स्विस कंपनी आइक्यू एयर ने कहा दिल्ली दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित राजधानी, बताए इसके पीछे के प्रमुख कारण

 

दिल्ली और एनसीआर के वायु प्रदूषण का आपस में जुड़ा होना समस्या की जड़

वाहनों की इस बढ़ी संख्या और इससे वायुमंडल पर हो रहे असर को कतई नहीं नकारा जा सकता। शोध रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के पीएम 2.5 के स्तर पर 41 प्रतिशत तक प्रदूषण वाहनों के धुएं से होता है। सार्वजनिक परिवहन की स्थिति कतई संतोषजनक नहीं है।

नई दिल्ली । स्विस कंपनी आइक्यू एयर की मंगलवार को जारी 'व‌र्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट 2021' में दिल्ली को एक बार फिर से दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित राजधानी बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में यहां पीएम 2.5 का स्तर तेजी से बढ़ा है। पर्यावरणविदों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण का आपस में जुड़ा होना समस्या की मुख्य जड़ है। आइआइटी कानपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष प्रो. एसएन त्रिपाठी का कहना है कि दिल्ली और एनसीआर के वायु प्रदूषण को पूरी तरह से अलग नहीं किया जा सकता। यह आपस में जुड़ा हुआ है।

यह बात अलग है कि दिल्ली के हाट स्पाट पर प्रदूषण के कारण अलग हैं, जबकि एनसीआर के हाट स्पाट पर अलग। 50 से 65 प्रतिशत प्रदूषण की वजह स्थानीय कारक हैं और 30 से 35 प्रतिशत की वजह बाहरी कारक। अगर ऐसा न हो तो मौजूदा समय में न पराली जल रही है और न कहीं धूल भरी आंधी चल रही है, फिर भी दिल्ली एनसीआर की वायु गुणवत्ता खराब से बहुत खराब श्रेणी में बनी हुई है।

बकौल प्रो. त्रिपाठी इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ सालों में दिल्ली का प्रदूषण पहले की तुलना में कम हुआ है, जबकि एनसीआर का बढ़ा है। इसकी सीधी सी वजह यही है कि सरकारी स्तर पर अभी दिल्ली एनसीआर को एक मानकर नहीं देखा जा रहा। दोनों के लिए कोई संयुक्त कार्ययोजना भी आज तक नहीं बन पाई है। उन्होंने कहा कि रीजनल ट्रांसपोर्ट भी राजधानी के प्रदूषण में अहम रोल अदा करता है।

मसलन, दिल्ली में सार्वजनिक वाहन सिर्फ सीएनजी से ही चल सकते हैं। किंतु दूसरे राज्यों के डीजल वाहन भी यहां धड़ल्ले से दौड़ते रहते हैं। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण एवं संरक्षण प्राधिकरण (ईपीसीए) के पूर्व अध्यक्ष भूरेलाल कहते हैं कि दिल्ली में प्रदूषण के लिए वाहनों का धुआं भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। साल दर साल 5.81 फीसद की दर से राजधानी में निजी वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह संख्या एक करीब डेढ़ करोड़ के आंकड़े को छू रही है। दिल्ली में सबसे अधिक दोपहिया वाहन और उसके बाद कारें पंजीकृत हैं। जहां तक डीजल वाहनों की बात है तो इनकी संख्या निजी वाहनों में अच्छी खासी है, जो प्रदूषण में इजाफे के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।

स्पष्ट है कि वाहनों की इस बढ़ी संख्या और इससे वायुमंडल पर हो रहे असर को कतई नहीं नकारा जा सकता। शोध रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली के पीएम 2.5 के स्तर पर 41 प्रतिशत तक प्रदूषण वाहनों के धुएं से होता है। सार्वजनिक परिवहन की स्थिति कतई संतोषजनक नहीं है। वहीं के दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय की यह बात भी एकदम तर्कसंगत है कि दिल्ली की भौगोलिक बनावट को अनदेखा नहीं कर सकते। 300 किमी के दायरे में दिल्ली की स्थिति ढलान वाली है।

इसीलिए उत्तर भारत के इलाकों में जितनी भी गतिविधियां होती हैं, एयर शेड की वजह से उन सबका सबसे ज्यादा प्रभाव दिल्ली पर ही पड़ता है। इसलिए वायु प्रदूषण से जंग में दिल्ली एनसीआर की एकीकृत कार्ययोजना बननी चाहिए। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की अवधारणा भी यही है। अगर एक जगह कुछ गतिविधियों पर रोक है और दूसरी जगह वो सभी चल रही हैं तो फिर उसके अपेक्षित परिणाम आ ही नहीं पाएंगे।