हैं। परमाणु संलयन (फ्यूजन) की प्रक्रिया उस परमाणु विखंडन (फिशन) के विपरीत है जिसमें भारी तत्व टूट जाते हैं और हल्के हो जाते हैं। वैसे तो दोनों ही प्रक्रियाओं में भारी मात्र में ऊर्जा पैदा होती है, लेकिन विखंडन की तुलना में संलयन से असीमित ऊर्जा मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। जाहिर है एक बार धरती पर यह तरीका कामयाब हो गया तो मानव सभ्यता अपने लिए जमीन पर ऐसा सूरज उतार लेगी, जिससे मनचाही मात्र में बिजली पाई जा सकती है।

चीन में जिस टोकामाक रिएक्टर में परमाणु संलयन के प्रयोग चल रहे हैं, वैसे शुरुआती प्रयोग भारत में भी पिछली सदी के अंतिम दशक में किए जा चुके हैं। दावा किया जाता है कि भारत ने वर्ष 1989 में आदित्य परियोजना के अंतर्गत डेढ़ करोड़ डिग्री सेल्सियस का प्लाज्मा तापमान 0.4 सेकेंड तक बनाए रखने का प्रयोग किया था। यह भी बताया जाता है कि वर्ष 2016 में इस परियोजना के नवीनीकरण की बात उठी थी, लेकिन उस दौरान लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में सरकार ने बताया था कि अब भारत फ्रांस में जारी इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (आइटीईआर) परियोजना में भागीदारी कर रहा है। भारत सरकार इसके लिए करोड़ों रुपये का बजट निर्धारित कर चुकी है।

यहां आश्चर्य की बात यह है कि जब भारतीय विज्ञानी परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं। इसके साथ ही विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों-जैसे कि अंतरिक्ष, कंप्यूटर और मिसाइल के मामले में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की ओर अग्रसर हैं तो फिर फ्रांस में चल रही परियोजना आइटीईआर में भागीदारी करने के स्थान पर खुद इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास क्यों नहीं किया गया? जब चीन अपने बल पर आइटीईआर से आगे निकलने की योग्यता साबित कर सकता है तो भारत इस मामले में उससे भी बेहतर साबित हो सकता था।