सक्रिय राजनीति से तौबा कर समाजसेवा की राह पर गुरुजी की पुत्रवधु डाॅ.स्टेफी...

 



अब सक्रिय राजनीति को बाय-बाय करने का मन बना चुकीं हैं। (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

दुमका के जामा विधानसभा सीट से वर्ष 2019 में आजसू की टिकट पर झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन की पुत्रवधु सीता सोरेन के खिलाफ चुनावी जंग में ताल ठोंकने वाली डा.स्टेफी टेरेसा मुर्मू अब सक्रिय राजनीति को बाय-बाय करने का मन बना चुकीं हैं।

जामा, (दुमका): दुमका के जामा विधानसभा सीट से वर्ष 2019 में आजसू की टिकट पर झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन की पुत्रवधु सीता सोरेन के खिलाफ चुनावी जंग में ताल ठोंकने वाली डा.स्टेफी टेरेसा मुर्मू अब सक्रिय राजनीति को बाय-बाय करने का मन बना चुकीं हैं। हालांकि उनका कहना है कि सामाजिक कार्यों में उनकी दिलचस्पी बरकरार रहेगी और वह इसके जरिए ही जामा की जनता के बीच अपनी पहचान कायम रखेंगी। अभी सोहराय में जामा आई डा.स्टेफी तेरेसा मुर्मू ने जागरण के संग एक खास मुलाकात में कहा कि दुमका और जामा से उनका पारिवारिक नाता है।

उनका मायका दुमका के सोनुवाडंगाल में है और सुसराल जामा के नाचनगड़िया पंचायत के अहलाद डुमरिया है। कहा कि वह सोहराय में वह प्रत्येक वर्ष रांची से अहलाद डुमरिया आती हैं। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यही कि आदिवासी धर्म, कला व संस्कृति की पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखा जाए। एक सवाल पर कहा कि निसंदेह समय के साथ आदिवासी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने की चुनौती है। कहा कि यही वजह है कि वह सोहराय मनाने अपने गांव आती हैं। सोहराय आदिवासियों का न सिर्फ सबसे बड़ा त्योहार है बल्कि इसमें सामाजिक, सांस्कृतिक व सामुदायिक सौहार्द का पुट है। सोहराय से पहले हरेक आदिवासी अपने घर की साफ-सफाई कर इसे सुव्यवस्थित बनाते हैं। घर के दीवारों पर आदिवासी महिलाएं भित्ति चित्र उकेर कर इसे सजाती हैं। इस कला को जेरेड कहते हैं। यह कला दुर्लभ व अनूठा है। खास बात यह कि भित्ति चित्र में किसी भी मानव का चित्रण नहीं किया जाता है। सिर्फ पशु, पक्षी, फल व जानवरों के चित्र उकेरे जाते हैं। इसके पीछे सीधा संदेश यही है कि आदिवासी सदैव प्रकृति प्रेमी व इनके बीच जीते व बसते आएं हैं। दीवारों पर उकेरे जाने वाले चित्रों में भी उन्हीं चित्रों का चित्रण होता है जिसे महिलाएं रोज देखती हैं। मसलन, मोर, तोता, हंस, उल्लू, कबूतर, जानवरों में हाथी, सियार, फूलों में हार बाहा, टिगिर बाहा को बड़ी ही खूबसूरती से उकेरा जाता है।

स्टेफी ने कहा कि अब गांवों में भी पक्का मकान तेजी से बनने लगा है। ऐसे में इस भित्ति चित्र को बचाने के लिए वह प्रयासरत हैं। उनका प्रयास है कि रसिक-गौरवी बेसरा मेमोरियल ट्रस्ट के माध्यम से गांव की युवतियां व महिलाओं को इसके लिए लगातार प्रशिक्षित व प्रेरित किया जाए। बतौर संचालिका उनके माध्यम से सोहराय के दौरान गांव की 10 युवतियां व महिलाओं को भित्ति चित्र बनाने के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण से जोड़कर इसके लिए प्रेरित किया गया है। प्रशिक्षण पाने वालों में मरीना खातून, मीनू मुर्मू, प्रतिभा तिग्गा,मीना हेम्ब्रम, आशुतोष सोरेन, भोलागिरी, बाबूराम हांसदा, प्रशांत बेनी हेंब्रम शामिल हैं। इस सवाल पर कि क्या ऐसी गतिविधियों के जरिए फिर से जामा के चुनावी दंगल में ताल ठोंकने की कवायद कर रही हैं के जवाब में उन्होंने साफ कहा कि अभी वह रांची विश्वविद्यालय में बतौर गेस्ट फैकल्टी छात्रों को पढ़ा रही हैं। अब राजनीति में वापसी नहीं करेंगी। सामाजिक जीवन व समाजसेवा के जरिए ही मौजूदगी का एहसास कराएंगी। कहा कि सोहराय के दौरान उन्होंने गांव के ग्रामीणों को कोविड-19 संक्रमण से सावधान रहने के साथ टीका लगवाने के लिए प्रेरित किया है। मास्क व सैनिटाइजर के प्रयोग से होने वाले फायदों के बारे में बताया है।