2024 के आम चुनावों की चुनौती के मायने और भविष्य में इसको लेकर भाजपा की चुनौतियां पर एक नजर

 

केंद्र सरकार की नीतियों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है।

चार राज्यों में भाजपा की फिर से सरकार बनने के आलोक में 2024 के आम चुनावों की चुनौती के मायने और भविष्य में इसको लेकर पार्टी की चुनौतियों और क्षमताओं की पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

अपेक्षा भी अद्भुत चीज होती है। किसी की अपेक्षा पर खरा उतरने की जितनी खुशी होती है, उसमें निरंतरता बनाए रखना उतनी ही बड़ी चुनौती। हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से चार यानी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भाजपा को मतदाताओं ने दोबारा सत्ता के सिंहासन पर बैठाया। जाहिर है कि इन प्रदेशों की पूर्ववर्ती सरकारों ने अपने कार्य-व्यवहार से जनता का दिल जीता और भाजपा निर्विवाद रूप से सबसे ज्यादा फायदे में रहने वाली राजनीतिक पार्टी बनी।

भाजपा ने देश के उस प्रदेश पर कब्जा बरकरार रखा जहां से होकर केंद्र का रास्ता गुजरता है। उत्तर प्रदेश के पिछले सत्तर साल के इतिहास में योगी आदित्यनाथ पहले ऐसे सीएम बने जो पांच साल कार्यकाल पूरा करने के बाद फिर से चुने गए हैं। अपने शासन और जनता को दिए जा रहे राशन के दम पर सत्ता के प्रति एंटी इनकंबेंसी को भोथरा किया। निष्क्रिय मुख्यमंत्रियों को बदलने से उत्तराखंड में भाजपा की दमदार वापसी हुई तो मणिपुर और गोवा में भी भाजपा का इकबाल बुलंद हुआ। राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनावों में निश्चित तौर पर उसे फायदा होगा। इन चार राज्यों में फिर से सत्ता पाने और जनता की अपेक्षा को पूरा करने की निरंतरता बनाए रखना अब पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है।

अगले ही साल यानी 2023 में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक समेत नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव आसन्न हैं। कहीं सत्ता बचाने की जिद्दोजहद तो कहीं कब्जा जमाने की चुनौती है। यह क्रम यहीं नहीं खत्म होगा। 2024 में झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र, ओडिशा और आंध्र प्रदेश समेत सात राज्यों में चुनाव की परीक्षा के साथ आम चुनावों का महासमर भी ताल ठोक रहा है। विपक्ष बिखरा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का फायदा। बहुत सारे पहलू पक्ष में होने के बावजूद इस राष्ट्रीय पार्टी के समक्ष अपने चुनावी प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी।