हाई कोर्ट ने की टिप्पणी, कहा- झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति को अदालतों द्वारा किया जाना चाहिए बहिष्कृत, जानिए क्या है पूरा मामला?

पीठ ने कहा कि झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति को अदालतों द्वारा बहिष्कृत किया जाना चाहिए।

परिवार न्यायालय ने एक मामले में क्रूरता के आधार पर पति के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए तलाक की अनुमति दी थी। पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने सुबूतों का सही ढंग से परीक्षण किया है और पाया कि पत्नी ने पति और ससुर के खिलाफ चरित्र हनन के निराधार आरोप लगाकर मानसिक क्रूरता की है।

नई दिल्ली, संवाददाता। तलाक से जुड़े एक मामले में परिवार न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि विवाहेतर संबंध जैसे गंभीर आरोप पति या पत्नी के चरित्र, प्रतिष्ठा व स्वास्थ्य पर हमला होने के साथ मानसिक पीड़ा और क्रूरता के समान हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी व न्यायमूर्ति नवीन चावला की पीठ ने कहा कि शादी एक गंभीर संबंध है और बेहतर सूझबूझ से ही इसे बचाया जा सकता है। पीठ ने कहा कि झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति को अदालतों द्वारा बहिष्कृत किया जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि परिवार न्यायालय ने एक मामले में क्रूरता के आधार पर पति के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए तलाक की अनुमति दी थी। पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने सुबूतों का सही ढंग से परीक्षण किया है और पाया कि पत्नी ने पति और ससुर के खिलाफ चरित्र हनन के निराधार आरोप लगाकर मानसिक क्रूरता की है। पीठ ने इसके साथ ही 31 जनवरी 2019 के परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली महिला की अपील को खारिज कर दिया।

पीठ ने कहा कि अपील याचिका में भी महिला अपने लगाए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश नहीं कर सकी। मौजूदा मामले में अपीलकर्ता (पत्नी) ने गंभीर आरोप लगाए हैं, लेकिन सुनवाई के दौरान उनकी पुष्टि नहीं हुई। महिला ने पति पर गंभीर शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था। पीठ ने कहा कि हम मानते हैं कि इन दो पहलुओं को अपीलकर्ता द्वारा पति पर की गई क्रूरता के रूप में लिया जा सकता ह

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