हजारों वर्षों का सहेजा भूजल भंडार सौ वर्ष में इतना बिगड़ा कि अनेकों नदियां स्वत: सूख गईं

 

जल संकट से निपटने में अपेक्षित परिणाम प्राप्त होंगे।

डिस्चार्ज और रिचार्ज का संतुलन इतना बिगड़ा है कि 1990 तक भूजल निकालने के लिए सेंट्रीफ्यूगल पंप से काम चल जाता था अब उनकी जगह सबमर्सिबल पंप ने ले ली। स्पष्ट है कि हजारों वर्षों का सहेजा भूजल भंडार सौ वर्ष में इतना बिगड़ा कि अनेकों नदियां स्वत सूख गईं।

 सतह पर मौजूद और जमीन के अंदर दोनों ही प्रकार के जल संसाधनों को एक मानकर जल संकट का उपचार खोजा जाए तो ज्यादा प्रभावी होगा। ऐसे में हमें उन नदियों के संजाल और अविरलता को वैज्ञानिक दृष्टि से समझना होगा, जो भूगर्भीय संस्तरों (एक्वीफर जियोलाजिकल स्ट्रैटा) से पोषित होती है। उदाहरण के लिए

सोन और नर्मदा। नदियों के कैचमेंट में विगत 60-70 वर्षों में सतह पर मौजूद जल व भूजल के असंतुलित उपयोग, जल संरक्षण, संभरण एवं संवर्धन के अभाव तथा वानस्पतिक आवरण में कमी के कारण भूजल के स्तर में सतत गिरावट हुई है। लिहाजा वर्षा काल बाद भूजल स्तर नदियों के तल से नीचे चले जाने से बेस फ्लो समाप्त हो जाता है।

सहायक नदियों का योगदान लगभग खत्म हो जाता है जिसके कारण मुख्य नदियों में प्रवाह काल घट गया है और ढेर सारी छोटी-मोटी नदियां तो वर्षा काल के 2-3 माह पश्चात ही सूख जा रही हैं। स्पष्ट है कि किसी भी नदी या नदी तंत्र में जल प्रवाह की कमी का मुख्य कारण भूजल भंडारों का खाली होना है। इसके लिए पूरे समाज के नागरिक जिम्मेदार हैं। बरसात के मौसम में नदी के द्वार वाले जलाभृत रिचार्ज होते है और बरसात के बाद वे धीरे-धीरे नदियों मे बेस फ्लो के रूप में योगदान करते हैं। इससे नदियों में सतत प्रवाह होता रहता है। चूंकि रिचार्ज होने के कारण भूजल स्तर नदी तल से बहुत ऊपर तक आ जाता है और जब नदी के कछार का भूजल स्तर नदी के तल से नीचे उतर जाता है तो बेस फ्लो का योगदान समाप्त हो जाता है और नदी सूख जाती है।

यह चक्रजारी रहता है। 1930 में पहला ट्यूबवेल भूजल उपयोग के लिये भारत में खोदा गया था। अब से 100 वर्ष पूर्व भूजल का उपयोग कूप, टैंक, तालाब, जल प्रपात आदि से होता था। तब धरती के जलाभृत भरपूर रहते थे, भूजल स्तर प्राय: सभी स्थानों पर छोटी-बड़ी नदियों के तल से बहुत ऊपर रहते थे, कहीं भी कुआं खोदते ही सतह पर या

उससे कुछ मीटर नीचे भूजल उपलब्ध हो जाता था। सभी छोटी बड़ी नदियां पूरे साल भर जल प्रवाह से सजीव थीं। विगत सौ वर्षों में बेहिसाब नल कूपों की संख्या बढ़ी, अनियंत्रित भूजल दोहन हो रहा है। रिचार्ज और डिस्चार्ज के असंतुलन की वजह से ही गोदावरी विगत वर्षों में अपने प्रवाह क्षेत्र में कई स्थानों पर सूखी है। कावेरी अपना 40

प्रतिशत प्रवाह खो चुकी है। नदियों के सूखने के कारण भारत के कुछ और भाग के रेगिस्तान बनने की आशंका है।

नदियों में जल प्रवाह बढ़े, उसके लिए प्रधानमंत्री के आह्वान पर जल शक्ति मंत्रालय ने नदी उत्सवों के माध्यम से जन चेतना को जाग्रत करने का काम नवंबर 2021 से शुरू किया है। भावी जल संकट से निजात पाने के लिए कैचमेंट में जल संचयन, संरक्षण और भूजल संवर्धन के कार्य व्यापक पैमाने पर सघनता से करने होंगे। इसके लिए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के प्रावधान किए हैं। तमाम योजनाओं से कई प्रक्षेत्रों में कुआं, तालाब जिआओ अभियान से भूजल स्तर में बढ़ोतरी देखी जा रही है। आगे भूजल उपयोग की बात करे तो हम देखते हैं कि विभिन्न कमान क्षेत्रों में दो नलकूपों में न्यूनतम दूरी क्या होनी चाहिए इसके लिए समुचित व्यवस्था नहीं है, यदि है भी तो राष्ट्रीय स्तर या विभिन्न राज्य स्तरों पर क्रियान्वित करने योग्य सरल नियमावली या दिशानिर्देश नहीं हैं। सभी नागरिकों को संविधान में प्रदत्त जल के मौलिक अधिकार मुहैया कराने के लिए भूजल प्रबंधन, नियंत्रण और संचालन हेतु शीध्र समुचित कानून अथवा अधिनियम बनाया जाए, तत्पश्चात उसका अनुपालन सुनिश्चित हो। भूजल संवर्धन का क्रियान्वयन कम से कम अगले 50 वर्षों तक सतत ह

ो।