1857 क्रांति: अंग्रेजों ने दुनिया को बोला था झूठ, वीर सावरकर ने बताया था प्रथम राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम

 

1857 की क्रांति पर सावरकर का सिंहनाद। फाइल फोटो।

1857 की पहली घटना से लेकर स्वाधीनता के लिए संघर्ष को अंग्रेजों ने सिपाही विद्रोह कहकर दुनिया की आंखों में बखूबी धूल झोंकी। डा. संतोष कुमार वर्मा बता रहे हैं कि अगर वीर सावरकर न होते तो 1857 की क्रांति को आज भी अंग्रेजों की दृष्टि से ही देखा जाता।

नई दिल्ली। 1857 की पहली घटना से लेकर स्वाधीनता के लिए आखिरी सांस तक जूझते भारतीय सैनिकों के संघर्ष को अंग्रेजों ने सिपाही विद्रोह कहकर दुनिया की आंखों में बखूबी धूल झोंकी। डा. संतोष कुमार वर्मा बता रहे हैं कि अगर वीर सावरकर न होते तो 1857 की क्रांति को आज भी अंग्रेजों की दृष्टि से ही देखा जाता। उन्होंने ही इस क्रांति के यथार्थ को सामने रखा व इसे प्रथम भारतीय स्वातंत्र्य समर के रूप में प्रतिष्ठापित किया..

संघर्ष का लंबा इतिहास

स्वाधीनता के लिए भारत के संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज राजनैतिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढे़ और 1858 में महारानी की घोषणा द्वारा भारत आधिकारिक रूप से ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया। इस प्रक्रिया में 1857 की क्रांति एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसने इतिहास में कालविभाजक की स्थिति अर्जित की। क्रांतिकारी और विचारक विनायक दामोदर सावरकर ने 1857 की क्रांति पर अपनी कालजयी पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ में इस क्रांति को भारत का ‘प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम’ का नाम दिया। यह पुस्तक पहली बार 1909 में प्रकाशित हुई। उस समय विद्वत जगत में यह स्थापित हो चुका था कि 1857 की क्रांति एक सैनिक विद्रोह या अधिकतम एक भारतीय विद्रोह था। अधिकांश अंग्रेज इतिहासकारों और प्रशासकों द्वारा इसे इसी रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था।

मनोबल कमजोर करने के प्रयास

1857 की क्रांति अपने प्रभाव व क्षेत्र में इतनी विस्तृत और तीव्र थी कि इसने अंग्रेजों को लगभग हतोत्साहित कर दिया था। उनके हृदय से भारत पर चिरकाल तक शासन कर पाने की आकांक्षाएं तिरोहित हो चुकी थीं। परंतु आंतरिक राजनैतिक कारण, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जैसे क्रीमिया युद्ध का समाप्त हो जाना आदिक से ब्रिटेन के लिए बड़ी मात्रा में सेना और साजो-सामान भारत भेजना आसान हो गया, जिससे क्रांति का दमन करने में उसे सहायता मिल गई। परंतु ब्रिटिश मानस पर इसके मर्मांतक प्रभाव हुए और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के प्रयासों के तहत उन्होंने न केवल प्रशासनिक, राजनैतिक और सैन्य प्रयास किए बल्कि भारतवासियों के मनोबल कमजोर करने के लिए एक मनोवैज्ञानिक उपाय के तौर पर इस क्रांति को कमतर दिखाने की और इस तथ्य को स्थापित करने की लगातार कोशिश की कि इससे ब्रिटिश शासन के स्थायित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

हुई तमाम कोशिशें

तत्कालीन और परवर्ती ब्रिटिश लेखन इसी विचारधारा को आगे बढ़ाता है। प्रशासक जान विलियम द्वारा क्रांति के तुरंत बाद लिखित ‘इंडियन रिबेलियन आफ 1857’ और जार्ज ब्रूस मालेसन द्वारा लिखित और 1890 में पूर्ण की गई छह खंडों वाली पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ द इंडियन म्युटिनी’ जैसी अनेकानेक किताबों में इसे मात्र सैनिक विद्रोह सिद्ध करने की चेष्टा की गई। एडवर्ड टांपसन तथा डी. टी. गैरेट ने भी 1857 की क्रांति को मात्र सिपाही विद्रोह या जमींदारों का अनियोजित प्रयत्न अथवा सीमित किसान युद्ध कहा। 1857 की क्रांति के दमन में भाग लेने वाले जनरल सर जान लारेंस ने 1857 की घटना को सिर्फ गाय की चर्बी से उत्पन्न सैनिक उत्पात बताया, तो वहीं विलियम हावर्ड रसेल ने इसे महज एक धार्मिक युद्ध बताया। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लार्ड पामस्र्टन ने इसे एक सैन्य गड़बड़ी बताकर महत्वहीन सिद्ध करने की कोशिश की। परंतु इन प्रपंचों के बीच ब्रिटेन में भी इस क्रांति की गंभीरता को झुठलाया नहीं जा सका और इसी समय हाउस आफ कामंस में विपक्ष के नेता बैंजामिन डिजरायली ने इसे राष्ट्रीय विद्रोह कहकर संबोधित किया, जो इसकी गंभीरता को कुछ हद तक रेखांकित करता है।

जब वीर सावरकर 1857 की क्रांति को प्रथम राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम कहते हैं तो इसके व्यापक मायने हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इसे उन्होंने भारत की स्वाधीनता के प्रथम प्रयास के रूप में इंगित किया। भारत में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष का लंबा इतिहास है। दक्षिण में त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा द्वारा 1741 में कोलाचल की लड़ाई में डच ईस्ट इंडिया कंपनी को पराजित करने से लेकर 18वीं सदी के अंत में वीर पंड्या कट्टाबोम्मान के संघर्ष, इसी समय छोटानागपुर के वनों में नवस्थापित ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने वाले बाबा तिलका मांझी के अवदान से वे अवगत थे। परंतु 1857 की क्रांति इन सैन्य संघर्षों की तरह एक सीमित क्षेत्र के प्रतिरोध की तुलना में कहीं अधिक व्यापक थी। जो विचार बैरकपुर और दमदम के सिपाहियों को ब्रिटिश राज के उन्मूलन के लिए प्रेरित कर रहे थे, वही विचार 1,000 मील दूर राजस्थान के नसीराबाद सैन्य छावनी के सैनिकों को उद्वेलित किए हुए थे।

मध्य प्रदेश के मंडला जबलपुर क्षेत्र के छोटे-छोटे स्थानीय राजाओं को इस बात का भलीभांति ज्ञान था कि क्रीमिया युद्ध ने भारत में ब्रिटिश सैन्य शक्ति को किस तरह प्रभावित किया और नर्मदा घाटी के खाज्या नायक, भीमा नायक सदृश अनेकानेक समुदाय राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत होकर तात्या टोपे के सहयोगी बन इस समर में कूद पड़े। इस संग्राम में स्थानीय लोगों की व्यापक सहभागिता इस औपनिवेशिक धारणा को खंडित करती है कि यह केवल सैनिकों अथवा रुष्ट शासकों का विद्रोह था। सावरकर का लेखन जान स्ट्रेची सदृश चाटुकार इतिहासकारों की दुराग्रह पूर्ण धारणाओं को ध्वस्त करता है। उन्होंने 1857 की क्रांति को ऐसे प्रस्थान बिंदु के रूप में स्थापित करने में ध्वजवाहक की भूमिका निभाई, जो भारत के स्वाधीनता संघर्ष का प्रेरणापुंज बनी।