अंतरिक्ष तक रूस यूक्रेन युद्ध के बीच जंग की आंच, आइएसएस पर क्यों मंडरा रहा खतरा?

 

धरती और आकाश को समझने में मदद करता है अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन। प्रतीकात्मक

Space War रूस ने उनकी वापसी के अभियान में कोई अड़ंगा डाला तो वहां से उनकी वापसी टल सकती है। उम्मीद है कि कम से कम अंतरिक्ष में इंसान की साझेदारियां यथावत रहेंगी और धरती पर जारी उठापटक का वहां कोई असर नहीं होगा।

 यूक्रेन से जारी युद्ध के बीच रूस ने जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आइएसएस) के खात्मे की बात कही है, वह एक साथ कई मोर्चे खुलने का संकेत देती है। संचालन ठप होने की स्थिति में आइएसएस भारत, चीन समेत अमेरिका आदि किसी भी देश में गिर सकता है। उल्लेखनीय है कि आइएसएस अंतरिक्ष को समझने और वहां से पृथ्वी की विभिन्न गतिविधियों की निगरानी और शोध का ऐसा जरिया उपलब्ध कराता है, जिसकी तुलना नहीं की जा सकती।

यह मिशन मानव सभ्यता के विकास के अलावा जाति, समाज और देश के दायरे से बाहर आकर इंसानी साङोदारी का एक बेमिसाल प्रतीक है। यह मिसाल है कि कैसे इंसान दुनियावी झंझटों से ऊपर उठकर एक बेहतर विश्व बनाने के संकल्प के लिए एकजुट हो सकता है। ऐसे में आइएसएस का संचालन रुकने या किसी कारण उसका धरती पर वापस गिरने की आशंकाएं इस संकल्प को खतरे में डालती हैं।

आइएसएस का दांव : रात के आकाश में चंद्रमा और शुक्र ग्रह के बाद पृथ्वी से दिखने वाली सबसे ज्यादा चमकदार चीजों में शामिल आइएसएस करीब 27,600 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर धरती की परिक्रमा कर रहा है। उस पर मौजूद अंतरिक्ष यात्री 24 घंटे में 16 बार सूर्योदय और सूर्यास्त देखने के अलावा कई वैज्ञानिक प्रयोगों-अन्वेषणों को अंजाम देते हैं। मोटे तौर पर वह एक मानवनिर्मित सैटेलाइट है, जिसे पृथ्वी की निचली कक्षा में इस तरह स्थापित किया गया है जिससे कि पृथ्वी से भेजे जाने वाले अंतरिक्ष यान जुड़ सकें। चूंकि उस पर अंतरिक्ष यात्री-विज्ञानी लंबी अवधि के लिए रह सकते हैं, इसलिए वहां समय-समय पर अंतरिक्ष यान भेजकर रसद पहुंचाई जाती है। फुटबाल के मैदान जितने आकार का और पांच बेडरूम वाले फ्लैट जितना बड़ा वह एक ऐसा प्लेटफार्म है, जिसके जरिये धरती और आकाश, दोनों को समझने का एक सिलसिला बनता है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है इसमें रूस-अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों की साङोदारी। लगभग 100 अरब डालर की लागत से तैयार आइएसएस के निर्माण में अमेरिकी स्पेस एजेंसी-नासा, रूस की फेडरल स्पेस एजेंसी-रोसकास्मास, यूरोप की स्पेस एजेंसी-ईएसए, कनाडा की स्पेस एजेंसी और जापान की एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी समेत कुल 15 देशों की भागीदारी है। उसके संचालन में ज्यादा भूमिका रूस और अमेरिका की ही है।

उनकी ये भूमिकाएं अलग-अलग हैं। जैसे रूस इसे कक्षा में बनाए रखने और इसकी रफ्तार कायम रखने का जिम्मा संभालता है। हाल में रूस ने इस अंतरिक्ष स्टेशन की ऊंचाई में बदलाव किया है। यह ऊंचाई बढ़ाई गई है। अमेरिका भी रूस के बराबर ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अमेरिका के जिम्मे आइएसएस पर बिजली आपूर्ति कायम रखना और उस पर मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों की रक्षा जैसी जिम्मेदारियां हैं। भले ही आइएसएस पर अंतरिक्ष यात्रियों की मौजूदगी वर्ष 2000 से है, लेकिन 1990 में इसका निर्माण शुरू होने के वक्त से ही दोनों देश इससे जुड़े हर काम में एक-दूसरे की मदद करते रहे हैं। आइएसएस के रखरखाव में भारी खर्च आता है, जिसमें सबसे ज्यादा पैसा अमेरिका देता है। इस बड़े सरकारी खर्च पर अमेरिका में अक्सर विवाद भी होता रहता है, पर रूस जानता है कि उसके सहयोग के बिना आइएसएस चल नहीं सकता, इसलिए यूक्रेन पर कार्रवाई के कारण अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों की दशा में वह इसका इस्तेमाल एक युद्ध रणनीति के रूप में कर रहा है। रूस ने चेतावनी दी है कि उसके खिलाफ जो प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनके मद्देनजर आइएसएस के संचालन में बाधा आ सकती है। मुमकिन है कि आइएसएस किसी दुर्घटना का शिकार हो जाए और धरती पर गिर जाए।

साझेदारी के रास्ते में अड़चन: रूसी स्पेस एजेंसी के मुखिया दिमित्री रोगोजिन ने कहा है कि रूस पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों की सूरत में आइएसएस के गिरने की आशंका पैदा हो सकती है। यही नहीं, रूस ने भविष्य में खुद का स्पेस स्टेशन बनाने की बात भी कही है। हालांकि रूसी रुख से अलग अमेरिकी स्पेस एजेंसी- नासा ने साफ किया है कि रूस-यूक्रेन के बीच कायम तनाव की छाया आइएसएस पर नहीं पड़ने दी जाएगी, लेकिन नासा के रुख से अलग रूस इसमें कितना सहयोग करेगा, इसकी पुष्टि जल्द ही हो जाएगी जब आइएसएस पर मौजूद अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री मार्क वेंडे हेई वहां से तय कार्यक्रम के अनुसार सुरक्षित वापसी करेंगे। मार्क वेंडे हेई ने आइएसएस पर पूरे एक साल रहने का रिकार्ड बनाया है। अब उन्हें निश्चित कार्यक्रम के मुताबिक कजाखस्तान स्थित बैकनूर कास्माड्रोम में उतरना है।