आंखों में आंसू ला देगी चित्रकूट की ये घटना, कीचड़ में फंसी बैलगाड़ी खींच नहीं पाया बेटा और थम गईं पिता की सांसे

 

कीचड़ में फसी बैलगाड़ी को बाहर निकालने के लिए धक्का देता रह गया बेटा।

चित्रकूट से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने प्रशासन और शासन को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। मिश्रनपुरवा में एक बेटा अपनी बीमार मां को बैलगाड़ी में जा रहा था और यहां कीचड़ होने की वजह से बैलगाड़ी फस गई और पिता ने दम तोड़ दिया।

चित्रकूट, संवाददाता। चित्रकूट के मिश्रन पुरवा गांव की एक ऐसी तस्वीर, जो जीवन की हकीकत बयां करने के लिए काफी है। घटना भी ऐसी हुई है कि शायद जिम्मेदारों के पास भी कोई जवाब न हो। यहां एक बेटा जीतोड़ जतन करता रहा और उसकी आंखों से सामने पिता की सांसे थम गईं। गांव के कच्चे रास्ते पर फंसी बैलगाड़ी के पहिये को निकालने के लिए वह जोर लगाता रह गया लेकिन पिता की जान नहीं बचा सका। गांव और मजरों तक पक्की सड़क बनवाए जाने के तमाम दावों के बीच आज भी पक्के रास्ते नहीं है, लोग पगडंडी के सहारे आवागमन को मजबूर हैं। बीमार और गंभीर रोगियों को चारपाई या बैलगाड़ी से ले जाने की मशक्कत होती है। मिश्रन पुरवा में बीते दिनों बीमार पिता को बैलगाड़ी पर अस्पताल ले जा रहा बेटा उस समय बेबस हो गया जब आंखों के सामने पिता की मौत हो गई। कच्चे रास्ते के कीचड़ में फंसी बैलगाड़ी का पहिया निकालने का जतन करता रहा और इस बीच पिता का दम निकल गया। 

लाचार होकर देखता रह गया बेटा

जिम्मेदारों को माने तो मानिकपुर विकास खंड की ग्राम पंचायत चरदहा का मिश्रन पुरवा में छह घर हैं। यहां दो ब्राह्मण व चार अनुसूचित जाति के परिवार रहते हैं। इन्हीं में से एक 60 वर्षीय प्रीतम पुराने श्वांस रोगी थे। बीते दिनों जिले में बारिश के बीच रविवार को उनकी तबीयत खराब हुई थी। पुत्र राममूरत बैलगाड़ी पर उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए घर से निकले थे। गांव के बाहर कच्चे रास्ते पर बारिश के कारण कीचड़ था और बैल भी काठ की गाड़ी को नहीं खींच पा रहे थे। इस बीच कीचड़ में पहिया फंस गया। बैलगाड़ी को निकालने के लिए राममूरत भी स्वजन से साथ धक्के मारने लगा लेकिन बैलगाड़ी टस से मस नहीं हुई। इस बीच राममूरत की आंखों से सामने पिता की मौत हो गई थी और वह लाचार होकर देखता रह गया।

दस साल से चकबंदी में फंसा गांव

मिश्रनपुरवा गांव चकबंदी की फांस में फंसा है, जिससे रास्ता नहीं बन पा रहा है। ग्राम प्रधान रानू देवी के बेटा अजय बताते हैं कि उनका गांव दस साल से चकबंदी की प्रक्रिया से गुजर रहा है। अभी तक चक रोड़ों की नापजोख नहीं की गई है। मिश्रन पुरवा के रास्ते में भी तमाम किसानों ने फसल बो रखी है। लोग पगडंडी के सहारे आते जाते हैं। मुख्य सड़क से करीब डेढ़ किलोमीटर लोग पगडंडी से आते जाते हैं। यदि कोई बीमार होता है तो उसे चारपाई या बैलगाड़ी से ले जाया जाता है। प्रीतम कई सालों से बीमार चल रहे थे। बारिश के समय उनका इलाज नहीं हो पाया। जिससे मौत हो गई।

-तहसील क्षेत्र में तमाम गांव जंगलों के बीच बसे हैं। जिनमें वन विभाग से सड़क बनाने की अनुमती नहीं है मिश्रनपुरवा में सड़क के लिए सीडीओ को पत्र लिखा गया है। यहां पर चकबंदी चल रही है। प्रमेश कुमार श्रीवास्तव - उप जिलाधिकारी मानिकपुर।